लोक पर्व-त्योहार

जब खेतों से लौटती है गौरा : सातूं-आठूं में अन्न, बेटी और पहाड़ की स्मृति

जब खेतों से लौटती है गौरा : सातूं-आठूं में अन्न, बेटी और पहाड़ की स्मृति

पिथौरागढ़, लोक पर्व-त्योहार
 प्रकाश चन्द्र पुनेठा सिलपाटा, पिथौरागढ़ भादो की पंचमी से अष्टमी तक चलने वाला कुमाऊं का यह लोकपर्व केवल गौरा-महेश्वर की आराधना नहीं, बल्कि अन्न, कृषि-चक्र, स्त्री-स्मृति और सामुदायिक जीवन का उत्सव भी है। पहाड़ में त्योहार केवल कैलेंडर की तारीखें नहीं होते। वे मौसम के साथ आते हैं, खेतों के साथ बदलते हैं और घर-परिवार के रिश्तों में अपना अर्थ खोजते हैं। कुछ पर्व ऐसे भी हैं, जिनमें देवता और मनुष्य के बीच की दूरी बहुत कम रह जाती है। गौरा-महेश्वर का सातूं-आठूं ऐसा ही एक लोकपर्व है। कुमाऊं के सीमांत अंचल, विशेषकर पिथौरागढ़ में भाद्रपद शुक्ल पक्ष की पंचमी से शुरू होकर सप्तमी और अष्टमी तक चलने वाला यह पर्व अपने भीतर पहाड़ के जीवन की कई परतें समेटे हुए है। इसे शिव-पार्वती अर्थात गौरा-महेश्वर से जोड़ा जाता है, लेकिन इसके अनुष्ठानों में जितनी जगह देवताओं की है, उतनी ही खेत की मिट्टी, अन...
हिलजात्रा: मुखौटों में जीवित सोर घाटी की 500 साल पुरानी लोक-स्मृति

हिलजात्रा: मुखौटों में जीवित सोर घाटी की 500 साल पुरानी लोक-स्मृति

पिथौरागढ़, लोक पर्व-त्योहार
 प्रकाश चन्द्र पुनेठा सिलपाटा, पिथौरागढ़ पिथौरागढ़ की सोर घाटी में हिलजात्रा केवल एक लोकपर्व नहीं, बल्कि पहाड़ के उस सामूहिक जीवन की स्मृति है, जिसमें खेती, पशु, जंगल, देवता और मनुष्य एक-दूसरे से अलग नहीं थे। कुमौड़ में मनाया जाने वाला यह पर्व लगभग पाँच सौ वर्षों की परंपरा को अपने भीतर समेटे हुए है। समय बदला, खेतों की मेड़ें सूनी होने लगीं, गांवों से पलायन बढ़ा और खेती का स्वरूप भी बदलता गया, लेकिन हिलजात्रा आज भी उस लोक-संसार की बची हुई आवाज की तरह हमारे सामने आती है। हिलजात्रा के केंद्र में उसके मुखौटे और पात्र हैं—लखिया भूत, वीरभद्र तथा खेती-किसानी और ग्रामीण जीवन से जुड़े अनेक रूप। ये मुखौटे केवल मनोरंजन के लिए नहीं हैं। इनके पीछे पहाड़ के लोकजीवन की गहरी स्मृतियां छिपी हैं। जब कलाकार इन्हें धारण करते हैं, तो उनके चेहरे भले ही ओझल हो जाते हैं, लेकिन उन्हीं मुखौटों के भीतर...
आजादी के 80 वर्ष: भारत की स्वतंत्रता, स्वराज और औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति की चुनौती

आजादी के 80 वर्ष: भारत की स्वतंत्रता, स्वराज और औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति की चुनौती

