
कंधे पर यात्रियों का सामान, जेब में ₹35… हरकी दून की पगडंडी से ‘हिमालयन हाइकर्स’ तक भगत सिंह रावत का सफर
15–16 साल की उम्र में पोर्टर बने, NIM से सीखा पर्वतारोहण; फिर ठाना- पहाड़ का युवा सिर्फ बोझ नहीं ढोएगा, गाइड और पर्यटन उद्यमी भी बनेगानीरज उत्तराखंडी | उत्तरकाशीहरकी दून की दुर्गम पगडंडियां... कंधे पर यात्रियों का भारी सामान और दिनभर की कठिन चढ़ाई। उम्र महज 15–16 साल। दिनभर की मेहनत के बाद हाथ में आए ₹35। उत्तरकाशी जिले के संकरी गांव के भगत सिंह रावत को आज भी अपनी पहली मजदूरी याद है। तब शायद उन्होंने भी नहीं सोचा होगा कि यही ₹35 उनके जीवन की उस लंबी यात्रा की शुरुआत बनेंगे, जो एक दिन उन्हें पर्यटन के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाने तक ले जाएगी।
एक किशोर पोर्टर के रूप में शुरू हुआ उनका सफर पर्वतारोहण के प्रशिक्षण से गुजरते हुए उद्यमिता तक पहुंचा और आगे चलकर इसी अनुभव और सोच ने ‘हिमालयन हाइकर्स’ की नींव रखने की प्रेरणा दी।
भगत सिंह रावत की कहानी सिर्फ एक व्यक्ति के संघर्ष और सफल...
