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विश्व वैटलैंड्स डे: जैव विविधता के संरक्षण का दिन

  • डॉ. मोहन चंद तिवारी

आज 2 फरवरी को भारत सहित दुनियाभर के देशों में ‘विश्व वैटलैंड्स डे’ मनाया जा रहा है,जिसका उद्देश्य है- विश्व में आर्द्रभूमि को विलुप्त होने से बचाना और उसके सरक्षण के लिए लोगों में जागरूकता पैदा करना.

‘विश्व आर्द्रभूमि दिवस’ पर आर्द्रभूमि को लुप्त होने से बचाने का यह विचार एक पर्यावरणवादी आंदोलन भी है,जिसकी सफलता के लिए हर प्रकार के मानवीय, राजनीतिक और वित्तीय धरातल पर प्रयत्न किए जाने चाहिए, ताकि जिन आर्द्र भूमियों को हमने अब तक लुप्त होने दिया है,उन्हें पुनर्स्थापित किया जा सके.

30 अगस्त 2021 को संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा स्वीकृत प्रस्ताव के तहत इस वर्ष ‘विश्व वैटलैंड्स दिवस’ 2022 का थीम रखा गया है- ‘वेटलैंड्स एक्शन फॉर पीपल एंड नेचर’. जिसका हिंदी में आशय है लोगों और प्रकृति के लिए आर्द्रभूमि के प्रति कार्यवाही,जो मनुष्यों और ग्रहों की अनुकूलता के लिए भी आर्द्रभूमि के संरक्षण और सतत उपयोग के महत्त्व पर प्रकाश डालता है.

क्योंकि आर्द्रभूमि न केवल पृथ्वी पर बल्कि खगोलीय ग्रह नक्षत्र की दृष्टि से भी प्रमुख भूमिका निभाती है. इसलिए आज का यह दिन दुनिया पर वैटलैंड्स के प्रभाव और सकारात्मक उत्पादन को पहचानने और मनुष्य को प्रकृति के द्वारा आर्द्र स्वभाव की महत्ता समझाने का भी विशेष दिन है. आद्रता, वस्तुतः मानव स्वभाव की एक निर्मल करुण अभिव्यक्ति है.

‘वर्ल्ड वैटलैंड्स डे’ का इतिहास

‘वर्ल्ड वैटलैंड्स डे’ का इतिहास 50 साल पुराना है. समूचे विश्व में नदियों, झीलों, तालाबों,नौलों,धारों आदि जलस्रोतों की लुप्त होती स्थ‍िति को देखते हुए वर्ष 1971 में 2 फरवरी को ईरान के रामसर शहर में वैटलैंड कन्वेंशन को वैश्विक स्वीकृति मिली और ‘वैटलैंड’ के संरक्षण के लिए विश्व के अनेक देशों ने एक अंतरराष्ट्रीय संधि पर हस्ताक्षर किए. तब से हर वर्ष सरकारी एजेंसियों और गैर-सरकारी पर्यावरणवादी  संगठनों द्वारा वेटलैंड के प्रति जागरूकता बढ़ाने और उसके संरक्षण के लिए यह  दिवस मनाया जाता है.

आर्द्र भूमि क्या है?

आर्द्र भूमि ऐसी भूमि होती है जिसमें या तो स्थायी रूप से या फिर मौसमी तौर पर पानी भरा रहता है और यह एक अलग प्रकार की पारिस्थितिकी को जन्म देती है. पानी से संतृप्त (सचुरेटेड) भूभाग को भी आर्द्रभूमि (वाटरलैंड) कहते हैं. रामसर कन्वेंशन में स्वीकार की गयी परिभाषा के अनुसार आर्द्रभूमि ऐसा स्थान है जहां वर्ष में कम से कम आठ माह पानी भरा रहता है.

