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आंदोलन, लोकतंत्र, राष्ट्रीय एकता और इतिहास: स्वतंत्रता के बाद भारत

आंदोलन, लोकतंत्र, राष्ट्रीय एकता और इतिहास: स्वतंत्रता के बाद भारत

समसामयिक
 डॉ. रुद्रेश नारायण मिश्र राजनीति एवं मीडिया विशेषज्ञ भारत की स्वतंत्रता केवल सत्ता के हस्तांतरण की घटना नहीं थी; यह एक ऐसे राष्ट्र के पुनर्निर्माण की शुरुआत थी, जिसने सदियों की राजनीतिक अस्थिरता, औपनिवेशिक शासन, विभाजन और सामाजिक चुनौतियों के बाद स्वयं को लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में स्थापित किया। 1947 के बाद भारत का इतिहास केवल सरकारों और राजनीतिक दलों का इतिहास नहीं है। यह आंदोलनों, जनभावनाओं, असहमतियों, संघर्षों, बलिदानों और उन निर्णयों का इतिहास भी है, जिन्होंने देश की दिशा को बार-बार प्रभावित किया। यदि हम स्वतंत्र भारत के इतिहास को ध्यान से देखें, तो पाएँगे कि अनेक महत्वपूर्ण परिवर्तन आंदोलनों और जनदबाव के परिणामस्वरूप हुए। कभी आंदोलन ने सरकार को अपनी नीति बदलने के लिए विवश किया, कभी उसने लोकतंत्र को मजबूत किया और कभी किसी आंदोलन ने देश की एकता तथा संवैधानिक व्यवस्था ...
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कविताएं
भारती आनंदतानाशाही का अंत हुआ, फिर भारत में लोकतंत्र आया. जनता के द्वारा शासन यह, जनता का शासन कहलाया. जनता के हित की ही खातिर, नव नियमों का विधान किया. जन अधिकारों को आगे रखा, संविधान इसे नाम दिया.जन-जन की बात सुनेगा जो, जन-जन के लिए जियेगा जो. उसको ही चुनेंगे अपना शासक, जनता के साथ चलेगा जो. वो अपना ही तो भाई होगा, अपनी हर बात सुनायेगे. जो होगा भारत के हित में, हम काम वही करवायेंगे.मौलिक अधिकार मिले जनता को, जख्म पुराने भर जायेंगे. लोकतंत्र से चलता है भारत, दुनिया को दिखलायेंगे. लिखी जायेगी नई इबारत नया दौर फिर से आयेगा. बनकर कोई भी तानाशाही, अत्याचार न कर पायेगा.सत्तर वर्षो में देखो कैसे बदल गयी है परिभाषा. लोकतंत्र भी बदल गया है, बदल गयी सब अभिलाषा. काम के सारे रंग ढंग बदले,जनप्रतिनिधी हो गये नेताजी. कुछ दलों में हुए विभाजित, कुछ अपने में ही राजी.क्षेत्र...