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नंदादेवी राष्ट्रीय उद्यान में चतुर्थ जैव विविधता अनुश्रवण दशकीय अभियान सफलतापूर्वक संपन्न

नंदादेवी राष्ट्रीय उद्यान में चतुर्थ जैव विविधता अनुश्रवण दशकीय अभियान सफलतापूर्वक संपन्न

चमोली
 हिमांतर ब्यूरो, चमोलीयूनेस्को की विश्व प्राकृतिक धरोहर नंदादेवी राष्ट्रीय उद्यान में 7 से 28 जून तक आयोजित चतुर्थ नंदादेवी जैव विविधता अनुश्रवण दशकीय अभियान सफलतापूर्वक संपन्न हो गया। अभियान में शामिल वैज्ञानिकों, उत्तराखंड वन विभाग, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) तथा राज्य आपदा प्रतिवादन बल (एसडीआरएफ) की संयुक्त टीम ने उच्च हिमालयी क्षेत्र की जैव विविधता, वनस्पतियों, वन्यजीवों और हिमनदों का विस्तृत अध्ययन कर महत्वपूर्ण वैज्ञानिक आंकड़े संकलित किए। अभियान के दौरान दल ने लाता गांव से सरसोपाताल बेस कैंप तक दुर्गम हिमालयी क्षेत्रों का भ्रमण किया। इस दौरान कैमरा ट्रैप, ड्रोन, रिमोट सेंसिंग, भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस) तथा अन्य आधुनिक तकनीकों की सहायता से बुग्यालों, वृक्षरेखा, हिमनदों, दुर्लभ वनस्पतियों एवं वन्यजीवों का वैज्ञानिक आकलन किया गया।अध्ययन के दौरान हिमालयी ...
पर्वतीय क्षेत्रों में आजीविका का एक बड़ा स्रोत है रिंगाल!

पर्वतीय क्षेत्रों में आजीविका का एक बड़ा स्रोत है रिंगाल!

चमोली
उर्गमघाटी : उत्तराखंड  के पर्वतीय क्षेत्रों में रिंगाल ( हिमालयी बांस- अरूंडीनेशिया फल्काटा)   आजीविका का एक बहुत बड़ा स्रोत है. रिंगाल लगभग 10वीं शताब्दी से पहाड़ के समाज को कृषि के योग्य बर्तन जैसे- सुप्पा, कंडा, चंगेरा, सोल्टा, तेथला और अनाज और बीज रखने के लिए क्वोन्ना आदि बनाने में प्रयोग किया जाता रहा है. वर्तमान में जनपद चमोली में कई स्थानों पर रिंगाल हश्तशिल्प  का निर्माण और उन पर आधारित स्वरोजगार संचालित होते हैं. उत्तराखंड बांस एवं रेशा विकास परिषद् और आगाज संस्था द्वारा वर्ष 2005 से जनपद चमोली में रिंगाल हश्तशिल्प  के कई शिक्षण प्रशिक्षण के कार्य किये गए. कालांतर में अलकनंदा स्वायत्त सहकारिता पीपलकोटी, हिमालय स्वायत्त सहकारिता पीपलकोटी ने रिंगाल हस्तशिल्प के अतिरिक्त प्राकृतिक रेशा- भांग और कंडाली के उत्पादों, के साथ-साथ, पूजा पाठ के मुखोटों के निर्माण के कार्यों को आगे बढाया....