वाष्पीकरण की कारक भूमि

भारत के सन्दर्भ में ‘आर्द्र भूमि’ का मानसून वैज्ञानिक और जलवैज्ञानिक दृष्टि से भी विशेष महत्त्व है. वैटलैंड्स मध्य भारत के कटिबंधीय मानसूनी क्षेत्रों से लेकर दक्षिण के नमी वाले क्षेत्रों तक फैले हुए हैं. भारत में दो प्रकार के मानसूनों के निर्माण और वर्षा ऋतु का मौसम उत्पन्न करने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका रहती है. वैटलैंड्स ऐसे पारिस्थितिक तंत्र का निर्माण करते हैं,जहां स्थलीय और जलीय हैबिटैट (जीवजन्तु ) दोनों मिलते हैं.वाष्पीकरण के कारण वह मानसूनों की वर्षा का कारक भी होती है.आर्द्र भूमि में सर्वाधिक उत्पादकता होने के कारण इनका सामाजिक आर्थिक एवं पारिस्थितिकी महत्त्व बहुत अधिक होता है.

वैश्विक स्तर पर  समूचे विश्व में अब तक  कुल 1929 से अधिक आर्द्रभूमियों को चिह्नित किया जा चुका है. संयुक्त राज्य के फोरिडा का इवरग्लैडस सबसे बड़ा आर्द्रभूमि स्थल है. जैव विविधता की दृष्टि से आर्द्रभूमियां अत्यन्त संवेदनशील होती हैं. विशेष प्रकार की वनस्पतियां ही आर्द्रभूमि पर उगने और फलने-फूलने के लिये अनुकूल होती हैं.

वर्ष 2020 में विश्व आर्द्रभूमि दिवस की थीम थी ‘वेटलैंड्स एंड बायोडायवर्सिटी’ अर्थात् आर्द्रभूमि और जैव विविधता. वैट लैंड प्राकृतिक जैव विविधता के अस्तित्व के लिए बहुत आवश्यक है. दुर्लभ होते पक्षियों और जानवरों की प्रजातियों, देशज पौधों और कीड़ों को आर्द्र-भूमि ही आश्रय प्रदान करती हैं.

वेटलैंड्स का महत्त्व जलीय और स्थलीय जीव-जंतुओं की दृष्टि से ही नहीं बल्कि विविध प्रकार की वनस्पतियों और औषधीय पौधों के संरक्षण की दृष्टि से भी रहा है. ब्राह्मी,नागरमोथा आदि अनेक ऐसी  उपयोगी वनस्पतियां एवं औषधीय पौधे हैं,जो आर्द्रभूमि वाले स्थानों पर ही प्रचुर मात्रा में मिलते हैं. इसके अलावा कृषि के क्षेत्र में भी चावल की खेती और मछली का उत्पादन इस ‘वैटलैंड्स’ के पारिस्थितिकी तंत्र के कारण ही सम्भव हो पाता है.

भारत में इस समय 47 रामसर स्थल हैं,जिनमें से एक उत्तराखंड का भी देहरादून स्थित ‘आसन कंजर्वेशन रिजर्व’ है. वर्ष 2020 में इसे मान्यता मिली.

पृथ्वी में कई तरह के जलवायु क्षेत्र हैं. कहीं पहाड़ हैं, तो कहीं मैदान ,कही नदियां,झरने और समुद्र हैं तो कहीं रेतीले प्रदेश है.

इस भौगोलिक विविधता के कारण ही दुनिया के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग प्रजातियां पाईं जाती है.भारत में भौगोलिक भिन्नता के आधार पर वेटलैंड्स की अवस्थिति को चार वर्गों में वर्गीकृत किया गया है,जो इस प्रकार हैं-

  1. हिमालयी आर्द्रभूमि,
  2. गंगा के मैदान में आर्द्रभूमि,
  3. रेगिस्तान में आर्द्रभूमि और
  4. तटीय आर्द्रभूमि

भारत में आर्द्रभूमि के संरक्षण और प्रबंधन के लिए वर्ष 2012-13 में राष्ट्रीय आर्द्रभूमि संरक्षण कार्यक्रम लागू किया गया था.

