January 19, 2021
उत्तराखंड

न्यायदेवता ग्वेलज्यू की जन्मभूमि कहां? धूमाकोट में, चंपावत में या नेपाल में?

  • डॉ. मोहन चन्द तिवारी

उत्तराखंड के न्याय देवता ग्वेलज्यू के जन्म से सम्बंधित विभिन्न जनश्रुतियां एवं जागर कथाएं इतनी विविधताओं को लिए हुए हैं कि ग्वेल देवता की वास्तविक जन्मभूमि निर्धारित करना आज भी बहुत कठिन है. because न्याय देवता की जन्मभूमि धूमाकोट में है,चम्पावत में है या फिर नेपाल में? इस सम्बंध में भिन्न भिन्न लोक मान्यताएं प्रचलित हैं. कहीं ग्वेल देवता को ग्वालियर कोट चम्पावत में राजा झालराई का पुत्र कहा गया है तो किसी जागर कथा में उन्हें नेपाल के हालराई का पुत्र बताया जाता है. विभिन्न क्षेत्रों में प्रचलित पारम्परिक जागर कथाओं और लोकश्रुतियों में भी but न्यायदेवता ग्वेल की जन्मभूमि के बारे में अनिश्चयता की स्थिति देखने में आती है. पिछले कुछ वर्षों में जो ग्वेल देवता से सम्बंधित लिखित साहित्य सामने आया है,उसमें भी जन्मभूमि के सम्बंध में भ्रम की स्थिति बनी हुई है. उदाहरण के लिए मथुरादत्त बेलवाल द्वारा सन् 1981 में लिखी जागर ‘बाला गोरिया’ के अनुसार ग्वेल का जन्म जिस राजपरिवार में हुआ वे चम्पावत के राजा थे-

हाथी की माँ

“चम्पावत राजधानी,राजा झालराई.
अमर कहानी छयौ सुणि लिया भाई.”

किन्तु जब बेलवाल ने सन् 1998 में ‘जै so उत्तराखंड जै ग्वेलदेवता’ पुस्तक लिखी तो अपनी धारणा बदल दी but और चम्पावत के स्थान पर ‘राजा ग्वेल के पिता झालराई को ‘धौली धूमाकोट’ का राजा लिख दिया-

हाथी की माँ

“धौली धूमाकोट का राजा-राजा झालराई,
अमर कहानी छयौso सुणि लिया भाई.”
‘जै उत्तराखंड जै but ग्वेलदेवता’, पृ.27

हाथी की माँ

इतना तो स्पष्ट है कि राजा ग्वेल के because जन्मस्थान के बारे में जागर कथाओं में दो मुख्य मान्यताएं प्रचलन में रही हैं.कहीं ग्वेल की जन्मभूमि धुमाकोट मानी जाती है तो कहीं उन्हें चम्पावत का राजा कहा जाता है. ‘श्रीगोलू-त्रिचालिसा’ के लेखक श्री ब्रजेन्द्र लाल शाह ने इस सम्बंध में युक्तिसंगत समाधान प्रस्तुत करते हुए बताया है कि कत्यूरी राजाओं के समय में धुमाकोट चम्पावत का ही मांडलिक राज्य था और ग्वेल के पिता because और उनके पूर्वज उन दिनों चम्पावत राज्य के मांडलिक राजा रहे थे-

“सदियों से है चलती आई,
गोलु ज्यू की soगाथा सुखदाई.
वंश कत्यूरियों butकी यह गाथा,
वर्णन करूँbecause नवाऊं माथा..
चंदों से पहले soचम्पावत,
था कत्यूरियों केbut हि मातहत.

धुमाकोट becauseइसका एक मंडल,
तलराई राजा so थे उस थल..
लोकविदित but राजा तलराई,
उनके पुत्र because हुए हलराई.
हलराई के so पुत्र प्रतापी,
झालु राई की but कीर्ति थी व्यापी..”
   -श्रीगोलू-त्रिचालिसा,पृ.5

हाथी की माँ

उधर संस्कृत साहित्य के जाने माने लेखक डा. हरिनारायण दीक्षित जी ने अपने संस्कृत में लिखे ‘श्रीग्वल्लदेवचरितम्’ महाकाव्य में ग्वेलदेवता का जन्म स्थान कूर्मांचल स्थित धुमाकोट बताया है –