लोक पर्व-त्योहार
स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त, 2026)  पर विशेषप्रो. गिरीश्वर मिश्र शिक्षाविद् एवं पूर्व कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा     स्वतंत्रता निश्चय ही सभ्य मानव समाज का सर्वोत्तम आविष्कार है जो मनुष्य को अपने चुने हुए लक्ष्यों को पाने के लिए सामर्थ्यसंपन्न बनाती है। आज विकास, प्रगति और उन्नति के मार्ग पर चलने के लिए स्वतंत्रता को सबसे ताकतवर हथियार माना जाता है। स्वतंत्रता समर्थ बनाती है यही सोच कर पराधीनताओं की बेड़ियों को तोड़ने के लिए विश्व में अनेक संग्राम होते आ रहे हैं। अभी भी म्यांमार जैसे कई देशों में तानाशाही के ख़िलाफ़ बेचैनी है और उसके आतंक का प्रतिरोध जारी है। वस्तुतः प्राणिमात्र उस नैसर्गिक परिस्थिति में ही जीना चाहता है जिसमें मुक्त हो कर अपनी शर्तों पर जिया जा सके। परतंत्र होने पर गोस्वामी तुलसीदास के शब्दों में सपने भी सुख नसीब नहीं होता: पराधीन सप...
चांदणी धार पूजन : जहां पक्षियों से संवाद करती है आस्था

चांदणी धार पूजन : जहां पक्षियों से संवाद करती है आस्था

पर्यावरण, लोक पर्व-त्योहार
  तुंगनाथ घाटी : लोकज्ञान, पर्यावरण और विज्ञान का अद्भुत संगमआशिता डोभाल उत्तराखंड का पहाड़ केवल भौगोलिक संरचना भर नहीं है, बल्कि यह प्रकृति और मानव के सहअस्तित्व का जीवंत दर्शन है। यहां की जीवनशैली में जल, जंगल, जमीन, जानवर और जन—इन ‘5 ज’ का गहरा रिश्ता है। यही कारण है कि पर्वतीय समाज ने प्रकृति को संसाधन नहीं, बल्कि संबंध माना है। इस संबंध की एक अनूठी मिसाल रुद्रप्रयाग जिले की तुंगनाथ घाटी में आज भी जीवित है—चांदणी धार पूजन। विरासत में मिली पर्यावरण चेतना तुंगनाथ बाबा का शीतकालीन प्रवास स्थल मक्कूमठ केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि पर्यावरणीय चेतना के केंद्र के रूप में भी जाना जाता है। यह क्षेत्र वन आंदोलनों की भूमि रहा है। यहाँ की लोकमानस में गूंजने वाला नारा— “मौण द्यौला पर बौण ना” (गर्दन कटवा देंगे, पर जंगल नहीं कटने देंगे) यह सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति...
स्वावलंबी विकास की ओर- आत्मबोध से आत्मनिर्भरता तक

स्वावलंबी विकास की ओर- आत्मबोध से आत्मनिर्भरता तक

लोक पर्व-त्योहार
  दीपावली पर विशेषप्रो. गिरीश्वर मिश्र शिक्षाविद् एवं पूर्व कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा  इस साल दीपावली का पर्व देश के लिए इस अर्थ में विशेष है कि वह हमें स्वयं की पहचान के लिए आमंत्रित कर रहा है। इसका तकाजा है कि हम विभिन्न प्रकार के भ्रमों के आवरण से मुक्त हो कर प्रकाश का वरण करें। राह में आते तिमिर को दूर करने के लिए प्रकाश का यह पर्व हमें स्वयं को जगा कर ज्योति का वाहक बनने के लिए प्रेरित करता है। अपनी शक्ति को पहचानना ही वह आधार है जो आज की वैश्विक अस्थिरता और उथल-पुथल वाले अनिश्चय के वातावरण में हमें सहारा दे सकेगा। आज के जटिल होते परिवेश में इसे सुखद आश्चर्य ही कहेंगे कि तमाम विघ्न-बाधाओं को पार करते हुए भारत धन-धान्य की दृष्टि से अनेक देशों की तुलना में और स्वयं अपने पिछली उपलब्धियों की तुलना में उल्लेखनीय रूप से संतोषजनक स्थिति में है।...
भविष्य का भारत: स्वायत्त और स्वावलंबी!

