August 7, 2020
इतिहास उत्तराखंड

तिलाड़ी कांड: जब दहाड़ उठी रवाँई घाटी

उत्तराखंड का जलियावाला बाग तिलाड़ी कांड

  • सकलचन्द रावत

आज रवाँई जौनपुर की नई पीढ़ी के किशोर कल्पना ही नहीं कर सकते कि सन 1930 में रवाँई की तरुणाई को आजादी की राह पर चलने में कितनी बाधाओं का सामना करना पड़ा था। पौरुष का इतिहास खामोश था, वक्त की वाणी मूक थी, लेखक की कृतियां गुमशुम थी और बेड़ियों से जकड़ी हुई थी।

जंगलात अफसर ने अपनी रिवाल्वर से निहत्थे किसानों पर फायर किये जिससे अजितू तथा झून सिंह ग्राम नगांणगांव वाले सदा के लिये सो गये। कई लोग घायल हुये। साथ ही साथ मजिस्ट्रेट की जांघ पर भी गोली लगी। हत्यारा रतूड़ी भाग खड़ा हुआ। किसानों का दल घायलों सहित मजिस्ट्रेट को लेकर राजतर पहुंचे। गिरफ्तारी के लिये आई हुई पुलिस से जब हत्याकांड की बात सुनी तो भयभीत हो गये और जिन लोगों को गिरफ्तार कर लाये थे उन्हें छोड़ कर भाग गये।

सन 1930, 17-18 गते ज्येष्ठ। उस दिन दहाड़ उठा था रवाँई… घायल शेर की भांति, कु्रद्ध होकर। उसने आक्रमण किया था सामन्ती सत्ता के सुदृढ़ शासन तंत्र पर… आन के लिए अपने प्राणों पर खेल कर। हिल उठी थी तिलाड़ी की धरा, कांप उठा था रवाँई का वायुमण्डल। शासन लड़खड़या और शासक प्रतिहिंसा से वशीभूत होकर पागल हो गया। गोलियां चलीं, घर फूंके गये, खेत रौंदे गये, यहां तक कि बहु-बेटियों की इज्जत लूटने पर उतारू हो गये। असह्य अत्याचारों को देखकर रवाँई जौनपुरवासी क्षुब्ध हो गये। शासन ने क्रूर जल्लाद छोड़ दिये गये मनमानी करने के लिए, जुल्म और सितम ढ़ाने के लिए, मनमाना अत्याचार और रक्तपात करने के लिये। रवाँई की जनता ने अपनी मांगों को मनवाने के लिए समय-समय पर असहयोग आंदोलन किये। टिहरी के राजा ने रवाँई में हुकूमत करने का ठेका जो नंदगांव के बिष्ट लोगों को दे रखा था, इनके जुल्मों के खिलाफ राजा भवानीशाह के जमाने में गीठ और वजरी पट्टी के लोगों ने आंदोलन किया। उमड़ते हुए किसानों के रोष से भयभीत होकर जागीरदार भाग गया तथा बाद में क्षमा याचना कर जान बचाई। अन्याय संगत गतिविधियों के बहिष्कार के लिए लोग राज्य छोड़कर जौनसार भाबर चले जाते थे तथा तब तक वापस नहीं लौटते थे। जब तक उनकी मांगे मान नहीं ली जाती थी। इस प्रकार 1930 के जन आंदोलन के लिये रवाँई-जौनपुर के लोग पहले से ही शिक्षित एवं संगठित थे।

थोकदारों ने अधिकार पाने की इच्छा से जासूसी के रूप में इन बैठकों में भाग लिया और भेदिया बनकर राजा को गुप्त सूचनायें देते रहे। विद्रोह की भड़कती आग को देखकर समझौते के लिये राजा के पुराने वजीर हरिकृष्ण रतूड़ी रवाँई पहुंचे। बूढ़ा वजीर यह आश्वासन देकर कि मांगों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार होगा वापस चले गये।

