देहरादून

विरासत से पहाड़ की विरासत गायब!

अर्जुन सिंह रावत

विरासत किसके लिए. कहते हैं संगीत की because कोई सीमा कोई दायरा नहीं होता लेकिन लोक को जीवित रखने के लिए उसे बताना भी जरूरी है और नई पीढ़ी से मिलाना भी. सबसे बड़ा सांस्कृतिक आयोजन कहकर प्रचारित किए जा रहे विरासत में देवभूमि की विरासत नदारद है. आयोजकों ने इसे महज रस्म अदायगी तक सीमित कर दिया है.

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उत्तराखंड के देहरादून में बड़े जोर-शोर से विरासत का आयोजन किया जा रहा है. ओएनजीसी जैसे बड़े-बड़े प्रायोजक भी हैं और संगीत जगत के कई धुरंधर भी. कबीर की वाणी भी मिलेगी, because सूफी कलाम भी मिलेगा, क्लासिकल डांस फॉर्म भी मिलेंगे, लेकिन नहीं है तो उत्तराखंड का लोकस्वर. उत्तराखंड के वाद्ययंत्र और जागर जैसी देव विधा की प्रस्तुति.

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कितनी हैरानी है न, जिस ढोल सागर, जागर को सम्मान देते हुए प्रीतम भरतवाण जी, बसंती देवी जी जैसे लोक साधकों को पद्मश्री सम्मान प्रदान किया गया, उनकी विरासत में न तो मौजूदगी है, न कहीं जिक्र. उत्तराखंड की लोक विरासत को सहेजने, कई दशकों से निरंतर संवारने वाले संगीत नाटक अकादमी सम्मान से सम्मानित श्रद्धेय नरेंद्र because सिंह नेगी जी भी विरासत के आयोजन में शामिल नहीं हैं. कुमाऊं आंचल के खूबसूरत मिलम, जोहार, मुनस्यारी के लोकस्वर प्रह्लाद मेहरा, कैलाश कुमार भी इस मंच पर नहीं दिखेंगे. झोड़ा, चांचरी, न्योली, थड़्या, चौफुला और न जाने कितनी विधाएं हैं, क्या ये विरासत नहीं हैं. उत्तराखंड के लोक संगीत का सशक्त हस्ताक्षर डा. माधुरी बड़थ्वाल भी विरासत से दूर हैं. तो फिर विरासत किसकी, किसके लिए.

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विरासत का उत्तराखंड से कितना जुड़ाव है because आवरण (कवर) देखकर पता लग जाएगा, न पहाड़ है, न पहाड़ों का जिक्र. न उत्तराखंडी लोक है, न लोकस्वर. सोचिएगा ये विरासत किसकी और किसके लिए ?

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(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, हिमांतर because के संपादकीय सलाहकार एवं पहाड़ के सवालों को लेकर हमेशा मुखर रहते हैं)

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