भविष्य का भारत: स्वायत्त और स्वावलंबी!

लोक पर्व-त्योहार
स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त, 2025) पर विशेषप्रो. गिरीश्वर मिश्र, शिक्षाविद् एवं पूर्व कुलपति पराधीन सपनेहु सुख नाहीं! अपनी अमूल्य कृति “रामचरितमानस “में गोस्वामी तुलसीदास जी की यह उक्ति प्राणि मात्र के जीवन की एक प्रमुख सच्चाई को दर्शाती है कि दूसरे के अधीन रहने वाले को सपने में भी सुख नसीब नहीं होता. पराधीन रहते हुए भारत वर्ष ने लगभग हज़ार वर्ष की लंबी अवधि तक अनेकानेक कष्ट सहे और यातनाएँ झेलीं. भारत की पहचान बदलने के लिए न सिर्फ़ नाम ही बदला गया, पहले हिन्दुस्थान फिर इंडिया, बल्कि उसके मानस, संस्थाओं और संस्कार सबको नए साँचे में ढालते रहने की कोशिश जारी रही. तरह-तरह के शोषण द्वारा विदेशी आक्रांताओं ने भारत को विपन्न बनाने की लगातार कोशिश की. अंग्रेज़ों ने उपनिवेश बना कर हद ही कर दी. उन्होंने भारत का भरपूर दोहन किया और शोषण करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. अपने ही देश में ख़ुद को अस्वीकृत ...
रक्षाबंधन : इस बार नौ अगस्त को मनाया जाएगा यह पावन पर्व

रक्षाबंधन : इस बार नौ अगस्त को मनाया जाएगा यह पावन पर्व

लोक पर्व-त्योहार
  रक्षाबंधन का पावन पर्व इस वर्ष 9 अगस्त, श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाएगा। यह त्यौहार भाई-बहन के स्नेह, समर्पण और रक्षा के अटूट बंधन का प्रतीक है। सावन माह में आने के कारण इसे श्रावणी या सावनी भी कहा जाता है। इस बार कुछ स्थानों पर रक्षाबंधन की तिथि को लेकर भ्रांतियाँ फैलाई गई हैं, जिन्हें लेकर यमुना पुत्र आचार्य डॉ. सुरेश उनियाल "महाराज" जी ने शास्त्रों और ज्योतिषीय पंचांग के अनुसार स्पष्ट जानकारी दी है।मुहूर्तभद्रा समाप्ति: 9 अगस्त को प्रातः 1:52 बजे रक्षाबंधन का शुभ मुहूर्त: प्रातः 5:39 बजे से दोपहर 1:24 बजे तक पूर्णिमा तिथि: प्रारंभ – 8 अगस्त को दोपहर 1:40 बजे से समाप्ति – 9 अगस्त को दोपहर 1:24 बजे तक श्रवण नक्षत्र: दोपहर 2:24 बजे तकइस प्रकार, 9 अगस्त को सूर्योदय से दोपहर 1:24 बजे तक रक्षाबंधन के लिए उत्तम समय रहेगा। भद्रा दोष इस समय नहीं है।रक्ष...
जीवन-जगत में हरियाली का प्रतीक है लोकपर्व हरेला

