

फकीरा सिंह चौहान स्नेही
वरिष्ठ कवि, गायक कलाकार तथा गीतकार
ग्राम गोरछा, जौनसार
जौनसारी विवाहित महिलाओं के सिर पर धारण किया जाने वाला ढांटु मात्र एक रंगीन कपड़े का टुकड़ा नहीं, बल्कि गौरव और गरिमा की पहचान है। जौनसार-बावर, रवांई-जौनपुर, बंगाण, बिनार तथा हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्रों में सिर पर ढांटु बांधना केवल एक परिधान या आवरण नहीं, बल्कि मान-सम्मान, स्वाभिमान, मर्यादा और जिम्मेदारी का सर्वोच्च प्रतीक माना जाता है।
ढांटु धारण करने की परंपरा विरासत, संस्कृति और नारीत्व की गरिमा को दर्शाती है। इसे नारी स्वाभिमान का मुकुट और सिर की शोभा माना जाता है। किसी के सामने सम्मानपूर्वक ढांटु उतारना विश्वास, जिम्मेदारी तथा क्षमा-याचना का अत्यंत महत्वपूर्ण संकेत माना जाता है।
जौनसार-बावर क्षेत्र में विवाहित महिलाओं के लिए ढांटु धारण करना सामाजिक प्रतिष्ठा, सम्मान और गौरव का प्रतीक है। इसी कारण इसे “सिर की आन-बान-शान” कहा जाता है। ससुराल और समाज में सिर को ढांटु से ढककर रखना महिला के सर्वोच्च सम्मान और मर्यादा का द्योतक माना जाता है।

ढांटु का पारंपरिक स्वरूप
प्राचीन समय में ढांटु लगभग एक गज के चतुर्भुजाकार सूती कपड़े से बनाया जाता था। इसके दो कोनों को मोड़कर त्रिभुजाकार रूप दिया जाता और महिलाएं इसे सिर पर धारण करती थीं। यह कपड़ा साधारण होता था, जिसमें हस्तनिर्मित धागों की हल्की रंगीन बुनाई होती थी।
समय के साथ लोग बाजार से पॉपलिन का काला कपड़ा खरीदकर ढांटु बनाने लगे। पॉपलिन कपड़ा टिकाऊ, मुलायम और आरामदायक माना जाता था। इसके महीन धागे कपड़े को चिकना और त्वचा के लिए अनुकूल बनाते थे, जिससे इसे लंबे समय तक पहनना सहज रहता था।
ढांटु के अग्रभाग पर सुनहरे फूलों की प्रिंट या बुटीक कढ़ाई की जाती थी तथा पीछे बंधने वाले तीनों कोनों पर लटकन लगाई जाती थी। सूती कपड़े से बने ढांटु मजबूती से बंधते थे और आसानी से खुलते नहीं थे। महिलाएं दिनभर खेत-खलिहानों और जंगलों में कठिन परिश्रम करती थीं, फिर भी ढांटु सिर से नहीं उतरता था।
स्वास्थ्य और उपयोगिता से जुड़ी परंपरा
ढांटु की एक विशेष उपयोगिता भी थी। यदि कोई महिला अस्वस्थ होती या सिरदर्द से पीड़ित होती, तो ढांटु की गांठ सिर के पीछे तथा दूसरा सिरा माथे के पास कसकर बांधा जाता था, जिससे सिरदर्द में राहत मिलती थी। ढांटु बांधने के तरीके से यह भी संकेत मिलता था कि महिला अस्वस्थ है या मासिक चक्र की अवस्था में है।
पुराने समय में महिलाएं बड़ी-बड़ी सोने की नथ (नथली) पहनती थीं। नथ का भार कम करने के लिए ढांटु का सहारा लिया जाता था। नथ की पिन ढांटु में फंसाई जाती थी, जिससे नाक पर दबाव कम पड़ता था और दर्द से राहत मिलती थी। बिना ढांटु के भारी नथ धारण करना कठिन माना जाता था।
विभिन्न क्षेत्रों में अलग पहचान
पहाड़ी क्षेत्रों में ढांटु अलग-अलग नामों से जाना जाता है—जौनसार में ढांटु, बावर क्षेत्र में टालकुड़ो, तथा कश्मीर में तरंगा। सामान्यतः इसे घाघरा-झगा और कुर्ती के साथ पहना जाता है, लेकिन जहां घाघरा प्रचलित नहीं है, वहां महिलाएं सलवार-कमीज के साथ भी ढांटु धारण करती हैं।
प्रत्येक क्षेत्र में ढांटु बांधने की शैली अलग होती थी। बावर, जौनसार और हिमाचल में इसके बांधने के तरीके भिन्न थे। पहले केवल ढांटु बांधने के अंदाज़ से ही महिला के क्षेत्रीय संबंध की पहचान हो जाती थी।

बदलते समय के साथ ढांटु
आज बदलते परिवेश के साथ ढांटु का स्वरूप भी आधुनिक हो गया है। बाजार में मिरर वर्क, बुटीक प्रिंट, कढ़ाई और विभिन्न डिज़ाइन वाले आकर्षक ढांटु उपलब्ध हैं। हालांकि ये देखने में सुंदर होते हैं, लेकिन अधिक समय तक पहनने पर भारी महसूस होते हैं। आधुनिक कपड़ों में फिसलन अधिक होने से इन्हें संभालना भी कठिन हो जाता है।
सोशल मीडिया के प्रभाव से ढांटु का प्रचार-प्रसार बढ़ा है और इसे पहनने की शैली भी लगभग समान होती जा रही है। आज यह केवल विवाहित महिलाओं तक सीमित नहीं रहा; अविवाहित युवतियां भी इसे फैशन और सांस्कृतिक पहचान के रूप में अपनाने लगी हैं। पर्यटक और मैदानी क्षेत्रों के लोग भी पहाड़ों में आकर पारंपरिक वेशभूषा के साथ ढांटु पहनकर फोटोशूट करवाते हैं।
सम्मान और सामाजिक मर्यादा का प्रतीक
ढांटु की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता उसका सम्मान और प्रतिष्ठा से जुड़ा होना है। जौनसार-बावर तथा महासूई क्षेत्र में, जहां महासू महाराज को आराध्य देव माना जाता है, वहां एक अनूठी परंपरा रही है—यदि किसी विवाद या झगड़े को सुलझाने के लिए कोई महिला अपना ढांटु उतारकर सामने खड़ी हो जाए, तो दोनों पक्ष उसके सम्मान में झुककर विवाद समाप्त कर देते हैं।
जौनसार-बावर की पहली फिल्म “मैरे गाँव की बाट” में भी ढांटु के सम्मान का प्रभावशाली चित्रण किया गया है। यह परंपरा नारी सम्मान की ऐसी मिसाल है, जो विश्व की संस्कृतियों में अपनी विशिष्ट और मर्यादित पहचान रखती है।
ढांटु केवल एक परिधान नहीं, बल्कि नारी सम्मान, सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक मर्यादा का जीवंत प्रतीक है—जो आज भी जौनसार-बावर की पहचान बनकर जीवित है।