भारत के जल वैज्ञानिक चक्रपाणि मिश्र (सोलहवीं शताब्दी) ने अपने ग्रन्थ ‘विश्ववल्लभ-वृक्षायुर्वेद’ में भारतवर्ष के विविध प्रदेशों को जलवैज्ञानिक धरातल पर विभिन्न वर्गों में विभक्त करके वहां की वानस्पतिक तथा भूगर्भीय विशेषताओं को चिह्नित किया है जो वर्त्तमान सन्दर्भ में भी अत्यन्त प्रासंगिक है.

भारत के जलवैज्ञानिक चक्रपाणि मिश्र ने अपने ग्रन्थ ‘विश्ववल्लभ वृक्षायुर्वेद’ में भूमिगत जल की आद्रता के आधार पर  और जैव विविधता की दृष्टि से भारत के पांच जलागम क्षेत्रों का निर्धारण किया है. ये पांच प्रदेश हैं- 1.मरु देश,.2.जांगल देश,3.अनूप देश,4.साधारण देश और 5.पर्वतीय देश. किन्तु इन पांचों प्रदेशों के जलागम क्षेत्र और वहां की वानस्पतिक विविधता अलग अलग प्रकार की है.

चक्रपाणि मिश्र पर्वतीय देश के बारे में बताते हैं कि जहां बहुत अधिक मात्रा में पर्वत शृंखलाएं तथा कन्दराएं हों वहां चट्टानों के नीचे जल की उपलब्धि रहती है. ऐसे क्षेत्र में पर्वतीय झरने नित्य प्रवाहमान रहते हैं. पर्वतीय प्रदेशों में जलागम को प्रेरित करने वाली वनस्पतियों में,वट, गूलर, पलाश, पीपल, बहेड़ा, जामुन, सिन्दुवार, कमल, काकच आदि मुख्य हैं. पर्वतीय प्रदेशों में छिद्रहीन, चिकने पत्ते,दूधियां लताएं आदि निकटस्थ भूमिगत जल को सूचित करती हैं-

स्निग्धाश्च निश्छिद्रदलाः यदा
स्युरनोकद्र गुल्मलताः सदुग्धा.
चित्रस्वनाः पक्षिगणाः वसन्ति
तत्रम्बुमिष्टं निकटे प्रदिष्टम्..” -विश्व.1.44

चिंता की बात है कि 1700 के दशक से दुनिया की लगभग 90 प्रतिशत वेटलैंड्स का क्षरण हो चुका है, पर्यावरणवादियों के अनुसार समूचे विश्व में तीन गुना तेजी से वेटलैंड्स लुप्त हो रहे हैं. वेटलैंड्स पर्यावरण के संरक्षण की दृष्टि से वह महत्त्वपूर्ण  पारिस्थितिकी तंत्र हैं जिसका जैव विविधता,जलवायु संवर्धन और भूमिगत जल के संरक्षण में विशेष योगदान रहता है.

इस लिए आज बहुत जरूरी है कि हम आर्द्रभूमि के बारे में राष्ट्रीय और वैश्विक जागरूकता बढ़ाएं ताकि उनके तेजी से लुप्त होने वाले कारणों की गम्भीरता से पड़ताल की जा सके और उन्हें संरक्षित करने और बहाल करने के लिए कार्य योजनाओं को प्रोत्साहित किया जा सके. विश्व आर्द्रभूमि दिवस लोगों की समझ बढ़ाने का आदर्श समय है.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज से एसोसिएट प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हैं. एवं विभिन्न पुरस्कार व सम्मानों से सम्मानित हैं. जिनमें 1994 में ‘संस्कृत शिक्षक पुरस्कार’, 1986 में ‘विद्या रत्न सम्मान’ और 1989 में उपराष्ट्रपति डा. शंकर दयाल शर्मा द्वारा ‘आचार्यरत्न देशभूषण सम्मान’ से अलंकृत. साथ ही विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े हुए हैं और देश के तमाम पत्र—पत्रिकाओं में दर्जनों लेख प्रकाशित.)

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