• भुवन चंद्र पंत

जिन्दगी भले कितनी तंगहाली में गुजरे लेकिन फैशन को अपने अन्दाज में अपनाना हमारे शौक से ज्यादा मजबूरी बन जाती है. मजबूरी इसलिए कि यदि हम जमाने के अनुसार नहीं चलते तो गंवार व बुर्जुआ कहलायेंगें. बाजार भी इस नस को बखूबी जानता है और हरेक की सामर्थ्य के अनुकूल विकल्प तैयार कर लेता है. बात कर रहे हैं because पिछले 50-60 के बीच बदलते फैशन की, जिसके हम प्रत्यक्षदर्शी रहे. मुमकिन है कि आज की नई पीढ़ी को उस पर यकीन भी नहीं होगा कि कभी ऐसा भी वक्त रहा होगा, जब पैर का जूता भी आम इन्सान को नसीब नहीं था. आज तो पैदा हुए बच्चे को जूते पहना दिये जाते हैं, भले वो चलना न सीखा हो. एक दौर वो भी था, जब पांचवी दर्जे तक तो जूते पहनना अमीर शोहदों की चीज हुआ करती थी.

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दर्जा 6 में जाने के बाद लाल अथवा सफेद रंग के कपडे़ के जूते मिला करते, जिनके तलवे यदि घिस कर सीधे पैर जमीन को छुए, इससे फर्क नहीं पड़ता था, केवल पैर ऊपर से because ढका होना चाहिये. मुश्किल तब पैदा होती जब बारिश में चलना पड़े अथवा पैर का अंगूठा भी कपड़े को चीरकर  बाहर निकल आता. तब गांव के सामान्य परिवार के बच्चों के लिए जूतों के प्रति कितना अपनत्व था, इसकी बानगी में साठ के दशक की एक सच्ची घटना साझा करना चाहूंगा. हम प्राईमरी स्कूल में पढ़ा करते थे. पन्द्रह अगस्त के उत्सव की प्रतीक्षा हम महीनों से दिन गिन कर करने लगते.

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हालांकि विद्यालय में न तो कोई विशेष रंगारंग कार्यक्रम होते और न कोई विशेष उत्सव. हमारा आकर्षण होता- पन्द्रह अगस्त को  भारत माता की जय के नारों के साथ हाथ में तिरंगा लिये गांव में प्रभात फेरी लगाना. यह बात अलग थी कि विद्यालय लौटने पर हमें एक-एक लड्डू मिल जाया करता. हमारे साथ की एक लड़की जो कक्षा-4 की because छात्रा थी, उसके साथ उसके दो भाई भी पढ़ते थे. बहिन बड़ी होने के नाते अपने दोनों भाइयों की देखरेख का जिम्मा उसने स्वयं संभाला था. किस्मत से उसके एक भाई के लिए नये-नये जूते खरीदे गये थे, जिसे पहली बार पन्द्रह अगस्त की प्रभात फेरी में पहनाया गया था. यों भी हर एक बच्चा अपने नये-नये कपड़े पन्द्रह अगस्त को पहनने के लिए संभाल कर रखता.

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प्रभात फेरी ज्यों ही स्कूल से प्रारम्भ हुई तो बड़ी बहन ने अपने दोनों भाइयों को अपने साथ बुला लिया. वह बार-बार अपने भाई को हिदायत देती कि जूतों को हाथ में पकड़कर चले. बहिन के because बार-बार टोकने पर भाई जूते हाथ में थामे नंगे पैर प्रभात फेरी में चलने लगा. इसके पीछे चलने से जूते घिसने व खराब होने का भय भी था और जूते पहनने के आदी न होने से पैर से गिरकर जूता खोने का भी.  इसी से अन्दाजा लगाया जा सकता है कि तब जूते की भी कितनी अहमियत थी.

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गरीब तथा नेपाली मजदूर रबर के फीतों से बने सैण्डिल नुमा चप्पल पहना करते जिनके तले में टायर सूल होता, जो काफी टिकाऊ हुआ करते. चमड़े के जूते भी तीन श्रेणियों में हुआ करते. गरीब अथवा निम्न वर्ग के लोगों के जूते निम्न स्तर के चमड़े से बने होते, जिनका because सूल टायर का होता. ये टायर सूल के जूते कहलाते. मजबूती के लिहाज से ये काफी टिकाऊ होते, जिसका रबर सूल बहुत कम घिसता तथा जूते टिकाऊ होते. इससे ऊपर की श्रेणी में लैदर सूल के जूते होते, जिनका ऊपर का चमड़ा भी अपेक्षाकृत मुलायम व चमकदार तथा सूल मोटे लैदर का होता, जिससे चलने पर चर्र चर्र की आवाज हुआ करती. सैंनिकों के बूटों की तरह इससे चलने पर होने वाली कड़ाक कड़ाक की आवाज से एक गर्व की अनुभूति होती.

