January 19, 2021
उत्तराखंड

कुली-बेगार कुप्रथा: देश के स्वतन्त्रता आंदोलन का शताब्दी वर्ष है 2021 का उत्तरायणी मेला

  • डॉ. मोहन चंद तिवारी

इस साल कुमाऊं मंडल के बागेश्वर के शताब्दी वर्ष  का ऐतिहासिक उत्तरायणी मेला भी आखिर कोरोना की भेंट चढ़ गया. जिला प्रशासन की so ओर से मेले में धार्मिक अनुष्ठान के साथ केवल स्नान और जनेऊ संस्कार की अनुमति दी गई है और मेले की शोभा बढाने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों और व्यापारिक गतिविधियों पर रोक लगा दी गई है.

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14,जनवरी,1921 को बागेश्वर के उत्तरायणी मेले से ही उत्तराखंड के दोनों प्रान्तों कुमाऊं और गढ़वाल में कुली-बेगार कुप्रथा को समाप्त करने के लिए बद्रीदत्त पाण्डे और अनुसूया प्रसाद बहुगुणा के नेतृत्व में but अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जो जनआंदोलन चला,वह समूचे भारत में अपनी तरह का पहला और अभूतपूर्व राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन का शुभारंभ भी था.

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शायद बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि इस वर्ष 14 जनवरी, 2021 को बागेश्वर के उत्तरायणी मेले के दिन उत्तराखंड के स्वतंत्रता आंदोलन के भी because सौ वर्ष पूरे हो रहे है. 14,जनवरी,1921 को बागेश्वर के उत्तरायणी मेले से ही उत्तराखंड के दोनों प्रान्तों कुमाऊं और गढ़वाल में कुली-बेगार कुप्रथा को समाप्त करने के लिए बद्रीदत्त पाण्डे so और अनुसूया प्रसाद बहुगुणा के नेतृत्व में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जो जनआंदोलन चला,वह समूचे भारत में अपनी तरह का पहला और अभूतपूर्व राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन का शुभारंभ भी था.

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बागेश्वर का उत्तरायणी मेला because
प्राचीन काल से ही कुमाऊं के गरिमामय और गौरवपूर्ण इतिहास का साक्षी रहा है.आजादी के आंदोलन में कुली बेगार प्रथा को समाप्त करने के लिए वर्ष 1921 में हुए आंदोलन के साथ इस मेले का राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन की दृष्टि से भी विशेष महत्त्व है.

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उत्तराखंड ही नहीं बल्कि because
समूचे देश के लिए भी यह अभूतपूर्व ऐतिहासिक दिन था जब कुमाऊं और गढ़वाल की जनता ने भारी संख्या में संगठित हो कर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ कुली बेगार प्रथा के रजिस्टरों को सरयू नदी में बहा दिया और कभी भी कुली बेगार न करने का संकल्प भी लिया. निस्संदेह अंग्रेजों के विरुद्ध ऐसा निर्भीक साहस so और शौर्य समूचे देश में सबसे पहले उत्तराखंड की जनता ने दिखाया था.

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समूचे देश में अंग्रेजों की हुकूमत के विरुद्ध जो आजादी की लड़ाई का पहला बिगुल बजा, उसका निर्भीक नेतृत्व कुमाऊं और गढ़वाल के because स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा उत्तराखंड की वादियों में ही किया गया था. उत्तराखंड के इसी उत्तरायणी के जन आंदोलन से ही गांधी जी को ब्रिटिश हुकुमत के खिलाफ आजादी की लड़ाई के लिए सत्याग्रह की प्रेरणा मिली थी

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राष्ट्रीय धरातल because पर देखा जाए तो उत्तराखंड को यह श्रेय भी जाता है कि समूचे देश में अंग्रेजों की हुकूमत के विरुद्ध जो आजादी की लड़ाई का पहला बिगुल बजा, उसका निर्भीक नेतृत्व कुमाऊं और गढ़वाल के स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा उत्तराखंड की वादियों में ही किया गया था. उत्तराखंड के इसी उत्तरायणी के जन आंदोलन से ही गांधी जी को because ब्रिटिश हुकुमत के खिलाफ आजादी की लड़ाई के लिए सत्याग्रह की प्रेरणा मिली थी. उत्तराखंड के इतिहास की दृष्टि से भी सन् 2021के उत्तरायणी मेले का यह साल स्वतंत्रता आंदोलन का शताब्दी वर्ष होने के कारण विशेष महत्त्वपूर्ण है.