“पुरा कुर्मांचले पुण्ये धूमाकोटाभिधे पुरे.
हालरायाभिधो भूपो बभूव बहुविश्रुतः..
तलरायस्य पौत्रोsसौ झालरायस्य चात्मजः.
क्रमप्राप्तं निजं राज्यं पालयामास धर्म्मवित्..”
     -श्रीग्वल्लदेवचरितम्,3.2-3

कई जागर कथाओं में ग्वेल देवता की जन्मभूमि के रूप में चंपावत के अलावा नेपाल धोली धूमाकोट का भी जिक्र आता है-

हाथी की माँ

“गोरिया महाजन के राजा तुमारौ नाम लिनों.
दुदाधारी कृष्ण अवतारी because तुमारौ नाम छ..
ग्वेल गोरिया भनरिया so गोरिया चौरिया गोरिया.
राजवंशी देव छ but जसकारी नमन का भोगी..
नेपाल धोली धुमाकोट so में तुमरो जनम.
थात बतौनि भगवान but इष्ट देवता कुल देवता..
बु बु हाल राई बाबु so झालराई माता कालिंका
अवतारी जसकारी because भगवान तुमारो नाम छ..”

हाथी की माँ

अभी हाल ही में ग्वेलदेवता के इतिहास पर शोध करने वाले पत्रकार मनोज इष्टवाल ने नेपाल स्थित उक्का महल को ग्वेलदेवता की जन्मभूमि के रूप में चिह्नित करने का प्रयास किया है because और नेपाल के आराध्य देव हुनैनाथ की पहचान न्यायदेवता ग्वेल के रूप में की है. उनका कहना है कि स्थानीय मान्यता के अनुसार जैसे उत्तराखंड में ग्वेलदेवता को न्याय का देवता माना जाता है वैसे ही नेपाल में हुनैनाथ भी न्याय के देवता माने जाते हैं. हुनैनाथ का वाहन भी घोड़ा है और वे भी खड्गधारी देव हैं.उनका मंदिर उक्कू गविस से एक किमी आगे ‘सलेती’ गांव में बताया जाता है.

हाथी की माँ

‘हिमालयन डिस्कवर.कॉम’ वेब पोर्टल में 3 जून, 2017 को प्रकाशित एक लेख के माध्यम से पत्रकार मनोज इस्टवाल ने यह भी दावा किया है कि उन्होंने गहन शोध के पश्चात न्याय देवता गोलज्यू महाराज की वास्तविक जन्मस्थली की पहचान पश्चिमी नेपाल के महाकाली आँचल because में दार्चुला जिले में स्थित उक्कु महल के रूप में की है. स्थानीय मान्यता के अनुसार नेपाल का यह उक्कु महल गोरिल देवता के दादा हालराई, झालराई के वंशजों का किला माना जाता है. मनोज इष्टवाल अपनी इस खोज का कारण बताते हुए so कहते हैं कि जब उन्होंने बिंता उदयपुर के गोल्ज्यू देवता के दरबार में ग्वेल देवता के डंगरिये द्वारा उक्कू महल की बात अपनी वार्ता में रखी तभी से उन्होंने ग्वेल देवता के जन्मस्थान से सम्बंधित अपनी शोधयात्रा शुरू कर दी थी और लगभग दो बर्ष बाद वे पश्चिमी नेपाल के उक्त महाकाली स्थित दार्चुला जिले में ग्वेलदेवता के पूर्वजों की इस प्राचीन धरोहर स्वरूप उक्कू महल के खंडहरों को खोजने में सफल हो पाए

हाथी की माँ

उक्कु महल के खंडहरों के चित्र. साभार हिमालयन डिस्कवर

विदित हो कि मनोज इष्टवाल so ने 11 मार्च 2018 को अपने सहयोगी जीवनचन्द जोशी व दिनेश भट्ट के साथ लगभग 4.50 कि.मी. पैदल चलते हुए जौलजीवी झूला पुल पार कर उक्त उक्कू महल के खंडहरों का पता लगाया. वहां पहुंचने के बाद उन्हें विशाल आकार के शिलाखंड दिखाई दिए, जिनमें ब्रह्मा, विष्णु, महेश,विष्णु और लक्ष्मी की मूर्तियां उकेरी गई थीं. ये शिलाखंड बिल्कुल उसी आकार के बताए जाते हैं जैसे जागेश्वर मंदिर समूह but और केदारनाथ मंदिर पर लगे पाषाणखंड हैं.वहां उक्कू महल के खंडहरों में पाषाण खंडों में खुदे शिलालेख भी मिले हैं, जिनकी भाषा को आज तक नहीं पढा जा सका है.