टिहरी नरेश ने जंगलात की सुव्यवस्था के लिये पद्मदत्त रतूड़ी को विशेष वन प्रबंधन की शिक्षा के लिए फ्रांस भेजा था। रतूड़ी के राज्य में लौटने पर उन्होंने राजा को सलाह दी कि जंगलों की सीमाबंदी (मुनारबंदी) नये ढंग से की जाय। यह कार्य 1930 में रतूड़ी जी के देखरेख में आरम्भ हुआ तथा जंगलों में किसानों के प्रवेश पर कठोर प्रतिबंध की घोषणा की गई। रवांई के लोग अपनी मांग लेकर उठ गये और आग्रह करने लगे कि उन्हें मुनारबंदी के समय निम्न सहूलियतें प्रदान की जायें-

  • केशवानन्द का सर्वे कायम रहे।
  • काठ-कुराली खुली रहे।
  • रव्वाना (रियायती लकड़ी) लोगों को सुविधापूर्वक मिलता रहे।
  • पुछिकर (पशुओं पर कर) हटाया जाय।
  • छान-खरक खुली रहे।
  • पराल-खान खुली रहे।
  • मोर-थातर (भेड़ों के चरान-चुगान क्षेत्र) बन्द न हो।
  • गूजरों को जंगलों में आने से रोका जाय।
  • जंगल की उपज पर कर न लगाये जायें।
  • हल-नसेड़ा पर रोक न हो।
  • मुनारे खेतों के समीप न लगाये जायें।
  • चरान-चुगान के लिये जंगल खुले रहें।
  • घास, पति, लकड़ी व अन्य वन उपज ग्रामवासी अपनी सुविधा के अनुसार जंगलों से प्राप्त करें, इस पर रोक न हो।
  • नये कानून न बना कर भूतपूर्व कृतिशाह के कानून कायम रहें।

उक्त मांगों को लेकर जब लोग जंगलात के अधिकारी के पास गये तो उत्तर मिला- ‘तुम्हारी गाय-बछियों के लिये सरकार अपना बहुमूल्य जंगल नष्ट कर नुकसान बर्दाश्त नहीं कर सकती। यदि तुम इन्हें पालने में असमर्थ हो तो जाइये इन्हें ढंगार में गिरा दो या कसाइयों को बेच दो।’

इन कठोर शब्दों ने किसानों के दिलों पर घाव कर दिये। ठीक इन्हीं दिनों नरेन्द्र नगर में गोरे गवर्नर हेली के आने की खबर थी। सभी लोगों को उनके स्वागत करने का आदेश हुआ। रवाँई के लोग भी अपनी करुण कहानी लेकर नरेन्द्र नगर पहुंचे। हुकूमत के पुजारियों ने अपने मनोरंजन के लिये माघ की चीरने वाली सर्दी में इन भोले किसानों को नंगे होकर नाचने तथा तालाब में कूदने का आदेश दिया, यहीं से आत्मसम्मान की रक्षा के लिये राज्य के काले कारनामों से मोर्चा लेने के लिये आंदोलन की नींव पड़ी, उनके हृदय ने पुकारा-

‘अधीन होकर, बुरा है जीना। है मरना अच्छा स्वतंत्र होकर।।
सुधा को तजकर, जहर का प्याला। है पीना अच्छा स्वतंत्र होकर।।’

ऐसे दृढ़ संकल्प में रवाँई की अंतरआत्मा की आवाज की पुकार थी, परतंत्रता के जीवन की व्याकुलता थी, एक प्रकार भी घुटन से मुक्ति पाने की छटपटाहट थी। रवाँई और जौनपुर में किसानों का संगठन आरम्भ हुआ। सारे प्रान्त की एक पंचायत बनाई गई, जिसकी बैठकों के लिये चान्दा डोखरी, तिलाड़ी और थापला स्थान निश्चित किये गये। थोकदारों ने अधिकार पाने की इच्छा से जासूसी के रूप में इन बैठकों में भाग लिया और भेदिया बनकर राजा को गुप्त सूचनायें देते रहे। विद्रोह की भड़कती आग को देखकर समझौते के लिये राजा के पुराने वजीर हरिकृष्ण रतूड़ी रवाँई पहुंचे। बूढ़ा वजीर यह आश्वासन देकर कि मांगों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार होगा वापस चले गये। 20 मई 1930 को आंदोलन के प्रमुख नेता दयाराम, रूद्रसिंह, राम प्रसाद और जमन सिंह को स्थानीय मजिस्ट्रेट तथा जंगलात के अधिकारी पद्मदत्त रतूड़ी ने गिरफ्तार कर टिहरी को रवाना हुये। रास्ते में इन नेताओं को राज्य के अन्य कर्मचारियों के हवाले कर पुन: अन्य लोगों को हिरासत में लेने की नियत से लौट गये।

