Author: Megha Prakash

युवा हिमालयी श्रृंखला की सबसे ऊंची चोटी, मॉउंट एवरेस्ट पर उत्तराखंड राज्य के तीन युवा राष्ट्रीय कैडेट ने किया सफलतापूर्वक आरोहण

युवा हिमालयी श्रृंखला की सबसे ऊंची चोटी, मॉउंट एवरेस्ट पर उत्तराखंड राज्य के तीन युवा राष्ट्रीय कैडेट ने किया सफलतापूर्वक आरोहण

उत्तराखंड हलचल
हिमांतर के लिए मेघा प्रकाशयुवा अवस्था के दहलीज पर खड़े युवा जहां आजकल नशा और समय बर्बाद करते दिख जाते हैं, वहीं उत्तराखंड राज्य के तीन युवा राष्ट्रीय कैडेट कोर (National Cadet Corps) (NCC) के कैडेट्स: वीरेन्द्र सामन्त (देहरादून), मुकुल बंगवाल (पौड़ी), और सचिन कुमार (उत्तरकाशी) ने 18 मई को माउंट एवरेस्ट, दुनिया की सबसे ऊंची चोटी (8,848 मीटर) पर प्रातः 4 बजकर 6 मिनट पर सफलतापूर्वक चढ़ाई की. इन सभी प्रतिभागी युवाओं में, उत्तरकाशी जिले के गाँव दडमाली के 16 वर्षीय सचिन कुमार सबसे छोटे पर्वतरोही हैं. विद्यालय के एनसीसी अधिकारी एवं प्रधानाचार्य कैप्टेन लोकेन्द्र सिंह परमार ने हिमांतर को बताया कि सचिन ने एवरेस्ट बेस कैंप में पहुँचते ही satellite Phone द्वारा उन्हें यह सूचना दी. मॉउंट एवरेस्ट से पूर्व सचिन कुमार ने गत वर्ष उत्तरकाशी में नेहरू पर्वतारोहण संस्थान से प्रशिक्षण प्राप्त किया तथा अगस...
शिक्षा में अनूठे प्रयास करते उत्तराखंड के शिक्षक

शिक्षा में अनूठे प्रयास करते उत्तराखंड के शिक्षक

शिक्षा
मेघा प्रकाश स्वतंत्र पत्रकार एवं पूर्व सलाहकार संपादक, IISc बैंगलोरशिक्षा की कोई सीमा नहीं है, न ही इसे कक्षाओं तक सीमित रखा जा सकता है. पर्वतीय राज्य उत्तराखंड के एक प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक ने साबित कर दिया कि स्कूल के परिसर से परे भी सीखना संभव है.अल्मोड़ा जिले के गांव बजेला के एक प्राथमिक विद्यालय में भास्कर जोशी ने ‘ग्वाला क्लास’ की अनूठी पहल की जिससे स्कूल को ड्रॉपआउट की संख्या में सुधार करने में मदद मिली. जोशी कहते हैं, ‘शिक्षा सीखने के बारे में है’. यह विचार मेरे मन में तब आया जब मैं 2013 में बजेला प्राइमरी स्कूल में तैनात था. उस समय स्कूल में 10 छात्र नामांकित थे, लेकिन बहुत कम छात्र कक्षाओं में आते थे. जब मैंने अनुपस्थिति के पीछे का कारण जानने की कोशिश की, तो पता चला कि बहुत से माता-पिता अपने बच्चों को स्कूल भेजने के बजाय उन्हें मवेशी चराने के लिए कहते हैं. यहीं से...
देवताओं का वृक्ष ‘पय्या’!

देवताओं का वृक्ष ‘पय्या’!

लोक पर्व-त्योहार
मेघा प्रकाशउत्तराखण्ड में परिभाषा के अनुसार एक बड़ा क्षेत्र 'वन' घोषित है. अतीत में, समुदाय काफी हद तक अपनी आजीविका और दैनिक जरूरतों के लिए इन जंगलों पर निर्भर था. चूंकि, जंगल अस्तित्व के केंद्र में थे, समुदाय के बीच कई सांस्कृतिक और सामाजिक प्रथाएं अभी भी राज्य में प्रचलित हैं. इस प्रकार पवित्र वनों, स्थलों और वृक्षों की अवधारणा इस बात का सूचक है कि कैसे अतीत में समुदाय इन वनों का प्रबंधन करता था और अपनी आजीविका के स्रोत की पूजा करता था. स्थानीय बोलचाल में पवित्र वन चिन्हित स्थल, परिदृश्य, जंगल के टुकड़े या पेड़ हैं, जिन्हें पूर्वजों और श्रद्धेय देवताओं की पवित्र आत्माएं निवास करने के स्थान के रूप में माना जाता था. विश्वास के अनुसार, लोककथाएं, लोक गीत, मेले और पवित्र वनों पर त्योहार उत्तराखंड में समुदाय का हिस्सा हैं.उदाहरण के लिए, 'पय्या' (पयां, पद्म) को पवित्र वृक्ष के रूप ...
मोनाल : क्या बुरांश के फूल भी खाते हैं?

मोनाल : क्या बुरांश के फूल भी खाते हैं?

उत्तरकाशी, पिथौरागढ़
मेघा प्रकाश मोर जैसा रंग-बिरंगा-अति सुन्दर और आकर्षक-मोनाल उत्तराखण्ड का राज्य पक्षी है. देहरादून में स्थित, भारतीय वन्यजीव संस्थान के शोधार्थी रमेश कृष्णामूर्ति, जिन्होनें सन 2003 में हिमाचल प्रदेश में पाए जाने वाले फीसेंट (तीतर) के ऊपर अध्ययन किया था बताते हैं कि मोनाल, एक फीसेंट है. हिमालयन मोनाल या इम्पेयन मोनाल, उत्तराखंड के अलावा हिमाचल प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, और सिक्किम, में पाया जाता है. भारत के अलावा मोनाल नेपाल, दक्षिण तिब्बत और भूटान में भी पाया जाता है. पर, उत्तराखंड में पाया जाने वाला मोनाल, ज्यादा सुन्दर और आकर्षक दिखता है. नर-मादा मोनाल कृष्णामूर्ति बताते है कि नर मोनाल का रंग नीला भूरा होता है. जबकि मादा मोनाल भूरे रंग की होती है. नर मोनाल के सर पर ताज जैसी कल्गी होती है और उसके पंखों में 7 रंग पाए जाते हैं. शोध से पता चलता है कि एक नर मोनाल का औसतन वजन ...