पिज़्ज़ा-बर्गर के दौर में लुप्त हो रहे पारम्परिक पहाड़ी व्यंजन ‘सिड़ा–असका’, सांस्कृतिक पहचान पर संकट

sida Aska

 

  • नीरज उत्तराखंडी

हिमालयी क्षेत्रों की समृद्ध पाक परंपरा का अहम हिस्सा रहे पारम्परिक पहाड़ी व्यंजन ‘सिड़ा–असका’ आज अस्तित्व के संकट से जूझ रहे हैं. कभी त्योहारों, मेलों और विशेष अवसरों की शान माने जाने वाले ये व्यंजन अब धीरे-धीरे पहाड़ी रसोई से गायब होते जा रहे हैं.

बदलती जीवनशैली का असर

विशेषज्ञों का मानना है कि फास्ट फूड की बढ़ती लोकप्रियता, शहरीकरण और नई पीढ़ी की बदलती खान-पान आदतों ने पारम्परिक व्यंजनों को पीछे धकेल दिया है. पहले जहां घरों में गेहूं या मंडुए के आटे से सिड़ा (भाप में पका व्यंजन) और असका (स्थानीय शैली की रोटी/पकवान) बनाए जाते थे, वहीं अब उनकी जगह बाजारू खाद्य पदार्थों ने ले ली है.

मेहनत और समय की मांग

ग्रामीण महिलाओं के अनुसार, सिड़ा–असका बनाने की प्रक्रिया समय और धैर्य की मांग करती है. आटे को विशेष तरीके से गूंथना, उसे खमीर उठाने देना और पारम्परिक बर्तनों में पकाना आसान कार्य नहीं है. तेज़ रफ्तार जीवनशैली में लोगों के पास इतना समय नहीं बचता.

पोषण से भरपूर

खाद्य विशेषज्ञ बताते हैं कि ये व्यंजन न केवल स्वादिष्ट बल्कि पोषण से भरपूर भी हैं. देसी घी, अखरोट, खसखस या दालों की भरावन से तैयार सिड़ा ऊर्जा का अच्छा स्रोत है और ठंडे पहाड़ी मौसम में शरीर को गर्म रखने में सहायक होता है.

सांस्कृतिक पहचान पर खतरा

स्थानीय बुजुर्गों का कहना है कि सिड़ा–असका केवल भोजन नहीं, बल्कि पहाड़ की सांस्कृतिक पहचान हैं. यदि इन्हें संरक्षित नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ियां अपनी पारम्परिक स्वाद- विरासत से वंचित रह जाएंगी.

संरक्षण की पहल जरूरी

सांस्कृतिक संगठनों और स्वयं सहायता समूहों का सुझाव है कि स्कूलों, मेलों और पर्यटन उत्सवों में इन व्यंजनों को बढ़ावा दिया जाए. साथ ही, स्थानीय होटलों और होमस्टे में इन्हें शामिल कर पारम्परिक खानपान को पुनर्जीवित किया जा सकता है.

‘सिड़ा–असका’ जैसे पारम्परिक पहाड़ी व्यंजन केवल स्वाद नहीं, बल्कि संस्कृति और इतिहास की धरोहर हैं. आवश्यकता है कि समाज और सरकार मिलकर इन्हें नई पीढ़ी तक पहुंचाने के ठोस प्रयास करें, ताकि पहाड़ का यह अनमोल स्वाद भविष्य में भी जीवित रह सके.

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