धरती पर पड़ी लाशों पर सोने के कुण्डल चमक रहे थे। सिपाही लूट पर उतारू हो गये, कान काट-काट कर कुण्डल लूटे गये। लाशों को बोरे में भरकर यमुना नदी में डूबो दिया गया। अगले दिन फौज को गांव-गांव जाकर बागियों को ढूंढ़ने को हुक्म हुआ। थोकदार रणजोर सिंह तथा लाखीराम जिसे कहते उसे गिरफ्तार कर लिया जाता। घर-घर में तलाशियां हुई जो मन में आया लूट-खसोट की गई। लूट का माल बांट कर बागियों को कैद कर फौज टिहरी को रवाना हुई। दीवान चक्रधर की इस विजय पर जागीरदारों और उनके रिश्तदारों ने विजयोत्सव मनाया।

अपने रणबांकुरों की गिरफ्तारी से आतुर किसानों का दल उनकी खोज में जा रहा था, कि डंडालगांव में यह दल जंगलात अफसर से जा भिड़ा। जंगलात अफसर ने अपनी रिवाल्वर से निहत्थे किसानों पर फायर किये जिससे अजितू तथा झून सिंह ग्राम नगांणगांव वाले सदा के लिये सो गये। कई लोग घायल हुये। साथ ही साथ मजिस्ट्रेट की जांघ पर भी गोली लगी। हत्यारा रतूड़ी भाग खड़ा हुआ। किसानों का दल घायलों सहित मजिस्ट्रेट को लेकर राजतर पहुंचे। गिरफ्तारी के लिये आई हुई पुलिस से जब हत्याकांड की बात सुनी तो भयभीत हो गये और जिन लोगों को गिरफ्तार कर लाये थे उन्हें छोड़ कर भाग गये। इस कांड से किसान नेताओं के दिल बेचैन हो उठे। उन्हें विश्वास हो गया कि राजा के यहां गोली, डण्डे और कैद के अतिरिक्त अब कुछ नहीं। पंचायत ने राज्य में तैनात कर्मचारियों को गिरफ्तार करने का निश्चय किया, लेकिन समाज द्रोही भेदियों ने राज खोल दिया, जिससे कर्मचारियों में भगदड़ मच गई और इस राजद्रोह की बढ़ा-चढ़ा कर दीवान चक्रधर को शिकायतें करने लगे। पद्मदत्त रतूड़ी जो भाग कर धनारी में ठाकुरों के यहां शरण लिये हुये था, दूसरे दिन टिहरी पहुंचा तथा चक्रधर से मिला। दीवान चक्रधर ने पद्मदत्त की सराहना की तथा रवाँई पर फौज सहित चढ़ाई करने का आदेश देकर उसका उत्साह बढ़ाया और कहा- ‘मैं तो चाहता हूं कि रवाँई में ऐसी प्रचण्ड क्रांति की ज्वाला सुलगे, जिससे हमारी फौज राज्य के इस ‘ढंढकी’ क्षेत्र को नष्ट कर सके।’  सामन्ती प्रशासन के इस दमन चक्र की भनक रवाँई-जौनपुर में पहुंची। वे मन ही मन सोचने लगे : -

