September 19, 2020
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ईजा को ‘पाख’ चाहिए ‘छत’ नहीं

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—39

  • प्रकाश उप्रेती

पहाड़ के घरों की संरचना में ‘पाख’ की बड़ी अहम भूमिका होती थी. “पाख” मतलब छत. इसकी पूरी संरचना में धूप, बरसात और एस्थेटिक का बड़ा ध्यान रखा जाता था. पाख सुंदर भी लगे और टिकाऊ भी हो इसके लिए रामनगर से स्पेशल पत्थर मँगा कर लगाए जाते थे. रामनगर से पत्थर मंगाना तब कोई छोटी बात नहीं होती थी. अगर गाँव भर में कोई मँगा ले तो कहते थे-“सेठ आदिम छु, पख़्म हैं रामनगर बे पथर ल्या रहो” (सेठ आदमी है, छत के लिए रामनगर से पत्थर लाया है).

पाख की संरचना में एक ‘धुरेणी’ (छत के बीचों- बीच बनी मेंड सी) दूसरी, “दन्यार” (छत के आगे के हिस्से में लगे पत्थर, जिनसे बारिश का पानी सीधे नीचे जाता था) और तीसरी चीज होती थी “धुँवार” (रोशन दान). इनसे ही पाख का एस्थेटिक बनता था.

पाख में जो “धुरेणी” होती थी वह सबसे महत्वपूर्ण थी. वही पाख की धुरी होती थी. पहाड़ के लगभग सभी घरों की छत में बनी “धुरेणी” में  एक ‘थान’ (मंदिर) भी बना होता था. हमारे पाख की “धुरेणी” में भी था. अक्सर घर की रखवाली के लिए वह बनाया जाता था. हमारे यहां पाख में “लखुड़िया” देवता का ‘थान’ बना था. इस कारण हम पाख में कभी चप्पल पहनकर नहीं जाते थे. हमारे लिए पाख सिर्फ छत नहीं थी.

रामनगर से जो पत्थर मंगाए जाते थे वह कोई आम पत्थर नहीं होते थे. एक विशिष्ट भावबोध वाले पत्थर थे जो हमारे घर के पत्थरों के सामने ऐंठे से रहते थे. घर के पत्थर जहाँ-तहाँ ऐसे ही पड़े रहते थे तो वहीं रामनगर वाले पत्थरों को बड़ी सावधानी और इज़्ज़त के साथ गोठ में रखा जाता था. बच्चों को उस गोठ में जाने की सख़्त मनाही होती थी.

जब भी रामनगर से इन्हें मंगाया जाता तो सारे गाँव वाले मिलकर लेने जाते थे. हम बच्चे एक-एक तोप उठाकर लाते थे. ईजा बार-बार कहती थीं-“भलि लिबे जए, रामनगर बे आ रहिं” (अच्छे से ले जाना, रामनगर से आए हैं). हम अतिरिक्त सावधानी से ले जाते थे.

इन पत्थरों का बाकायदा नाम था. पाख के लिए दो आकार-प्रकार के पत्थर आते थे. उनमें से एक को “सूरेणक पाथर” और दूसरे को “तोप” कहा जाता था. ‘सूरेणक पाथर’ की लंबाई और चौड़ाई बराबर होती थी वहीं ‘तोप’ लम्बा और एक ‘बिलान्त’ भर चौड़ा होता था.

जब भी रामनगर से इन्हें मंगाया जाता तो सारे गाँव वाले मिलकर लेने जाते थे. हम बच्चे एक-एक तोप उठाकर लाते थे. ईजा बार-बार कहती थीं-“भलि लिबे जए, रामनगर बे आ रहिं” (अच्छे से ले जाना, रामनगर से आए हैं). हम अतिरिक्त सावधानी से ले जाते थे. रामनगर वाले सारे पत्थर घर पहुंच जाने के बाद गिने जाते थे. दीवार के सहारे उनको खड़ा करके आगे मोटी लकड़ी लगा दी जाती थी. ताकि गिरे न और हम भी वहाँ खेलने न जाएं.

यह बात तब की है जब हमारा दूसरा घर बन रहा था. बुबू ने गध्येरे में पत्थर फोड़ने वाले लगाए हुए थे. घर पर एक मिस्त्री और बुबू खुद लगे हुए थे. अम्मा ने चूल्हा संभाला हुआ था. ईजा और हम गध्येरे से पत्थर ‘सार’ रहे थे. नीचे का हिस्सा बन चुका था. ऊपर की दीवारें खड़ी हो गई थीं और सब गांवों वालों ने मिलकर “दादर” (लकड़ियां) भी बिछा दिया था. अब सिर्फ रामनगर वाले “सूरेणक पाथर और तोप” लगाने का काम बचा हुए था.

