

जे पी मैठाणी | फोटो : जयदीप किशोर
वर्ल्ड बायोडायवर्सिटी दिवस (अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस) हर साल 22 मई को मनाया जाता है. इस दिवस का मुख्य उद्देश्य पृथ्वी पर जीवों और वनस्पतियों की घटती प्रजातियों, पारिस्थितिकी तंत्र के महत्व और जैव विविधता संरक्षण के प्रति दुनिया भर में जागरूकता बढ़ाना है.
आज विश्व जैव विविधता दिवस पर हमार्री टीम ने बायोटूरिज्म पार्क- पीपलकोटी में – पाली हाउस में बीज से उगाये गए 5000 किल्मोड़, की छोटी छोटी पौधों को पालीबैग में प्रत्यारोपण करना शुरू कर दिया है . किल्मोड़ को जिसको आम बोलचाल की भाषा में दारु हल्दी भी कहते हैं.

विकिपीडिया के अनुसार- दारुहरिद्रा, एक औषधीय पौधा है. यह पादप भारत और नेपाल के पर्वतीय हिमालयी क्षेत्रों का देशज वृक्ष है. यह श्रीलंका में भी पाया जाता है. यह मधुमेह की चिकित्सा में बहुत उपयोगी है.
किल्मोड़ क्यूँ बचाएं
पिछले 3-4 साल में जंगलों और निजी भूमि से बहुत बड़ी मात्रा में किल्मोड़ की जड़ों को पूरी तरह से उखाड़ कर बेच दिया गया है. कई आयुर्वेदिक कम्पनियां इसकी जड़ों से सुगर की दवा (Diabetes), ऑय ड्राप बना रही है और पिछले 3-4 साल में अचानक इसकी बहुत मांग बढ़ गयी है. सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी किल्मोड़ की जड़ों के पाउडर की बहुत बहुत मांग बढ़ गयी हैं. जिससे किल्मोड़ की सभी प्रजातियों – जैसे- बार्बेरिस अरिस्टाटा और बर्बेरिस लाइसीयम दोनों के अस्तित्व पर संकट छा गया है.इसकी कुछ प्रजातियाँ IUCN के द्वारा रेड डाटा बुक में शामिल किया गया है जिसका मतलब है ये लुप्तप्राय- संकटग्रस्त पौध प्रजाति या जड़ी बूटी है.
इस बात को ध्यान में रखते हुए हमारी संस्था वर्ष 2011 से हर वर्ष इसकी कम से कम 2000 पौध तैयार कराती है , लेकिन पिछले 2 साल में अचानक किल्मोड़ की पौध की बहुत मांग बढ़ गयी है . इसलिए किल्मोड़ को बचाए जाना जरूरी है.

विश्व की संकटग्रस्त पौधप्रजातियों की जो लिस्ट आईयुसीएन द्वारा बनायी गयी है उसके अनुसार किल्मोड़ की -बार्बेरिस प्रजाति जिसे बारबेरी और दारु हल्दी भी कहते हैं को लीस्ट कंसर्न या बहुत कम पूछे जाने वाली प्रजाति माना गया है . क्यूंकि सारी दुनिया में किल्मोड़ की प्रजाति को खतरे में नहीं माना गया है. लेकिन दूसरी और इस प्रजाति को बहुत बड़ी मात्रा में इसमे मौजूद बर्बेरिन अलकेलोईड्स की भारी मांग की वजह से इस प्रजाति को जंगलों से बुरी तरह से उखाड़ कर बेचा जाने लगा जिस वजह से इस प्रजाति के समाप्त होने की प्रबल आशंका पैदा हो गयी थी . भारत के हिमालयी क्षेत्रों में इसके अवैज्ञानिक दोहन, बेहद बड़े पैमाने पर दोहन की वजह से क्षेत्रीय आधार पर किल्मोड़ को – समाप्तप्राय (Endangered) या संकटग्रस्त (Threatend) की सूची में रख दिया गया है.
आज के जैव विविधता दिवस के अवसर पर इस उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए और आजकल पहाड़ों में जगह जगह – पीली हिन्सोल, काला हिन्सोल और किल्मोड़ के फल दिखाई दे रहे हैं और इस अवसर का फायदा उठाते हुए आगाज फैडरेशन की टीम द्वारा आज के जैव विविधता संरक्षण दिवस पर किल्मोड़ को बचाने के प्रयास फिर से शुरू किये गए.

आज के जैव विविधता संरक्षण की दिशा में हमरी टीम के साथी – दिलबर सिंह, जयदीप किशोर , भूपेंद्र कुमार, श्रीमती जमुना देवी, श्रीमती, श्रीमती रीना देवी के साथ साथ अनीता देवी, ममता देवी और गुड्डी देवी ने अपना अपना सहयोग दिया.
इस दिवस से जुड़े प्रमुख बिंदु:
- शुरुआत: संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा साल 2000 में इस दिन को मनाने की घोषणा की गई थी, जिसके बाद इसे आधिकारिक रूप से 22 मई 2001 से मनाया जाने लगा.
- लक्ष्य: जैव विविधता को हो रहे नुकसान को रोकना और प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर एक स्थायी (sustainable) भविष्य का निर्माण करना.
- यूनेस्को की भूमिका: जैविक विविधता में तेजी से हो रही गिरावट को देखते हुए, यूनेस्को विज्ञान, प्रकृति और संस्कृति को आपस में जोड़कर जैव विविधता की रक्षा के वैश्विक प्रयासों का नेतृत्व कर रहा है.
- जागरूकता और कार्रवाई: इस दिन विश्व स्तर पर कई सेमिनार, वेबिनार और कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है, जो लोगों को अपने स्थानीय पर्यावरण को संरक्षित करने के लिए प्रेरित करते हैं.
आज के जैव विविधता संरक्षण की दिशा में संस्था के टीम के साथी – दिलबर सिंह, जयदीप किशोर , भूपेंद्र कुमार, श्रीमती जमुना देवी, श्रीमती, श्रीमती रीना देवी के साथ साथ अनीता देवी, ममता देवी और गुड्डी देवी ने अपना अपना सहयोग दिया.