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किंतु विडम्बना यह है कि because न तो हमारे उत्तराखंड की राज्य सरकार और न केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम के इस उत्तरायणी मेले के शताब्दी वर्ष का कोई संज्ञान लिया और न ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी ने,जिसके नेतृत्व में  कुली बेगार प्रथा के विरुद्ध यह आंदोलन लड़ा गया था. एक इतिहासकार का कथन है कि यदि आपको अपनी आजादी because की रक्षा करनी है तो अपने स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास को सदा याद रखना चाहिए और उन स्वतंत्रता सेनानियों को सम्मानित भी करना चाहिए.हमारी उत्तराखंड की सांस्कृतिक संस्थाओं के लिए भी आज उत्तरायणी महज एक सांस्कृतिक पर्व के रूप में याद है,इसके शताब्दी वर्ष के राष्ट्रीय महत्त्व के प्रति वे उदासीन ही नज़र आते हैं.

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वस्तुतः प्राचीन काल से ही कुमाऊं क्षेत्र में मकर संक्रान्ति  पर सरयू नदी में स्नान दान की परंपरा रही है और इसी मौके पर बागेश्वर में बागनाथ because मन्दिर के प्रांगण में ‘उत्तरायणी’ का विशाल मेला भी लगता है. तीर्थयात्रियों के लिए कैलास मानसरोवर जाने का परंपरागत मार्ग ‘कुमाऊं’ स्थित इसी ‘बागेश्वर’ स्थान से हो कर जाता था. because यही कारण है कि ‘उत्तरायणी’ के अवसर पर बागेश्वर मेले का ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्त्व विशेष रूप से बढ गया. बागेश्वर सदियों से सामाजिक, धार्मिक,आर्थिक और राजनैतिक घटनाक्रमों का भी मुख्य केंद्र रहा है तथा उसके साथ स्वतंत्रता आंदोलन की भी कई ऐतिहासिक कड़ियां जुड़ी हुई हैं. because उनमें से एक महत्त्वपूर्ण घटना है उत्तराखण्ड में कुली बेगार कुप्रथा की समाप्ति. कुली-बेगार आन्दोलन 1921 में उत्तरायणी के अवसर पर उत्तराखंड के बागेश्वर नगर में आम जनता द्वारा आयोजित एक अहिंसक आन्दोलन था.इस आन्दोलन का मुख्य उद्देश्य कुली बेगार प्रथा बन्द कराने के लिये अंग्रेजी हुकुमत का मुखर होकर विरोध करना था.

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भारत के स्वतंत्रता आंदोलन because के इतिहास की दृष्टि से ‘उत्तरायणी’ के दिन ही बागेश्वर में सन 1921 में एक महत्वपूर्ण राजनैतिक घटना हुई थी जब कुमाऊं केसरी बद्रीदत पांडे के नेतृत्व में अंग्रेजी हुकूमत द्वारा पोषित कुली बेगार कुप्रथा के प्रतीक स्वरूप एक पोटली व रजिस्टर को सरयू और गोमती के पावन संगम में बहाकर विदेशी शासकों के प्रति because संघर्ष का बिगुल बजाया गया था. तभी से उत्तराखण्ड में राष्ट्रीय स्तर पर स्वतंत्रता संग्राम की भी शुरुआत हो गई थी.इस जन आंदोलन के परिप्रेक्ष्य में माना जा सकता है कि उत्तरायण मेला न सिर्फ सांस्कृतिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है,बल्कि देश की आजादी के स्वतंत्रता आंदोलन को भी प्रेरित करने वाला यह एक ऐतिहासिक मेला है. गांधी जी को यहीं से आजादी की लड़ाई के लिए सत्याग्रह की प्रेरणा मिली थी. आंदोलन से प्रभावित होकर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने इस अहिंसक आंदोलन को ‘रक्तहीन क्रांति’ का नाम दिया था.