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सत्तर के दशक में एक दौर ऐसा भी आया, जब इन जूतों में कड़ाक कड़ाक की पगचाप की आवाज देने व लैदर सूल को जल्दी घिसने से बचाने के लिए ऐड़ी की तरफ घोड़े की जैसी नाल ठोकी जाती, आगे की ओर ठोकर पर नारंगी की फांक की आकृति का लोहे का टुकड़ा जड़ दिया जाता तथा बीच में मोटी कीलें  ठुकी रहती. because युवाओं में परस्पर स्पर्घा रहती कि किसके जूते में कितनी कीलें ठुकी हैं. इससे हालांकि फिसलने की गुजांइश कई गुना बढ़ जाती, लेकिन फैशन व घिसाई से बचाव के लिए इन सबसे समझौता कर लिया जाता. इनके आकार-प्रकार भी समय समय पर बदलते रहे. सत्तर के दशक के प्रारंभिक वर्षों तक नुकीली ठोकर वाले जूते उस समय के फैशन में थे जब कि बाद के वर्षों में बैल बॉटम पैन्ट के साथ एकदम चपटे मुंह वाले जूतों का युवावर्ग में चलन था.

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उच्च वर्ग में तब क्रेपसूल चलन में था, जिसका चमड़ा उम्दा किस्म का हुआ करता और शूल स्पंज युक्त क्रेप का होता. इसके पैताने में भी क्रेप की एक पतली तह बिछी होती. बूट because और गमबूट तो हमें संभवतः अंग्रेज सिखा गये. ये वह दौर था, जब कान बालों से ढके रहना युवावर्ग का शगल हुआ करता और कमीज के कॉलर काफी लम्बे व किनारे से नुकीले न होकर गोलाकार हुआ करते. कुमाउनी कवि शेर दा अनपढ़ की फैशन पर लिखी हास्य कविता ‘कॉलर जाणि बकराक कान’ में इसका चित्रण किया है. यानी कमीज के कॉलर बकरी के कान नुमा हुआ करते.

महिलाओं के आभूषणों के आकार व प्रकार भी भिन्न थे. गले में पहनने वाली हंसुली और हाथ की धागुली तो उस दौर में ग्रामीण क्षेत्रों तक ही सीमित रह चुकी थी. पैरों में झांवर का because चलन भी लगभग अन्तिम सांसे गिन रहा था लेकिन पैंरों में चेनपट्टी, बिछुवा, गलोबन्द, कर्णफूल, नथ, पौंजी, मंगलसूत्र आदि आज की तरह ही थे, लेकिन उनके आकार व प्रकार में निरन्तर परिर्वतन होते रहे.

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पिछली सदी के साठ के दशक में फुटवियर के नाम पर एक नई चीज चलन में आई और वो थी- हवाई चप्पल. अब इसका नाम हवाई चप्पल क्यों पड़ा? आम लोगों की तो because यही कारण ज्यादा उपयुक्त लगा कि वजन में हल्की होने के कारण इनका नाम हवाई चप्पल पड़ा, लेकिन ऐसा नहीं है. एक मत ये है कि अमेरिका के हवाई द्वीप में होने वाले टी नाम के पेड़ से रबरनुमा फैब्रिक का इस्तेमाल इस चप्पल को बनाने में किया गया इसलिए इसका नाम हवाई चप्पल पड़ा जब कि कुछ लोगों को ये भी मानना है कि ब्राजील की शू कम्पनी ’हवाइनाज’ ने सबसे पहले इस तरह की चप्पलों का उत्पादन शुरू किया, इस कारण इन्हें हवाई चप्पल कहा जाने लगा.

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नाम के पीछे कारण जो भी रहा हो साठ के दशक में सफेद चप्पलों पर नीले फीते से सजी ये हवाई चप्पलें आम लोगों की बजट के अनुकूल  हर वर्ग की पहली पसन्द बन गयी. because तब चप्पल के फीते टूट जाने पर फीते अलग से भी बिका करते थे. भले रंग, रूप व क्वालिटी में आज थोड़ा अन्तर जरूर आया है और ‘यूज एण्ड थ्रो’ की मानसिकता के चलते इसके फीते अलग से नहीं मिला करते, लेकिन लोकप्रियता आज भी बरकरार है. ये बात दीगर है जब पहाड़ की ग्रामीण महिलाओं ने इसका इस्तेमाल शुरू किया तो किसे दायें व किसे बायें पैर में पहनना है, अक्सर गजबजा जाती और टोकने के बाद ही उसे सही करती.

