‘पत्थरों का उपासक, प्रकृति का पुजारी’

‘पत्थरों का उपासक, प्रकृति का पुजारी’

डॉ. अरुण कुकसाल ‘सबकी अपनी जीवन कहानी होती है और सबका अपना संघर्ष होता है, सबके अपने सौभाग्य और सफलताएं होती हैं, तो अवरोध और असफलताएं भी. फिर भी हर जीवन अपने जमाने से प्रभावित होता है. अनेक जीवन अपने जमाने को जानने और बनाने में बीत जाते हैं और उनके जीवन को जमाना यों […]

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 आत्मकथा में बस ‘अ’ और ‘ह’ बाकी कथा

आत्मकथा में बस ‘अ’ और ‘ह’ बाकी कथा

कॉलम: किताबें कुछ कहती हैं… प्रकाश उप्रेती किसी को गिराया न ख़ुद को उछाला, कटा ज़िंदगी का सफर धीरे-धीरे. जहाँ आप पहुँचे छ्लांगे लगाकर, वहाँ मैं भी आया मगर धीरे-धीरे.. रामदरश मिश्र जी की इन पंक्तियों से विपरीत यह आत्मकथा है. स्वयं उनका जिक्र भी आत्मकथा में है. आत्मकथा ‘स्व’ से सामाजिक होनी की कथा […]

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