हाथी की माँ

भौगोलिक दृष्टि से हुनैनाथ वर्त्तमान में पश्चिमी नेपाल के महाकाली आँचल के ज़िला दार्चुला में एक ग्राम विकास so समिति का इलाका है,जो गौरी नदी व काली नदी की सीमा पर स्थित जौलजीवी भारत के अंतर्गत आता है. यहां पर गौरी नदी व काली नदी एक दूसरे से मिलती है. कहा जाता है कि झूला घाट के पास रतवाडा व नेपाल के ज़िला बैतड़ी के सेरा ग वि स के पास आज भी वह बक्सा एक पत्थर के रूप में काली नदी में दिखाई देता है,ज़िसमें बाला गोरिया को बन्द करके बहाया गया था और वह वहीं अटक गया था. so कहते हैं काली नदी में कितनी भी बाढ़ क्यूँ न आ जाये वह पत्थर कभी डूबता नहीं है.वर्त्तमान में इस स्थान की पहचान भारत के ‘तालेश्वर’ नामक स्थान के निकट की गई है.

हाथी की माँ

पर विडम्बना यह है कि उक्कू महल के खंडहरों का नेपाल सरकार ने कभी पुरातात्त्विक सर्वेक्षण नहीं करवाया और न ही भारत के पुरातत्त्व विभाग ने ही इन ग्वेल देवता के इतिहास से because जुड़े पुरातात्त्विक स्थलों के सर्वेक्षण के प्रति कोई रुचि प्रकट की.इसलिए उक्कू महल की इन मूर्तियों की ऐतिहासिकता और काल निर्धारण करना आज बहुत कठिन है. हालांकि मनोज इष्टवाल के अनुसार ये पाषाण शिलाखंड लगभग 5000 वर्ष से भी अधिक पुराने हो सकते हैं. ऐसी स्थिति में ग्वेल देवता के पूर्वज राई वंशजों के इतिहास को इतने प्राचीनकाल तक स्थापित कर पाना और भी कठिन हो जाता है.

मनोज इष्टवाल की खोज का दूसरा because महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि उक्कू महल के खंडहरों में ब्रह्मा, विष्णु आदि पौराणिक देवों की मूर्तियों के जो अवशेष मिले हैं, उनमें ग्वेल देवता अथवा उनके पूर्वजों झाली राई,हाली राई की न तो मूर्तियां मिलीं हैं और न ही ऐसा कोई शिलालेख ही प्राप्त हुआ है,जिससे यह पुष्टि हो सके कि यह स्थान निश्चित रूप से ग्वेल देवता के पूर्वजों से सम्बंधित स्थान रहा होगा.

हाथी की माँ

किन्तु मनोज इष्टवाल द्वारा ग्वेल देवता because के जन्मभूमि की इस नई खोज का स्वागत ही किया जाना चाहिए कि उन्होंने न्यायदेवता ग्वेल की जन्मभूमि की खोज की दिशा में सराहनीय प्रयास किया. पर तथ्यात्मक वास्तविकता यह है कि उनकी यह मान्यता केवल स्थानीय जनश्रुतियों पर ही आधारित प्रतीत होती है. इसके लिए पुराततात्त्विक साक्ष्यों और शिलालेखों के साक्ष्यों को जुटाने की दिशा में भी शोधकार्य करने की विशेष आवश्यकता है.

हाथी की माँ

*सांकेतिक चित्र गूगल से साभार*  

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज से एसोसिएट प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हैं. एवं विभिन्न पुरस्कार व सम्मानों से सम्मानित हैं. जिनमें 1994 में ‘संस्कृत शिक्षक पुरस्कार’, 1986 में ‘विद्या रत्न सम्मान’ और 1989 में उपराष्ट्रपति डा. शंकर दयाल शर्मा द्वारा ‘आचार्यरत्न देशभूषण सम्मान’ से अलंकृत. साथ ही विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े हुए हैं और देश के तमाम पत्र—पत्रिकाओं में दर्जनों लेख प्रकाशित।)

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