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तब आज की तरह बच्चों के लिए डाइपर का इस्तेमाल भी नहीं होता था, लेकिन इसका एक नायाब तरीका उस पीढ़ी के पास था, जिससे बच्चे अपने पहने कपड़ों को गन्दगी से बचा सकें because और वो नायाब वस्त्र था- सल्तराज. बच्चों की पेन्ट की जगह सल्तराज या सन्तरास हुआ करती जो आगे पीछे से पूरी खुली रहती. बच्चा टट्टी-पेशाब करे तो उससे कपड़े खराब नहीं होते. सारी गन्दगी कपड़ो को बचाते हुए बाहर निकल जाती. लड़कियों की अक्सर फ्राक ही हुआ करती , बेबीसूट तो बाद में चलन में आयी. फ्राक होने से उनके कपड़ों में भी गन्दगी करने की गुजांइश कम ही होती.

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छोटे बच्चों की टोपी अधिकांशतः कपड़े की होती, जिसमें आगे की ओर सिलाई से चुन्नट वाली कल्लीदार डिजाइनिंग होती. ऊन की टोपियों में भी इसी डिजाइन का ज्यादा चलन था. because लेकिन दो-तीन साल की उम्र तक हाथ व पैरों में चांदी के धागुले उनके हाथ-पैरों की शोभा बढ़ाते. आज के रेडीमेड विप की जगह गले में कपड़े का गोलाकार में सिला हुआ टुकड़ा बांधा जाता, जिसे रालगद्दी कहा जाता. बच्चे की राल के बार-बार उस पर टपकने के कारण उसे रालगद्दी नाम दिया गया था.

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10-12 साल तक के बच्चों को पेन्ट गालिस के साथ पहननी होती थी, जिसके फीते कन्धे में फंसे होते, जो पेन्ट को नीचे सरकने से रोकती. जाड़ों के मौसम के अतिरिक्त ज्यादा समय because छोटे बच्चों के लिए हाफपैन्ट यानि जांघिया का ज्यादा प्रयोग होता. जांधिया में भी गालिस लगी होती थी. दर्जा 7-8 में पढ़ने तक हमने गालिस वाली पैंट ही पहनी थी. तब के बच्चों को पैन्ट में बेल्ट पहनने का शऊर नहीं था ऐसा नहीं है, दरअसल बच्चे वही पहनते जो मां-बाप उन्हें देते.

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पुरुषों में साफा (टांका) तब कुछ बिरले बड़े बुजुर्गों की पसन्द शेष रह गयी थी. हां, टोपी के प्रति कुछ लोगों में सम्मान बरकरार था. सभी कपड़े प्रायः सूती हुआ करते. पुरुषों में गाढ़ा, because मलेशिया के कुर्ते’ पायजामे तथा सम्पन्न घरों के लोग सरज का कोट व गवर्डीन की पेन्ट पहना करते. उस दौर में पुरुषों की खड़ी धारियों वाली पैजामा आम लोगों में प्रचलन में थी. कपड़े की क्वालिटी में भले अन्तर हो, लेकिन डिजाइन लगभग समान ही हुआ करते. महिलाओं में ज्यादातर सूती व लीनन की धोतियां ही प्रचलन में थी, साड़ियों में शॉटन व जार्जट की साड़िया चलन में थी.

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जाड़ों में जूट के कपड़े का भी काफी चलन था. विशेष मौकों पर महिलाऐं सनील के ब्लाउज व घाघरों को पहना करती. आंगड़ो का रिवाज सूदूर देहातों तक ही सीमित रह चुका था. स्त्रियों के आभूषणों में गले में पहना जाने वाला ‘सुत’ (चांदी का आभूषण) तथा झांवर because जैसे आभूषण उस समय की नयी पीढ़ी में अपना आकर्षण खो चुके थे. साठ के दशक में ही टैरालीन नामक फैब्रिक लोगों के बीच पहुंचा, जिसकी पहुंच भी सम्पन्न घरों तक ही थी, उसके बाद टैरिकॉट, टैरीवूल जैसे नये फैब्रिक की लोगों को च्वाइस को विस्तार देते गये. एक तरह से साठ का दशक पुराने व नये के बीच का एक संक्रमण काल रहा. यही वह दौर था, जब बॉलीवुड की नकल पर सीधे पल्ले की जगह उल्टे पल्ले की साड़ी का फैशन शुरू हुआ.