पाख में “सूरेणक पाथर और तोप” लगाते-लगाते सुबह से शाम हो गई थी. मिस्त्री घर जाने की फ़िराक में था लेकिन बुबू के डर के मारे जा नहीं पा रहा था क्योंकि सुबह ही बुबू ने बोल दिया था कि “मुशिया आज इकें पूर के दे, भो बे मैंकें जागेरी लगे हैं जाणु” . मिस्त्री ने कहा- “पण्डित ज्यूँ हे जाल”.

घर बनाने से पहले ही बुबू तय कर चुके थे कि इसमें “सूरेणक पाथर और तोप” लगाने हैं. उन्होंने अपनी जमा-पूँजी लगाते हुए रामनगर से पत्थर भी मँगा लिए और अब उन्हें लगाने की बारी थी. गोठ से ईजा ने एक-एक कर पत्थर पाख में एक तरफ को रख दिए. बुबू मिस्त्री को अपने हाथों से एक-एक “सूरेणक पाथर और तोप” पकड़ाते जाते और मिस्त्री उन्हें सेट करता जा रहा था. वह पहले नीचे-नीचे “सूरेणक पाथर और दो के बीच में एक “तोप” लगाता था. बीच-बीच में हम चाय-पानी लेकर जाते तो बुबू कहते- “ईथां झन अये सूरेणक पाथर छैं टूट जिल” (इधर मत आना सूरेणक पत्थर हैं, टूट जाएँगे). हम फिर नीचे से ही चाय पकड़ा देते थे.

पाख में “सूरेणक पाथर और तोप” लगाते-लगाते सुबह से शाम हो गई थी. मिस्त्री घर जाने की फ़िराक में था लेकिन बुबू के डर के मारे जा नहीं पा रहा था क्योंकि सुबह ही बुबू ने बोल दिया था कि “मुशिया आज इकें पूर के दे, भो बे मैंकें जागेरी लगे हैं जाणु” (मिस्त्री का नाम लेकर, आज इसे पूरा कर देना, कल से मुझे जागरी लगाने जाना है). मिस्त्री ने कहा- “पण्डित ज्यूँ हे जाल” (पंडित जी हो जाएगा). अब दिन छिप चुका था लेकिन फिर भी थोड़ा काम बचा हुआ था. मिस्त्री जल्दी-जल्दी काम करने पर लगा हुआ था और बुबू वहीं खड़े उसे पत्थर पकड़ा रहे थे. तभी सेट करते हुए एक जोर का हथौड़ा तोप में लग गया और तोप बीच से टूट गई. इधर तोप टूटी उधर बुबू का पारा चढ़ा. मिस्त्री सफाई में कुछ कहता उससे पहले बुबू- “त्योर मरोल होई त्योर मुशिया, तूल यो तोप तोडि हे” (तेरा मरेगा तेरे मुशिया तूने ये तोप तोड़ दी है). यह गाली तो नहीं थी लेकिन बुबू का गुस्सा प्रकट करने का यही भाव होता था. खैर, तोप टूटने का गुस्सा हम सब पर भी निकला और मिस्त्री ने अंततः रात के 8 बजे तक काम पूरा कर दिया.

अब पाख नहीं छत बनती है उसमें रामनगर वाले पत्थर नहीं बल्कि TMT सरिया और बांगड सीमेंट लगता है. पाख में कभी चप्पल पहनकर नहीं जाते थे और छत में बिना चप्पल के नहीं जाते हैं. ईजा आज भी पाख की ‘धुरेणी’ (छत के बीचों-बीच बनी मेड) में “जुम्ही” (कद्दू) सुखाती हैं और “सूरेणक पाथर” वाले पाख में लाल मिर्च और उड़द की बड़ियाँ. ईजा को पाख चाहिए छत नहीं.

बुबू ने पाख को बड़ी देर तक निहारा, हम भी देखने गए . तब “सूरेणक पाथर और तोप” क्या चमक रहे थे. जितनी चमक उनमें थी उससे कहीं ज्यादा चमक बुबू की आँखों में थी. ‘फूल फटांग जून’ (पूरी चांदनी वाली रात) में हम बुबू और पाख दोनों की चमक को देख पा रहे थे. वह क्या अद्भुत दृश्य था.

अब पाख नहीं छत बनती है उसमें रामनगर वाले पत्थर नहीं बल्कि TMT सरिया और बांगड सीमेंट लगता है. पाख में कभी चप्पल पहनकर नहीं जाते थे और छत में बिना चप्पल के नहीं जाते हैं. ईजा आज भी पाख की ‘धुरेणी’ (छत के बीचों-बीच बनी मेड) में “जुम्ही” (कद्दू) सुखाती हैं और “सूरेणक पाथर” वाले पाख में लाल मिर्च और उड़द की बड़ियाँ. ईजा को पाख चाहिए छत नहीं. हम अदत एक छत के लिए वो पाख छोड़ आए…

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। पहाड़ के सवालों को लेकर मुखर रहते हैं।)

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