‘विश्वास कांपता है रह-रह, चेतना न थिर रह पाती है।’ 
लपटों में सपनो को समेट, यह वायु उड़ाये जाती है। 
चीखूं ले किसका नाम। कहीं अपना तो कोई पास नहीं।
धरती यह नहीं आज अपनी, अपना लगता आकाश नहीं।।

17 गते ज्येष्ठ 1930 को धरासू के रास्ते फौज राजगढ़ी पहुंची। थोकदार रणजोर सिंह ने शराब के घड़ों से सेना का स्वागत किया। रात को नाच-गानों का कार्यक्रम चला तथा भेदियों की सलाह मशविरे से भोले-भाले किसानों को भूनने का चक्रव्यूह रचा गया। इधर किसान नेता वायसराय को राजा के जुल्मों को सुनाने के लिये शिमला रवाना हुये। पंचायत की एक आम सभा तिलाड़ी के मैदान में हो रही थी। लोगों को विश्वास था कि दीवान चक्रधर आकर स्थिति में आशाजनक सुधार करेगा। राजा-टिहरी नरेश विलायत में मौज उड़ा रहा था। दीवान जनता की किस्मत से विनोद करने आया था और उधर जिनकी हड्डियों के बल पर उनकी शान-शौकत कायम थी वे जिंदगी और मौत का खेल खेल रहे थे।

18 गते ज्येष्ठ को आन्दोलन के लोकप्रिय नेता सुरकसिंह नगांणगांव की अचानक मृत्यु हो गई। जब अर्थी यमुना की तरफ लाई जा रही थी तो उसी समय फौज ने तिलाड़ी के मैदान को तीन ओर से घेर लिया। नशे में धुत सिपाहियों को अर्थी पर आक्रमण करने का आदेश हुआ। लाश के टुकड़े-टुकड़े करने के लिये दीवान स्वयं आगे बढ़े। फौज के साथ रवाँई का आगमसिंह सिपाही आगे बढ़ा तथा तिलाड़ी में एकत्रित लोगों को चौकन्ना कर दिया। दीवान के इशारे की जरूरत थी कि दनादन गोलियों की बौछार होने लगी। जनता भुनने लगी। कुछ लोग लेट गये,  कुछ पेड़ों पर चढ़ गये। कई व्यक्ति यमुना नदी में कूद पड़े। कई घायल हुये तथा 17 वीर तिलाड़ी की मिट्टी में हमेशा के लिए सो गये। सुनाली में बैठे दो व्यक्तियों की जांघ को चीरते हुये गोली निकली, उसी समय दूसरी गोली से खूंटे पर बंधी गाय भी मौत के मुंह में आ गई। तिलाड़ी की माटी खून से लथपथ हो गई।

‘फिदा वतन पे जो हो, आदमी दिलेर है वह।
जो यह नहीं तो, फकत हड्डियों का ढेर है वह।।’ 

फौज नरसंहार करते हुये राजतर की ओर बढ़ रही थी। रास्ते में भागते हुये दो जवानों की दीवान ने स्वयं अपने हाथों से गोली मार कर घायल कर दिया। राजतर पहुंचने पर फौज की एक टुकड़ी लाशें गबन करने के लिये वापस लौटी। धरती पर पड़ी लाशों पर सोने के कुण्डल चमक रहे थे। सिपाही लूट पर उतारू हो गये, कान काट-काट कर कुण्डल लूटे गये। लाशों को बोरे में भरकर यमुना नदी में डूबो दिया गया। अगले दिन फौज को गांव-गांव जाकर बागियों को ढूंढ़ने को हुक्म हुआ। थोकदार रणजोर सिंह तथा लाखीराम जिसे कहते उसे गिरफ्तार कर लिया जाता। घर-घर में तलाशियां हुई जो मन में आया लूट-खसोट की गई। लूट का माल बांट कर बागियों को कैद कर फौज टिहरी को रवाना हुई। दीवान चक्रधर की इस विजय पर जागीरदारों और उनके रिश्तदारों ने विजयोत्सव मनाया। टिहरी में आकर निरपराध किसानों को जेल में ठूंस दिया गया। इस नरमेध की कहानी से राजा को अवगत कराया गया तथा इन हत्यारे कर्मचारियों को अलग करने, जंगलात के हक-हकूकों को पुन: पाने, जेल में गिरफ्तार किसानों की रिहाई, इस जुल्म से हुई जन-धन की क्षति, विधवा स्त्रियों का माकूल प्रबंध करने, पिता विहीन बच्चों की शिक्षा-दीक्षा की व्यवस्था करने की याचना की गई, लेकिन निहत्थे किसानों की इस करुण कहानी को कौन सुनता। राजा विलायत से आ पहुंचे और दीवान के कारनामे को सराहा।

