मेहल/म्येलु एक बहुउपयोगी लेकिन उपेक्षित हिमालयी वृक्ष प्रजाति: बन सकता उद्यान की जीवन रेखा!

Mehul

 

J P Maithani

जे. पी. मैठाणी

उत्तराखंड के लोक जीवन में काफल पाक्यो मेल नी चाख्यो – एक शानदार लोक कथा या कहानी है. इस मामले में हमारे लोक कथाओं में म्येलू या महल, कुछ लोग इसको जंगली नाशपाती भी कहते हैं, हिमाचल में कैंथ कहते हैं – इसको वो स्थान नहीं मिला जबकि ये मेहल का पौधा भी बेहद महत्वपूरण है और कई गुणों से भरा हुआ है!

अंगरेजी में इसको Himalayan pear या Wild pear भी कहते हैं, और वनस्पति विज्ञान में इसको -Pyrus pashia, पाइरस कुमाऊनी, पाइरस नेपालेंसिस कहते हैं! म्येलु या मेहल का पौधा मध्य हिमालयी क्षेत्रों में समुद्र तल से लगभग 750 मीटर से 2200 मीटर की ऊंचाई तक होता है। इसके व्यापक प्रसार में इसके फलों के बीजों का प्रसार चिड़िया की बीट या अन्य जानवारों द्वारा इसके फलों को खाकर किये गए मलत्याग से भी होता है!  इसका पेड़ सामान्यत 4 मीटर से 16 मीटर उंचाई तक जा सकता है और इसका घेरा लगभग७ मीटर तक हो सकता है।

हमारी गाँव की कहानियाँ और और खुद हमारे बचपन के प्रिय पेड़ – म्येलु या महल के जिक्र के बिना बचपन अधूरा सा लगता है क्यूंकि जैसे ही नए साल का आगाज होता – पीपलकोटी के आस पास तो पय्याँ और मेहल के पेड़ों पर – सबसे सुन्दर सफेद फूल सबसे पहले खिलते और बहुत सारी मधुमाक्खियां इन पेड़ों पर मंडराती! फूल सक्रांति के अवसर पर भी फ्यूंली के पीले फूलों के साथ – पय्याँ और महल के फूल भी आँगन में, देहरी में, खोली, में, डण्ड्याली में और गाँव के मंदिरों के द्वार पर बिखेरे जाते!

Mehul

पहाड़ों में  जैसे ही शीत का आगाज़ होता मेहल भी पय्यां के पेड़ की तरह पत्तियों को छोड़कर पतझड़ के आगोश में समा जाता। इस समय पेड़ पर जो मेहल के फल लटके रहते वो अधिकतर पक कर भीतर से काले, मीठे गूदे से भर जाते। और यही समय होता जब बहुत सारी चिड़िया, बंदर, लंगूर, भालू के लिए ये बहुत प्रिय भोजन होता वैसे गाय के साथ गये ग्वाले, गाँव की घसियारियां और स्कूल के बच्चे भी मेहल के फलों का खूब आनन्द लेते। फल के भीतर चार-पांच बीज अवश्य होते ठीक वैसे, जैसे नाशपाती या सेब में भी होते हैं। यही वजह है कुमाऊं की गोला नाशपाती की ग्राफ्टेड पौधे के साथ-साथ हिमाचल के किसान बड़ी मात्रा में मेहल के बीजों से उगाई गयी पौधों पर ही नाशपाती, पोलम, सेब की सायन लगाकर ग्राफ्टेड पौधे तैयार करते हैं।

वनस्पति विज्ञान में इस वजह से भी मेहल को Pyrus kumaun और Pyrus nepalensis  भी कहते हैं। उत्तराखण्ड राज्य बनने से पहले सारे कुमांऊं की गोला नाशपाती से किसान कम्पनी उन्नत किस्म का जैम बनाती थी। लेकिन राज्य बनने के बाद पहाड़ से गोला नाशपाती के पौधों की नर्सरियां और बागान उपेक्षित हो गये। साथ ही नर्सरी की डिमांड और फल उद्यानों की बजाय जमीनों को बेचने के प्रति उत्तराखण्ड के ग्रामीणों के रूझान की वजह से मेहल पर भी संकट आया है। कुछ सामाजिक संस्थाओं ने जनपद चमोली में मेहल के बड़े पेड़ों पर ही सीधे नाशपाती की कटिंग लगाना शुरू किया था। जो एक अभिनव प्रयोग था।