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इसी दौर में टिन के बक्शे की जगह चमड़े की अटैची भी सामान ले जाने की उपयोग में लाई जाने लगी. चमड़े की अटैची महंगी होने से उसी की हमशक्ल कार्डबोर्ड के बेस पर रैक्सीन because से मढ़ी अटैची कम आय वर्ग के लोगों ने अपनायी. प्लास्टिक के डोरों से बुनी हुई रंगबिरंगी कण्डियां उस समय बहू-बेटियों की मायके ससुराल जाने की ‘हैण्डबैग कम पर्स’ हुआ करती थी. उसके बाद बांस की चैकोर ताला लगाने वाली  रंगीन डिजाइनर कण्डिया भी महिलाओं के हाथों की शोभा बढ़ाती थी. इसके बाद का समय हैण्ड बैग व पर्स का रहा. जो आज भी बदस्तूर जारी है, ये बात दीगर है कि साल-दर साल उनके डिजाइन, आकार-प्रकार में परिवर्तन होते रहते हैं.

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शादी-बारात हो या मेहमानदारी अपना बिस्तर साथ लेकर जाना लोगों की आदम में शुमार था. बिस्तर को ले जाने के लिए ‘होल्ड ऑल’ हर घर की एक जरूरत हुआ करती because और बसों की छतें ‘होल्ड ऑल’ से पटी रहती. आज की तरह कन्धे पर लटकाने वाले बैग तब नहीं हुआ करते. गान्धी आश्रम के लम्बे बैग ही लोग उपयोग में लाते अथवा उसी डिजाइन का साधारण कपड़े का बैग सिलवाते. जिसके दोनों ओर पकड़ने के फीते होते , जिसे साइड में पकड़कर अथवा कन्धे के सहारे हाथ से पकड़कर पीछे को लटकाया जाता. कई लोग कन्धे पर लाठी अथवा छाता को आड़ी कर उसमें बैग लटकाकर चला करते. गरीब घरों के स्कूली बच्चों के पास भी ज्यादातर इसी तरह के बैग हुआ करते थे.

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’फास्ट फूड’ नाम की चीज कम से कम पहाड़ों में तो थी ही नहीं. पिज्जा, बर्गर, चाऊमिन और मैगी तथा कोल्ड ड्रिंक बाजार में नहीं आई थी. कोल्ड ड्रिंक के नाम पर सोडा वाटर बिका करता अथवा ताजे फलों को जूस अथवा लस्सी और शरबत ही हमारी प्यास बुझा देता. चॉकलेट का मतलब हलवाई की दुकानों में बनने वाली मिठाई हुआ करता जो अल्मोड़ा की मशहूर हुआ करती. घर में मेहमानों के आने पर गांवों में गट्टे व मिश्री अथवा चना-गुड़ बच्चों के लिए आया करता. अधिक से अधिक नारंगी की फांकों वाली विलायती मिठाई अथवा मॉर्टन टॉफी  कभी-कभार बच्चों को मिला करती.

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तब आज की तरह सौन्दर्य प्रसाधनों का भी नितान्त अभाव था. डिटर्जेंट पाउडर नहीं होता था, गांव-देहात में राख को उबालकर अथवा भीमल की राल से कपड़े धुलते तथा कुछ लोग मैलकट because साबुन का इस्तेमाल करते. साबुनों में मुख्यतः सनलाइट व लाइफबॉय साबुन हुआ करते. धीरे-धीरे लक्स, हमाम, रैक्सोना जैसे ब्राण्डों ने दखल दी.आज तो सैंकड़ों ब्राण्डों में महंगे से महंगे साबुन उपलब्ध हैं. धीरे धीरे  शैम्पू जैसी चीजें भी इसी दौर में प्रचलन में आयी. हेयर डाई जैसे उत्पादों का तो सवाल ही नहीं उठता.

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लोग बालों में शुद्ध सरसों का तेल चुपड़ते, जिससे बाल बुढ़ापे तक काले रहते. लम्बे बालों की शौकीन महिलाऐं सदैव ही रही हैं, तब बालों की लटी को लम्बा करने के लिए धमेला और फुन लोगों because की पसन्द ही नहीं थी बल्कि श्रृंगार का एक अभिन्न अंग था. शादी-ब्याह में भी वर पक्ष द्वारा अन्य श्रृंगार सामग्री के साथ धमेला सूची में अवश्य शामिल रहता. ये बात दीगर है कि शादी का धमेला लाल रंग का होता जब कि सामान्यतः धमेले बालों के रंग के अनुसार काले ही होते.