गोस्वामी गणेशदत्त आदि को गौ हत्या की जांच के लिए भेजा गया। लेकिन सारे मामले पर लीपापोती करके दबा दिया गया। मुकदमा दायर करने के लिये चक्रधर ने अघोरनाथ मुखर्जी की शरण ली। प्रारम्भ में दण्ड संग्रह विधान की धारा 125, 400 और 412 के मातहत मुकदमे चले। अभियुक्तों को बाहर से वकील लाने की आज्ञा न मिली। उन्होंने स्वयं पैरवी की। मुकदमे साबित न हुये तथा जिरह के समय पद्मदत्त रतूड़ी मूर्छा खाकर गिर पड़ा। आठ महीने तक मुकदमा चला। जुलाई 1931 तक सभी अभियुक्तों को बीस वर्ष तक की सजायें सुनवाई गई। खुशी-खुशी से वे टिहरी जेल चले गये। हाथों पर चढ़ी हथकड़ियां तथा पैरों पर जकड़ी बेड़ियों के बावजूद भी वे विनोद के लिये गा उठे थे।

इंजन की शक्ति का बारीकी से हिसाब लगाया जा सकता है, परंतु मनुष्य के अंदर छिपे चरित्र की शक्ति को कौन नाप सकता है। तिलाड़ी के रण बांकुरों को विश्वास था कि इस आंदोलन की सुलगती हुई चिंगारी एक दिन अत्याचार और दमन के राज्य को धराशायी कर देगी। इन शहीदों की प्रेरणा से बालक सुमन ने सामंती शासन का दमन नीति को ठुकराया तथा हंसते-हंसते प्राणों की आहुति देकर शहीदों के स्वप्नों को साकार किया। हे वीर सैनिकों तथा शेर तिलंगों। जिस प्रकार प्राचीन इतिहास में यदुवंशी भीम तथा अर्जुन स्मरणीय है, फारस के इतिहास में रुस्तम साम तथा मुसलमान राजाओं में अमीर तैमूर तथा चंगेज खां नादिर शाह की सेनायें तथा भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में महात्मा गांधी का त्याग स्मरणीय है और आज लोगों को साहस व त्याग की प्ररेणा दे रहा है उसी प्रकार तुम्हारा यह बलिदान इतिहास में अमर रहेगा।सदियों से सामंती व्यवस्था से त्राण पाकर यहां का संताप बिजड़ीत अर्थ चेतन जन समुदाय स्वतंत्रता के स्वच्छंद वातावरण में अनुप्रमाणित होकर हर वर्ष 30 मई को शहीद दिवस के रूप में मनाता है, श्रद्धा से शहीदों का स्मरण कर प्रतिज्ञा को दोहराता है तथा अपने श्रद्धा समुन शहीदों को अर्पित करता है।

 

मृत्यु सावित्री बने, यदि सत्यवान महान हो तुम। मृत्यु हो चेरी तुम्हारी, अगर भीष्म महान हो तुम।
मृत्यु हो संजीवनी, यदि सत्य पर बलिदान हो तुम। मृत्यु के न विधान हो तुम, मृत्यु के भगवान हो तुम।।  

(लेखक एडवोकेट एवं पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष उत्तरकाशी रहे हैं। पेश है उनका तिलाड़ी कांड पर विश्लेषणात्मक आलेख।)

साभार : रवांई कल आज और कल

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