November 27, 2020
संस्मरण

दुना नदी के तट से

बुदापैश्त डायरी-8

  • डॉ. विजया सती

जब हम बुदापैश्त में थे, ऐसे अवसर भी आए जब देश और विदेश एक हो गए! …

वह तीस जनवरी की सुबह थी,  दुना नदी के किनारे की ठंडक ने देह में सिहरन पैदा की. तट से ज़रा ही दूर, वाहनों की आवाजाही के बीच सड़क का एक कोना धीरे-धीरे सजीव हो उठा.

गुमसुम सी उस इमारत के सामने एक-एक कर कई जन आ जुटे जिसकी दीवार पर लगे संग-ए-मरमर पर सुनहरे अक्षरों में अंकित था – इस मकान में 30 जनवरी 1913 को जन्म लिया– भारतीय पिता उमराव सिंह शेरगिल और हंगेरियन मां अंतोनिया की बेटी के रूप में चित्रकार अमृता शेरगिल ने!

चित्रकार की स्मृति को अनौपचारिकता के साथ समर्पित इस कार्यक्रम में बूढ़े, युवा, सामान्य, विशिष्ट – सभी जन सहज भाव से बारिश की बूंदों के बीच केवल अमृता शेरगिल की स्मृति से स्पंदित खड़े थे.

अमृता शेरगिल बीसवीं सदी की महत्वपूर्ण चित्रकार के रूप में जानी गई. उनका आरंभिक जीवन बुदापैश्त में बीता, जहां ओपेरा गायिका मां और प्रख्यात इन्डोलोजिस्ट (भारतविद) मामा इरविन बकतय के संरक्षण में कला और संगीत के प्रति उनकी अभिरुचि को आकाश मिला.

अमृता सिख पिता और हंगेरियन मां की पहली संतान थी, उनकी छोटी बहन का नाम इंदिरा था. अमृता शेरगिल बीसवीं सदी की महत्वपूर्ण चित्रकार के रूप में जानी गई. उनका आरंभिक जीवन बुदापैश्त में बीता, जहां ओपेरा गायिका मां और प्रख्यात इन्डोलोजिस्ट (भारतविद) मामा इरविन बकतय के संरक्षण में कला और संगीत के प्रति उनकी अभिरुचि को आकाश मिला.

पंजाब के प्रतिष्ठित मजीठिया परिवार से आने वाले पिता सरदार उमराव सिंह के पास गर्मियों में जब वे शिमला रहने आती, तो नौ वर्ष की आयु से ही अपनी बहन के साथ वहाँ संगीत प्रस्तुतियाँ देतीं. पैतृक आवास गोरखपुर के पास के ग्रामीण परिवेश में रहते हुए उन्होंने भारतीय जीवन की गरीबी और हताशा के साथ-साथ नारी-जीवन के विषाद को विशेष रूप से नज़दीक से देखा, जो उनकी चित्रकला में बारम्बार अंकित होता रहा.

उनकी यह आत्मस्वीकृति बहुत मर्मस्पर्शी है कि जब मैं यूरोप में होती हूँ, तो भारतीय जीवन की स्मृतियाँ मुझे भारत खींच लाती हैं, जैसे मेरी कला का सूत्र भारत से गहरे जुड़ा है.

उन्होंने किसी भी परम्परा का आंख मूँद कर अनुसरण और पश्चिम की नक़ल न करने का आग्रह सबके सामने रखा. अपनी कला में वे लगातार कई तरह के प्रयोग करती रही.

युवावस्था में विवाह के बाद वे पति के साथ लाहौर रहने आईं, जो अविभाजित भारत में कला-संस्कृति की हलचल से भरा शहर था. घर की ऊपरी मंजिल पर स्थित लाहौर के अपने स्टूडियो में दिन के प्राकृतिक उजाले में चित्र बनाना उन्हें सबसे अधिक पसंद था.

कला स्मृतियों में जीवित रहती है. कला धरोहर के रूप में संचित रहती है. अमृता शेरगिल की स्मृतियाँ वर्षों बाद भी बनी हुई हैं – उनके सेल्फ पोर्ट्रेट, गाँव के दृश्य, युवतियां, दुल्हन, पहाड़ की स्त्रियां, विश्राम के चित्र, ब्रह्मचारी और मिट्टी के हाथी उसी स्मृति के प्रतिरूप हैं.

यह उनके जीवन का मूल्यवान दौर था, लेकिन इस प्रवास का सबसे दुखद पहलू यह रहा कि यहीं बहुत आकस्मिक रूप से, एक अधूरे कैनवास को छोड़ केवल अट्ठाईस वर्ष की उम्र में अमृता शेरगिल एक दूसरी ही यात्रा पर चल दीं. यह घटना 5 दिसंबर 1941 को घटी. प्रतिभावान युवा बेटी की मृत्यु के शोक में डूबे माता-पिता की उपस्थिति में लाहौर में ही उनका अंतिम संस्कार हुआ. यही है कुल कथा एक युवा जीवन के अंत की.

लेकिन कला का अंत नहीं होता.

कला स्मृतियों में जीवित रहती है. कला धरोहर के रूप में संचित रहती है. अमृता शेरगिल की स्मृतियाँ वर्षों बाद भी बनी हुई हैं – उनके सेल्फ पोर्ट्रेट, गाँव के दृश्य, युवतियां, दुल्हन, पहाड़ की स्त्रियां, विश्राम के चित्र, ब्रह्मचारी और मिट्टी के हाथी उसी स्मृति के प्रतिरूप हैं.

अमृता शेरगिल के माध्यम से हम परदेश में मिले अपने देश से !

(लेखिका दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दू कॉलेज की सेवानिवृत्त प्रोफ़ेसर (हिन्दी) हैं। साथ ही विज़िटिंग प्रोफ़ेसर हिन्दी – ऐलते विश्वविद्यालय, बुदापैश्त, हंगरी में तथा प्रोफ़ेसर हिन्दी – हान्कुक यूनिवर्सिटी ऑफ़ फ़ॉरन स्टडीज़, सिओल, दक्षिण कोरिया में कार्यरत रही हैं। कई पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं, पुस्तक समीक्षा, संस्मरण, आलेख निरंतर प्रकाशित होते रहे हैं।)

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