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मौण मेला 2026: अगलाड़ नदी में 20 हजार लोगों ने किया सामूहिक मत्स्य आखेट

मौण मेला 2026: अगलाड़ नदी में 20 हजार लोगों ने किया सामूहिक मत्स्य आखेट

टिहरी गढ़वाल
  अगलाड़ नदी में आयोजित ऐतिहासिक मौण मेला 2026 में शामिल हुए हजारों लोग, 4 किमी तक चला सामूहिक मत्स्य आखेट  नीरज उत्तराखंडी, अगलाड़ (टिहरी गढ़वाल)उत्तराखंड की लोक संस्कृति में कई ऐसी परंपराएं हैं, जो अपनी विशिष्टता के कारण देशभर में अलग पहचान रखती हैं। टिहरी गढ़वाल की अगलाड़ नदी में आयोजित होने वाला ‘मौण मेला’ ऐसी ही एक अनूठी लोक परंपरा है। सामूहिक मत्स्य आखेट पर आधारित यह मेला शनिवार को हजारों लोगों की मौजूदगी में पूरे उत्साह और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ संपन्न हुआ। लगभग 20 हजार लोगों की भागीदारी के साथ यह आयोजन एक बार फिर उत्तराखंड की जीवंत सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक बन गया। दोपहर एक बजे मौनकोट क्षेत्र से शुरू हुआ सामूहिक मत्स्य आखेट अगलाड़-यमुना संगम तक लगभग चार किलोमीटर की दूरी में चला। परंपरा के अनुसार सभी पानत्तीदारों की उपस्थिति में नदी में टिमरू का पाउडर...
मौण मेला : आस्था, परम्परा और प्रकृति का जश्न

मौण मेला : आस्था, परम्परा और प्रकृति का जश्न

लोक पर्व-त्योहार
बचन सिंह नेगी उत्तरकाशी जिले के पांच गांव - नानई, बिंगसारी, खरसाड़ी, रमाल गांव और डोभाल गांव के लोग कई सदियों से बड़ी धूमधाम व खुशी से परम्परागत रीति-रिवाज के साथ मौण मेला मनाते हैं. यह मेला हर वर्ष जेठ के महीने में 20  गते अर्थात 2 या 3 जून को पड़ता है. यह मेला मां रेणुका देवी के नाम पर होता है.अब इस मेले का महत्व घटता जा रहा है क्योंकि लोग विशेष रुचि नहीं ले रहे हैं. लेकिन नानई गांव के लोगों को यह मेला मनाना जरूरी है. यदि नहीं मनाते हैं तो देवी प्रकोप हो जाता है. फसलें नष्ट हो जाती हैं, सूखा, भूखमरी जैसी समस्याएं आती हैं, इसलिए मौण मेले को जीवित रखना जरूरी है.रेणुका देवी का मंदिर नानई गांव में स्थित है जिसकी बड़ी मान्यता है. यह मेला कई सौ वर्षों से मनाया जाता है. कहते हैं कि पुराने लोगों ने इस मेले को बारिश के मेले के नाम से मनाया था. उस समय पर जेठ यानी जून-जुलाई के महीनों में...