विलुप्त होती परंपरा: जांदरा-घराट अब बन रहे यादों का हिस्सा

Pushkar Singh Dhami With Jandra

 

ग्रामीण जीवन की पहचान रही हस्तचालित चक्की और पनचक्की पर संकट

  • नीरज उत्तराखंडी

पहाड़ के गांवों में कभी हर घर की धड़कन रही हस्तचालित चक्की (जांदरा/जांजो) और जलधारा से संचालित पनचक्की (घराट) आज विलुप्ति की कगार पर हैं। आधुनिक तकनीक, बदलती जीवनशैली और तेजी से हो रहे पलायन के बीच ये पारंपरिक साधन अब बुजुर्गों की यादों और पुराने घरों के कोनों तक सीमित होकर रह गए हैं।

संस्कृति और सामूहिक जीवन का केंद्र

ग्रामीण क्षेत्रों में जांदरा केवल अनाज पीसने का साधन नहीं था, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का अहम हिस्सा हुआ करता था। महिलाएं सुबह-शाम जांदरे पर काम करते हुए लोकगीत गाती थीं, जिससे न केवल श्रम सहज होता था बल्कि आपसी जुड़ाव भी मजबूत होता था।

वहीं घराट, पहाड़ों की नदियों और गाड़-गदेरों के पानी से चलने वाली पर्यावरण अनुकूल तकनीक का उत्कृष्ट उदाहरण था। बिना बिजली के आटा पीसने वाली यह व्यवस्था आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूत नींव मानी जाती थी।

आधुनिकता ने बदली तस्वीर

समय के साथ बिजली और डीजल से चलने वाली आटा चक्कियों का प्रचलन बढ़ा, जिससे जांदरा और घराट पीछे छूटते चले गए। इसके अलावा गांवों से हो रहा पलायन और जलस्रोतों का सूखना भी घराटों के बंद होने का बड़ा कारण बना है।

नई पीढ़ी का इन परंपराओं से जुड़ाव कम होता जा रहा है, जिससे इनके अस्तित्व पर संकट और गहरा गया है।

स्वास्थ्य, पर्यावरण और परंपरा का संगम

विशेषज्ञों के अनुसार जांदरा और घराट में पिसा आटा अधिक पौष्टिक होता है, क्योंकि इसमें अनाज के पोषक तत्व सुरक्षित रहते हैं। इसके साथ ही ये साधन पर्यावरण संरक्षण, पारंपरिक ज्ञान और आत्मनिर्भरता के प्रतीक हैं।

धामी सरकार के चार साल: उम्मीद की किरण

पिछले चार वर्षों में पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में उत्तराखंड सरकार ने ग्रामीण विकास, लोकसंस्कृति और स्वरोजगार को बढ़ावा देने के लिए कई पहलें की हैं।

ग्रामीण पर्यटन (होमस्टे), जल स्रोतों के संरक्षण, और स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने जैसी योजनाओं ने पारंपरिक जीवनशैली को नई पहचान देने का प्रयास किया है। यदि इन पहलों के साथ जांदरा-घराट जैसी पारंपरिक प्रणालियों को भी जोड़ा जाए, तो यह न केवल सांस्कृतिक संरक्षण बल्कि स्थानीय रोजगार का भी मजबूत माध्यम बन सकता है।

संरक्षण की दरकार

स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि इन पारंपरिक साधनों को अब भी संरक्षित नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियां इन्हें केवल कहानियों में ही जान पाएंगी।

विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि:

  • घराटों को ग्रामीण पर्यटन से जोड़ा जाए
  • पारंपरिक आटे को ऑर्गेनिक ब्रांडिंग दी जाए
  • सरकार विशेष पुनर्जीवन योजनाएं शुरू करे
  • युवाओं को इससे जोड़ने के लिए जागरूकता अभियान चलाए जाएं

संदेश

जांदरा और घराट केवल अनाज पीसने के उपकरण नहीं हैं, बल्कि पहाड़ की संस्कृति, परंपरा और प्रकृति के साथ सामंजस्य का जीवंत प्रतीक हैं।

आज जब विकास की रफ्तार तेज हो रही है, तब इन जड़ों को सहेजना भी उतना ही जरूरी है। इनका संरक्षण केवल अतीत को बचाने का प्रयास नहीं, बल्कि भविष्य को समृद्ध बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

 

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