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मनोरंजन के साधनों में ग्रामोफोन जैसी ही चीजें थी, जो किसी सम्पन्न घराने की शादी ब्याहों में सुनने को मिलती. ग्रामोफोन भी आज की तरह के उन्नत किस्म के नहीं थे, बल्कि because उन्हें मैनुवल घुमाकर जब छोड़ा जाता तो स्प्रिंग जब तक अपनी जगह नहीं आ जाता, तब तक डिस्क घूमते हुए बजता रहता. बस यों समझ लीजिए आप एलार्म घड़ी की चांबी जितनी ज्यादा घुमायेंगे उतनी देर तक एलार्म बजेगा.  आम लोगों में रेडियो ने भी साठ के दशक के अन्तिम वर्षों में ही अपनी पहुंच बनायी.

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इस दौर में रेडियो सिलोन जो बाद में श्रीलंका ब्राडकासिटंग कारपोरेशन बना, उसमें प्रसारित होने वाली ‘बिनाका गीतमाला’ विविध भारती, बीबीसी लन्दन के समाचार तथा ऑल इण्डिया रेडियों की उर्दू सर्विस का फरमाईशी कार्यक्रम प्रमुख आकर्षण के कार्यक्रम हुआ करते. टेलीविजन तो 1982 के एशियाड खेलों के बाद ही because आम लोगों तक पहुंचा. वो भी ब्लैक एण्ड व्हाइट स्वरूप में. शटर वाले स्क्रीन को खोलने पर ऑन-आफॅ स्विच, कॉन्ट्रास्ट व वाल्यूम के अलावा 12 चैनल फिक्स करने का स्विच हुआ करता, जो केवल शो पीस था, वरना केवल दूरदर्शन के अलावा अन्य कोई चैनल नहीं आता था. जिसमें कुछ ही घण्टों के कार्यक्रम प्रसारित होते. तब टेलीविजन का मतलब ही दूरदर्शन हुआ करता. इसके लिए भी एन्टिना फिक्स करने के लिए हमने क्या-क्या जतन किये, ये भुक्तभोगी ही जान सकता है.

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कभी घर के छत की सबसे  ऊंची चोटी अथवा पास के लंबे पेड़ों का तक सहारा लिया. एक एन्टिना लगाने चढ़ता तो दूसरा टीवी खोलकर सिग्नल आने की जानकारी अगले को देता रहता. because इतवार की सायं टेलीविजन पर प्रसारित होने वाली फिल्म तथा चित्रहार कार्यक्रम का बेसब्री से इन्तजार रहता. केबिल टीवी नेटवर्क की शुरुआत तो नब्बे के दशक में वैश्वीकरण के बाद शुरू हुई. शुरुआती दौर में केबिल टीवी के उपभोक्ता बहुत सीमित हुआ करते. जिस घर के पास से केबिल गुजरता, उससे कनक्शन चोरी का लुत्फ लेने का लोभ संवरण कर पाना नामुमकिन था. इसके लिए भी तरह-तरह के जुगाड़ लोग निकाल लिया करते.

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वर्तमान में जिस डिजिटल व संचार क्रान्ति के दौर में  हम जी  रहे हैं, खुशनसीब हैं आप कि गुजरे जमाने की इन बातों को साझा करने वाली पीढ़ी अभी जिन्दा है, जिन्होंने वो समय भी जिया है. वरना हम फैशनपरस्ती की दौड़ में जिस रफ्तार से भागे हैं, यकीनन विश्वास नहीं किया जा सकता कि आज से 50-60 साल पहले ऐसा भी because दौर रहा. बेशक आज की युवा पीढ़ी को हम पर ईर्ष्या इस बात पर हो सकती है कि फटी जीन्स हमने भी खूब पहनी थी, लेकिन वह हमारा शौक नहीं मजबूरी थी. इस मजबूरी को छुपाने के लिए हिन्दुस्तानी खाकी जीन्स जो हमारी स्कूल ड्रेस हुआ करती थी, उस फटे हिस्से को ढकने के लिए भी जतन से पैबन्द लगाये जाते थे. लड़कियां तो दूर की बात लड़के भी फटे कपड़ो से अंग दिखने पर शर्म महसूस करते.

(लेखक भारतीय शहीद सैनिक विद्यालय नैनीताल से सेवानिवृत्त हैं तथा प्रेरणास्पद व्यक्तित्वोंलोकसंस्कृतिलोकपरम्परालोकभाषा
तथा अन्य सामयिक विषयों पर स्वतंत्र लेखन के अलावा कविता लेखन में भी रूचि. 
24 वर्ष की उम्र में 1978 से आकाशवाणी नजीबाबादलखनऊरामपुर तथा अल्मोड़ा केन्द्रों से वार्ताओं तथा कविताओं का प्रसारण.)

 

 

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