सौड़-सांकरी का देवगोत मेला: देव आस्था, मैती-धियाणी मिलन और लोक संस्कृति का भव्य संगम

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देव आस्था, रिश्तों की गरमाहट और लोक संस्कृति का संगम 

  • नीरज उत्तराखंडी

सौड़-सांकरी (मोरी),  उत्तरकाशी  

हिमालय की शांत वादियों में जब ढोल-दमाऊ की थाप गूंजती है और रणसिंघा की ध्वनि देवदार के जंगलों से टकराकर लौटती है, तब समझ लीजिए कि पहाड़ में कोई बड़ा लोक उत्सव आकार ले चुका है. सीमांत विकासखंड मोरी के सौड़-सांकरी गांव में आयोजित देवगोत मेला और मैती-धियाणी मिलन कार्यक्रम ने इस बार भी आस्था, परंपरा और भावनाओं को एक सूत्र में पिरो दिया.

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सभी फोटो : चैन सिंह रावत

लोक देवता सोमेश्वर महादेव के सानिध्य में सजे इस मेले की शुरुआत विधि-विधानपूर्वक पूजा-अर्चना और देवडोली के स्वागत के साथ हुई. मंदिर परिसर में उमड़े श्रद्धालुओं की भीड़, जयकारों की अनुगूंज और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की मधुर थाप ने पूरे वातावरण को भक्तिमय बना दिया. श्रद्धालुओं ने भगवान सोमेश्वर महादेव के श्रीचरणों में नमन कर क्षेत्र की सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना की.

जब मायका पुकारता है: मैती-धियाणी मिलन

इस लोक उत्सव का सबसे भावुक और आत्मीय पक्ष रहा ‘मैती-धियाणी मिलन’. विवाह के बाद ससुराल गई बेटियों—धियाणियों—का मायके पक्ष द्वारा पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ स्वागत किया गया. जैसे ही बेटियां मायके की चौखट पर पहुंचीं, आंखों में खुशी के आंसू और चेहरे पर मुस्कान साथ-साथ दिखी.

लोकगीतों की मधुर स्वर-लहरियों के बीच सजी-धजी महिलाओं ने पारंपरिक नृत्य प्रस्तुत किए. गीतों में बचपन की यादें थीं, पहाड़ की पीड़ा थी और रिश्तों की मिठास भी. यह मिलन केवल एक सामाजिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि पहाड़ की उस संवेदनशील परंपरा का जीवंत उदाहरण है, जहां बेटी को कभी पराया नहीं माना जाता.

संस्कृति का उत्सव, पीढ़ियों का संवाद

देवगोत मेला केवल धार्मिक अनुष्ठान भर नहीं है. यह लोक संस्कृति की वह धरोहर है, जिसमें सामूहिक आस्था, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक संरक्षण का भाव समाहित है. ग्रामीणों ने पारंपरिक नृत्य-गान के माध्यम से अपनी सांस्कृतिक विरासत का प्रदर्शन किया.

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युवा पीढ़ी की सक्रिय भागीदारी ने यह संदेश दिया कि आधुनिकता के इस दौर में भी पहाड़ अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ है. मोबाइल और इंटरनेट के युग में भी लोक वाद्यों की थाप और पारंपरिक वेशभूषा का आकर्षण कम नहीं हुआ है.

समरसता और सामूहिकता का संदेश

कार्यक्रम के समापन अवसर पर श्रद्धालुओं ने लोक देवता से प्रार्थना की कि वे क्षेत्र पर अपनी कृपा बनाए रखें और जन-जन के जीवन में शांति और समृद्धि का संचार करें.

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स्थानीय पर्यटन व्यवसायी एवं लोक संस्कृति के संरक्षक चैन सिंह रावत ने बताया कि देवगोत मेले के सफल आयोजन से सौड़-सांकरी गांव में उत्सव जैसा माहौल बना रहा. उनके अनुसार, यह आयोजन केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक संरक्षण का प्रेरक उदाहरण भी है.

पहाड़ की आत्मा का उत्सव

देवगोत मेला यह साबित करता है कि लोक उत्सव केवल परंपरा निभाने की रस्म नहीं होते, बल्कि वे समाज की आत्मा को जीवित रखने का माध्यम हैं. सौड़-सांकरी की यह पावन धरती एक बार फिर इस बात की साक्षी बनी कि जब आस्था, संस्कृति और रिश्ते एक साथ जुड़ते हैं, तो पूरा पहाड़ उत्सव बन जाता है.

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