Tag: राम नवमी

प्रभु अवतरेहु हरनि महि भारा

प्रभु अवतरेहु हरनि महि भारा

लोक पर्व-त्योहार
राम नवमी पर विशेष प्रो. गिरीश्वर मिश्र  हर संस्कृति अपनी जीवन-यात्रा के पाथेय के रूप में कोई न कोई छवि आधार रूप में गढ़ती है। यह छवि एक ऐसा चेतन आईना बन जाती है जिससे आदमी अपने को पहचानता है और उसी से उसे जो होना चाहता है या हो सकता है उसकी आहट भी मिलती है। इस अर्थ में अतीत, वर्तमान और भविष्य तीनों ही इस अकेली छवि में संपुंजित हो कर आकार पाते हैं। ऐसे ही एक अप्रतिम चरितनायक के रूप में श्रीराम युगों-युगों से भारतीय जनों के मन मस्तिष्क में बैठे हुए हैं। भारतीय मन पर उनका गहरा रंग कुछ ऐसा चढ़ा है कि और सारे रंग फीके पड़ गए। भारतीय चित्त के नवनीत सदृश श्रीराम हज़ारों वर्षों से भारत और  भारतीयता के पर्याय बन चुके हैं। इसका ताज़ा उदाहरण अयोध्या है। यहाँ पर प्रभु के विग्रह को ले कर जन-जन में जो अभूतपूर्व उत्साह उमड़ रहा है वह निश्चय ही उनके प्रति लोक - प्रीति का अद्भुत प्रमाण है। वे ऐसे शिखर ...
सीय-राममय सब जग जानी

सीय-राममय सब जग जानी

लोक पर्व-त्योहार
राम नवमी पर विशेष प्रो. गिरीश्वर मिश्र  श्रीराम विष्णु के अवतार हैं. सृष्टि के कथानक में भगवान विष्णु के अवतार लेने के कारणों में भक्तों के मन में आए विकारों को दूर करना, लोक में भक्ति का संचार करना, जन – जन के कष्टों का निवारण और भक्तों के लिए भगवान की प्रीति पा सकने की इच्छा पूरा करना प्रमुख हैं. सांसारिक जीवन में मद, काम, क्रोध और मोह आदि से अनेक तरह के कष्ट होते हैं और उदात्त वृत्तियों के विकास में व्यवधान पड़ता है. रामचरितमानस में इन स्थितियों का वर्णन करते हुए गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं कि जब-जब धर्म का ह्रास होता है, नीच और अभिमानी राक्षस बढ़ जाते हैं और अन्याय करने लगते हैं पृथ्वी और वहाँ के निवासी कष्ट पाते हैं तब-तब कृपानिधान प्रभु भाँति-भाँति के दिव्य शरीर धारण कर सज्जनों की पीड़ा हरते हैं. एक भक्त के रूप में तुलसीदास जी का विश्वास है कि सारा जगत राममय है और उनके मन में बसा ...
ऐश्वर्य और सहज आत्मीयता की अभिव्यक्ति श्रीराम

ऐश्वर्य और सहज आत्मीयता की अभिव्यक्ति श्रीराम

साहित्‍य-संस्कृति
राम नवमी पर विशेष प्रो. गिरीश्वर मिश्र  सनातनी यानी सतत वर्त्तमान की अखंड अनुभूति के लिए तत्पर मानस वाला भारतवर्ष का समाज देश-काल में स्थापित और सद्यः अनुभव में ग्राह्य सगुण प्रत्यक्ष को परोक्ष वाले व्यापक और सर्व-समावेशी आध्यात्म से जुड़ने का माध्यम because बनाता है. वैदिक चिंतन से ही व्यक्त और अव्यक्त के बीच का रिश्ता स्वीकार किया गया है और देवता और मनुष्य परस्पर भावित करते हुए श्रेय अर्थात कल्याण की प्राप्ति करते हैं (परस्परं भावयन्त: श्रेय: परमवाप्स्यथ - गीता). इस तरह यहाँ का आम आदमी लोक और लोकोत्तर (भौतिक और पारलौकिक) दोनों को निकट देख पाता है और उनके बीच की आवाजाही उसे अतार्किक नहीं लगती. सृष्टि चक्र और जीवन में भी यह क्रम बना हुआ है यद्यपि सामान्यत: उधर हमारा ध्यान नहीं जाता. ज्योतिष उदाहरण के लिए सभी प्राणी अन्न से उत्पन्न और जीवित हैं, अन्न वर्षा से उत्पन्न होता है. वर्षा ...