जीवन-जगत में हरियाली का प्रतीक है लोकपर्व हरेला

लोक पर्व-त्योहार
डॉ. प्रकाश उप्रेती पहाड़ों का जीवन अपने संसाधनों पर निर्भर होता है. यह जीवन अपने आस-पास के पेड़, पौधे, जंगल, मिट्टी, झाड़ियाँ और फल-फूल आदि से बनता है. इनकी उपस्थिति में ही जीवन का उत्सव मनाया जाता है. पहाड़ के जीवन में प्रकृति अंतर्निहित होती है. दोनों परस्पर एक- दूसरे में घुले- मिले होते हैं. एक के बिना दूसरे की कल्पना भी नहीं की जा सकती है. यह रिश्ता अनादि काल से चला आ रहा है. 'पर्यावरण' जैसे शब्द की जब ध्वनि भी नहीं थी तब से प्रकृति पहाड़ की जीवनशैली का अनिवार्य अंग है. वहां जंगल या पेड़, पर्यावरण नहीं बल्कि जीवन का अटूट हिस्सा हैं. इसलिए जीवन के हर भाव, दुःख-सुख, शुभ-अशुभ, में प्रकृति मौजूद रहती है. जीवन के उत्सव में प्रकृति की इसी मौजूदगी का लोकपर्व है, हरेला. हरेला का अर्थ हरियाली से है. यह हरियाली जीवन के सभी रूपों में बनी रहे उसी का द्योतक यह लोक पर्व है. यह पर्व खेती से लेकर जीवन तक म...
पामिण और सिलक्यारा टनल, यह महज एक संयोग नहीं?

पामिण और सिलक्यारा टनल, यह महज एक संयोग नहीं?

धर्मस्थल, लोक पर्व-त्योहार
शशि मोहन रवांल्टा आज बाबा बौखनाग देवता की पामिण है और आज ही सिलक्यारा टनल का उद्घाटन भी हो रहा है। इसे महज एक संयोग कहा जाए या फिर बाबा बौखनाग का चमत्कार! जो दोनों एक साथ हो रहे हैं। जहां एक ओर बौखटिब्बा नामक शिखर पर बाबा बौखनाग के पुजारी बाबा की पूजा-अर्चना कर रहे होंगे वहीं दूसरी ओर ठीक उसी बौखटिब्बा, राड़ी डांडे के नीचे सुरंग में राज्य के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, केंद्रीय सड़क एवं परिवहन राज्य मंत्री अजय टम्टा टनल का उद्धाटन करके गाड़ियों के काफिलों को हरी झंडी दिखा रहे होंगे। इसे महज एक संयोग ही कहा जाए या फिर बाबा का ही कोई चमत्कार माना जाए, जो दोनों एक दिन हो रहे हैं।क्या है पामिण बाबा बौखनाग की पामिण प्रत्येक वर्ष संक्रांति (चैत्र मास समाप्ति और बैशाख मास का प्रारंभ) के पहले रविवार अथवा बुधवार को उत्तरकाशी जिले के भाटिया गांव की प्रत्येक बिरादरी से एक व्यक्ति इस पूजा के...
उत्तराखंड के सामाजिक-सांस्कृतिक परंपराओं का वाहक है चूड़ा

उत्तराखंड के सामाजिक-सांस्कृतिक परंपराओं का वाहक है चूड़ा

लोक पर्व-त्योहार
जे. पी. मैठाणी/अनीता मैठाणी उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में धान की कटाई मैदानी क्षेत्रों की अपेक्षा जल्दी शुरू हो जाती है. पर्वतीय क्षेत्रों में प्रमुखतः किंणस्यालू, सुखनन्दी, डिमर्या, बर्मा, लाल साटी सहित कुछ अन्य प्रजातियों को चूड़ा बनाने के लिए उपयुक्त माना जाता है. अगर किसी भी घर-परिवार में चूड़ा कूटे जा रहे हैं या बनाए जा रहे हैं तो आप समझ लीजिए या तो ये बार-त्यौहार का अवसर होगा और या तो कोई न कोई खुशखबरी होगी. वैसे तो वर्ष में एक बार जैसे दीपावली के आसपास अमीर-गरीब सभी के घरों में धान के चूड़े बनाये जाते हैं. क्योंकि दीपावली के समय ही उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में धान की लवाई-मंडाई के बाद साटी/धान के बुखणे और चूड़ा बनाया जाता है. नये धान से बनाए गये चूड़े को सबसे पहले भूमि के देवता भूम्याल, स्थानीय ईष्ट देव के साथ-साथ घर की चारों दिशाओं में थोड़ा-थोड़ा छिटक कर अर्पित किया जाता है. ...