
सांस्कृतिक धरोहर और वीरता की मिसालें
- नीरज उत्तराखंडी, पुरोला-उत्तरकाशी
रवांई घाटी-अपनी अनूठी लोक परंपराओं, अद्भुत सांस्कृतिक जीवट और देव-अनुष्ठानों के लिए देशभर में विशिष्ट पहचान रखने वाला यह पर्वतीय क्षेत्र-आज एक बार फिर देवत्व और लोकश्रद्धा के महासंगम का साक्षी बनेगा. गैर बनाल स्थित प्राचीन रघुनाथ देवता मंदिर परिसर में आज से प्रसिद्ध देवलांग महापर्व का भव्य आयोजन आरंभ हो रहा है, जिसे उत्तराखंड सरकार राजकीय मेला घोषित कर चुकी है. तैयारियाँ चरम पर हैं और श्रद्धालुओं में उत्साह का आलम देखते ही बनता है. मेला समिति की ओर से विशाल भंडारे की भी विशेष व्यवस्था की गई है.
मंगसीर की दीपावली: विरासत की अनोखी रोशनी
जहाँ देशभर में दीपावली कार्तिक मास में मनाई जाती है, वहीं यहाँ की परंपरा में दीपपर्व एक माह बाद मंगसीर की बग्वाल के रूप में हर्षोल्लास से मनाया जाता है. मान्यता है कि भगवान राम के अयोध्या आगमन की खबर पर्वतीय इलाकों तक देर से पहुँची थी, जिसके कारण पर्व यहाँ एक महीने बाद प्रज्ज्वलित होता है. जौनसार-बावर, रवांई, जौनपुर और धनारी क्षेत्र यह परंपरा आज भी उसी पवित्रता और उल्लास से निभाते हैं.
1627–28: वीरता की अमर स्मृति
लोक मान्यताओं के समानांतर इतिहास भी इस पर्व को अत्यंत गौरवशाली संदर्भ प्रदान करता है. सन 1627–28 में गढ़वाल के राजा महिपत शाह के समय सीमाओं पर तिब्बती आक्रमण बढ़ गए थे. इस संकट के समय गढ़वाली सेना के अदम्य शौर्य और वीर सेनापति माधो सिंह भण्डारी के नेतृत्व ने इतिहास रच दिया. सेना ने तिब्बत क्षेत्रों तक विजय पताका फहराकर भारतीय ध्वज गाड़ दिया था. इसी अविस्मरणीय विजय के स्मरण में सदियों से मंगसीर की बग्वाल मनाई जाती है.
देवलांग: दुनिया की सबसे लंबी मशाल
देवलांग महापर्व का केंद्रबिंदु वह परंपरा है, जो इसे वैश्विक विशिष्टता प्रदान करती है देवलांग, दुनिया की सबसे लंबी मशाल.
ग्राम गौल के लोग उपवास रखकर बियांली बीट के जंगलों से देवदार का लंबा, हरा और अखंड वृक्ष चुनकर लाते हैं. ढोल-दमाऊं और औजस्वी रणसिंघे की ध्वनि के साथ वृक्ष को मंदिर परिसर तक लाया जाता है. इसके बाद रावत थोक उपवास रखकर विशेष घास सिल्सी से पूरे वृक्ष को बड़ी सावधानी और पवित्रता से लपेटते हैं.
मध्यरात्रि के बाद बनाल पट्टी के लोग जलती मशालों, ढोल-दमाऊं की थाप, दमदार रणसिंघे की गूँज के साथ मंदिर परिसर में एकत्र होते हैं. गैर के नटाण बंधु और बियाली के खबरेटी इस परंपरा के अभिन्न संरक्षक हैं, जो अपने विशिष्ट दायित्व को शुचिता के साथ निभाते हैं.
देवलांग केवल एक विशाल मशाल नहीं, बल्कि एकता, पवित्रता, साहस, सामुदायिक सहभागिता और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का उजाला है, जिसे रवांई घाटी पीढ़ियों से अक्षुण्ण रखे हुए है.