वन विभाग की नर्सरियों से भी गायब हुआ मेहल

राज्य बनने के बाद वन विभाग नर्सरियों से काफल, भीमल, बुरांश, भमोरा, हिसोल, किल्मोड़, च्यूरा आदि की तरह मेहल को भी नर्सरी पौध के रूप में विकसित करने का प्रचलन लगभग ख़त्म सा हो गया। इसलिए पिछले 26 वर्षों में उत्तराखण्ड के अलग-अलग वन प्रभागों में होने वाले वनीकरण और नर्सरी स्थापना के वर्कप्लान से ये सभी प्रजातियां लगभग गायब हो गयी हैं। कड़वा सच ये है कि नये-नये वनाधिकारी और आई0एफ0एस0 तक हिमालय के वनों के इकोसिस्टम की इन महत्वपूर्ण प्रजातियों को दरकिनार किये हुए हैं। इस वजह से  जंगली जानवरों, पक्षियों, छोटे शाकाहारी जीवों जैसे- बंदर, लंगूर, भालू, ऊदबिलाव, मंगूज आदि को जंगलों के भीतर खाने के लिए कुछ बचा नहीं है। इसलिए वे गाँवों की तरफ आकर कृषि-उद्यानों को और पारंपरिक फसलों को नष्ट कर रहे हैं।

उद्यान विभाग भी कर रहा है मेहल की उपेक्षा

अगर उद्यान विभाग सक्रियता से ग्राम पंचायतों, वन पंचायतों, कैम्पा, जलागम, एन0आर0एल0एम0 और अन्य विभागों द्वारा चलाई जा रही विभिन्न परियोजनाओं में अन्य जंगली फलों के साथ-साथ मेहल की नर्सरी- मातृ वृन्त/ रूट स्टाक के लिए उगाया जाता और संरक्षित किया जाता तो हजारों गाँवों में पहले से मौजूद लाखों मेहल के पेड़ों से अच्छी नाशपाती का उत्पादन किया जा सकता है। लेकिन क्योंकि इस तरह के प्रयोगों में मेहनत ज्यादा और भ्रष्टाचार कम होता है इसलिए अन्य प्रजातियों की तरह मेहल को भी छोड़ दिया गया है।

बॉक्स में डाल दीजिये -इसके फल को लिवर के लिए काफी फायदेमंद बताया जाता है। एक अध्ययन के अनुसार इसके फलों में 6.8 प्रतिशत शर्करा, 3.7 प्रतिशत प्रोटीन 1 प्रतिशत राख ०.4 प्रतिशत प्रेक्टिन होता है। इसके अलावा 0.026 प्रतिशत फास्फोरस, ०.475 प्रतिशत पोटेशियम ,0 .475 प्रतिशत कैल्शियम ,0 .0 61 प्रतिशत मैग्नेशियम, 0 .0 27 प्रतिशत और लोहा 0 .0 0 6 प्रतिशत लोहा होता है।

मधुमक्खी पालन और मेहल का योगदान

ठीक ऐसे समय में जब पहाड़ों में बर्फबारी होती है और मधुमक्खियों के लिए फूल पुष्पों की आवश्यकता होती है तब मकरंद या पराग के लिए पय्यां और मेहल दिसम्बर से फरवरी तक मधुमक्खियों के लिए बेहद उपयोगी रहता है।इन फोल्लों से बने शहद के बेहद लग गुण हैं और ये महंगा भी बिकता है!

मेहल से बनते हैं कृषि औजारों के हत्थे

घिंघारू और मेहल का बहुपयोग दरांती, थमाला, कुल्हाड़ी, कुदाल, फावड़ा, गैंती, बांसूला, डाडणु (मिट्टी के ढेले फोड़ने का लकड़ी का हथौड़ा), पहाड़ी हल और जोल  के कुछ हिस्से बनाने में किया जाता है। यही नहीं मेहल के पेड़ों पर कांटे होने की वजह से इसकी टहनियों का उपयोग घेरबाड़ के लिए भी किया जाता है।

मेहल और चिड़ियों का पर्यावास

मेहल का पेड़ चिड़ियों के लिए बेहद सुरक्षित पर्यावास माना जाता है। इस पेड़ की चैड़ी पत्तियों और कांटों की वजह से हिमालय की कई छोटी चिड़िया इसको अपना सुरक्षित आवास मानती हैं जिसमें गोरैया भी शामिल है। गोरैया के अतिरिक्त बुलबुल, उल्लु, बार्बलर, राबिन, सन बर्ड, घुघती, फ्लाई कैचर, तोते भी मेहल पर घोंसला बनाना पसंद करते हैं।