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इस मेले की राजनैतिक because
पृष्ठभूमि का यदि आकलन किया जाए तो सन् 1920 में देश की आजादी के लिए संघर्षशील नेताओं के नेतृत्व में नागपुर में कांग्रेस का एक वार्षिक अधिवेशन हुआ था,जिसमें पं० गोविन्द बल्लभ पंत, बद्रीदत्त पाण्डे,हर गोबिन्द पन्त, विक्टर मोहन जोशी,श्याम लाल शाह आदि लोग सम्मिलित हुए थे और इसी अधिवेशन में बद्रीदत्त पाण्डे जी ने कुली बेगार आन्दोलन को जन-आंदोलन का स्वरूप देने के लिये महात्मा गांधी जी से आशीर्वाद मांगा. because गांधी जी से आशीर्वाद लेकर उत्तराखंड के इन सभी नेताओं ने कुमाऊं और गढ़वाल में कुली-बेगार प्रथा कुरीति के खिलाफ जन जागरण के कार्यक्रम चलाने शुरु कर दिए थे.

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कुली बेगार आन्दोलन 14 जनवरी,1921 में बागेश्वर स्थित उत्तरायणी के अवसर पर कुमाऊं केसरी बद्री दत्त पाण्डे की अगुवाई में ब्रिटिश हुकुमत के विरुद्ध हुआ था. क्योंकि इस मेले में कुमाऊं गढ़वाल, नेपाल आदि दूर दराज के इलाकों से भी लोग शरीक होने के लिए आते थे. इस वजह से इस कुली बेगार समाप्ति की मुहिम का प्रभाव सम्पूर्ण उत्तराखण्ड में ही नहीं बल्कि समूचे देश के स्वतंत्रता आंदोलन पर भी पड़ा.

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आजादी के लिए संघर्ष हेतु इसी राजनैतिक अभियान के तहत कुली बेगार आन्दोलन 14 जनवरी,1921 में बागेश्वर स्थित उत्तरायणी के अवसर पर कुमाऊं because केसरी बद्री दत्त पाण्डे की अगुवाई में ब्रिटिश हुकुमत के विरुद्ध हुआ था. क्योंकि इस मेले में कुमाऊं गढ़वाल, नेपाल आदि दूर दराज के इलाकों से भी लोग शरीक होने के लिए आते थे. because इस वजह से इस कुली बेगार समाप्ति की मुहिम का प्रभाव सम्पूर्ण उत्तराखण्ड में ही नहीं बल्कि समूचे देश के स्वतंत्रता आंदोलन पर भी पड़ा. देखते ही देखते इस आंदोलन ने जन आंदोलन का रूप धारण कर लिया.कुमाऊं मण्डल में इस कुप्रथा की कमान बद्रीदत्त पाण्डे जी के हाथ में थी तो वहीं गढ़वाल मण्डल में इसकी कमान अनुसूया प्रसाद बहुगुणा के हाथों में थी.

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इस आन्दोलन की सफलता के कारण अंग्रेज हुक्मरानों को कुली बेगार जैसे काले कानून को वापस लेना पड़ा.इस जन आंदोलन के सफल होने के बाद because बद्रीदत्त पाण्डे जी को ‘कुमाऊं केसरी’ और अनुसूया प्रसाद बहुगुणा जी को ‘गढ़ केसरी’ का खिताब जनता द्वारा दिया गया था. उत्तराखंड के जन आंदोलन का यह इतना सशक्त because आंदोलन था जिसकी परिणति बाद में सन 1942 में अगस्त की सल्ट क्रांति के रूप में हुई. स्वतंत्रता आंदोलन की शताब्दी वर्ष के अवसर पर मकर संक्रान्ति और ‘उत्तरायणी’ पर्व की सभी मित्रों को हार्दिक शुभकामनाएं.

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*सभी चित्र गूगल से साभार*

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज से एसोसिएट प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हैं. एवं विभिन्न पुरस्कार व सम्मानों से सम्मानित हैं. जिनमें 1994 में ‘संस्कृत शिक्षक पुरस्कार’, 1986 में ‘विद्या रत्न सम्मान’ और 1989 में उपराष्ट्रपति डा. शंकर दयाल शर्मा द्वारा ‘आचार्यरत्न देशभूषण सम्मान’ से अलंकृत. साथ ही विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े हुए हैं और देश के तमाम पत्रपत्रिकाओं में दर्जनों लेख प्रकाशित.)

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