Mehul

उपरोक्त महत्वपूर्ण उपयोगों के बावजूद भी मेहल एक उपेक्षित प्रजाति है इसके पेड़ 12-15 मीटर से ज्यादा बड़े नहीं होते। सूखकर गिरी हुई  पत्तियां कम्पोस्ट का अच्छा संसाधन होती हैं। आज समय की मांग है कि मेहल के पौधों को फिर से संरक्षित किया जाए और मातृ वृन्त/मदर प्लान्ट के रूप मेहल के पौधों की नर्सरी बनायी जाए। जंगलों से लगे गाँवों में जंगली जानवर ग्रामीणों की फसलों को नुकसान ना पहुंचाए इसलिए जंगल की ऊसर, बंजर, भूस्खलन वाली जमीनों में मेहल का रोपण किया जाना चाहिए।

कैसे बनायें मेहल की नर्सरी

आजकल मेहल के फल पकने लगे हैं। इन फलों को एकत्रित कर चार-पांच दिन के लिए पुरानेी बोरी या पराल के नीचे ढक कर रख दें। उसके भीतर हवा जा ना पाये। 4-5 दिन बाद ये फल पक जाएंगे। इनको टब या जाली में निकालकर हाथों से मसल कर बीजों को छान कर अलग कर लें। थोडा धुप में सूखा दें, फिर  उसमें बावस्टिन या अन्य फफूंदनाशक का उपचार कर उपचारित बीजों को तुरंत ही रेतीली और पूरी तरह सड़े हुए गोबर मिट्टी की क्यारियों में लाईन से बो दें। ये बीज फरवरी के अंतिम सप्ताह या मार्च में उगने लगेंगे। 10 किलो मेहल के फलों से लगभग एक किलो बीज निकल सकता है। और एक किलो बीज से लगभग तीन हजार से अधिक पौध तैयार की जा सकती है। 7-8 माह बाद इन्हीं पौधों को ग्राफ्टिंग के लिए उपयोग में लाया जा सकता है। अगर ग्राफ्टिंग ना करनी हो तो मेहल के पेड़ों को नवम्बर से फरवरी के मध्य सेब आड़ू, पोलम की तरह पर्णपाती फल वृक्षों की तरह रोपण कर संरक्षित किया जा सकता है।

आगाज़ फैडरेशन के पीपलकोटी स्थित बायोटूरिज़्म पार्क में संस्था के कार्यकर्ता दिलबर सिंह नेगी, जयदीप किशोर, रेवती देवी, ममता देवी, जमुना देवी, अनीता देवी, गुड्डी देवी ,  रीना देवी द्वारा 5000 मेहल के पौधों की नर्सरी तैयार की जा रही है। इसके अलावा संस्था द्वारा किल्मोड़, काली पीली हिंसोल, लोध्रा, टिमरू, आदि की पौध भी तैयार कर किसानों को निःशुल्क उपलब्ध करवा रही है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में मेहल की एक पौध की कीमत रू0 200-400 तक है। जबकि स्थानीय स्तर मेहल की पौध 15 से 20 रूपये में तैयार की जा सकती है।

मेहल जहाँ सामाजिक-सांस्कृतिक गीत संगीत और पहाड़ की सांस्कृतिक विरासत का केन्द्र है वहीं पलायन की पीड़ा झेल रहे उत्तराखण्ड के भूतहा होते गाँवों में स्वरोजगार के प्रयासों में एक महत्वपूर्ण प्रजाति हो सकता है।

वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि पीपल बरगद की तरह मेहल, किल्मोड़, हिंसोल कार्बन उत्सर्जन को कम करने में सहायक होते हैं। हम आशा कर सकते हैं की, आने वाले समय में फल उद्यान के विकास के साथ साथ पहाड़ के म्येलु या मेहल के सफेद फूलों के बाद के काले गूदे वाले फल की बयार पहाड़ी गाँवों में फिर से दिखाई देगी। और हम कह पायेंगे-

 अब नहीं रहा मेहल उदास

वो जगा रहा है रोजगार की नयी आस!!

Himalayan Pear is a small or medium-sized deciduous tree, found in the Himalayas. It is also cultivated for its fruit. Leaves are ovate to broadly lance-shaped, long-pointed, toothed, hairless and shining. Leaves are 5-10 cm long, those on sucker shoots are often 3-5-lobed. Young leaves are white-woolly. Flowers are 2-2.5 cm across, with white obovate petals with darker veins. Sepal cup is urn-shaped with spreading white-woolly sepals. Fruit is round, 1.3-2.5 cm, dark brown, covered with raised pores. Fruit is edible when half-rotten. Himalayan Pear is found in the Himalayas, from Afghanistan to SW China and Burma, at altitudes of 750-2700 m. Flowering: March-April.

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