• दिनेश रावत

देवभूमिउत्तराखण्ड के सीमांत जनपद उत्तरकाशी का पश्चिमोत्तर रवाँई क्षेत्र अपनी सामाजिक—सांस्कृतिक विवि​धता एवं विशिष्टता के लिए सदैव से ही विख्यात रहा है. पर्व—त्योहार—उत्सव हों या कोई अन्य सामाजिक—सांस्कृतिक आयोजन, सभी की अपनी—अपनी विशिष्टताएं हैं. पर्व—त्योहारों की श्रृंखला में प्रमुखता से शामिल है ‘भादों की आठाँई’ या ‘दुर्बाष्टमी को श्रीकृष्ण जन्मोत्सव’.

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लोक की अपनी रीति—नीति, मान्यता—परम्पराएं होती हैं उन्हीं के आलोक में लोकवासी श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मनाते हैं, जो पूरी तरह विरल व विविधतायुक्त होता है.कृष्ण के साथ because लोकपूजित समस्त देवी—देवताओं का आह्वान—स्मरण, पूजन—वंदन और धरती के प्रति कृतज्ञता अभिव्यक्त करते हुए आनन्द—उत्सव मनाते हैं.

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भाद्रपद मास यानी एक तरफ श्रीकृष्ण जन्मोत्सव की धूमदूसरी तरफ गाँव—घरों के आस—पास मौसमी साग—सब्जी व फलों से भरे सगवाड़ें और दूर तक सेरों में लहलहाती नाज (धान), चीणा, कौणी,कोदू (मंडवा),झंगोरे की फसलें देखते ही बनती है. गाय—भैंसें भी बयां गयी होती है इसलिए धार—धिनाली (दूध, दही, घी व मक्खन) भी भरपूर.

आजीविका का साधन ही जब कृषि व because पशुपालन हो तो इनकी समृद्धि व सम्पन्नता हर्षित—उल्लासित तो करती ही है. उसमें नागराजा रूप में पूजित—प्रतिष्ठित धार—धिनालीप्रदाता श्री कृष्ण का जन्म अलग से. ऐसे में भला आनन्द—उत्सव मनाने से वे कैसे चूक सकते हैं.

लोक की अपनी रीति—नीति, because मान्यता—परम्पराएं होती हैं उन्हीं के आलोक में लोकवासी श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मनाते हैं, जो पूरी तरह विरल व विविधतायुक्त होता है.कृष्ण के साथ लोकपूजित समस्त देवी—देवताओं का आह्वान—स्मरण, पूजन—वंदन और धरती के प्रति कृतज्ञता अभिव्यक्त करते हुए आनन्द—उत्सव मनाते हैं.

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विशिष्टता यह भी कि श्रीकृष्ण जन्मोत्सव जन्माष्टमी से अधिक दुर्बाष्टमी को मनाया जाता है.दुर्बाष्टमीभाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को ‘आठाँईं’ के रुप में मनायी जाती है. सम्बंधी लोक में नव दम्पति को पुत्र प्राप्ति होने पर मातृ—पितृ—गोत्र एवं ऐश्वर्य अभिवृद्धि कामना के साथ दुर्बा देने की परम्परा प्रचलित है.सूतक—पातकलोक में because समवेत रुप से प्रचलित है. सूतक की अवधि ग्यारह से इक्कीस दिन की होती है. सूतक समाप्ति परपंचगव्य एवं हवन—पूजन के साथ घर का शुद्धिकरण किए जाने के उपरांतही संबंधित परिजनों को दुर्बा दी जाती है.

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भगवान श्री कृष्ण जन्मोत्सव के अवसर पर भी इसी लोकाचार का अनुपालन होता दिखायी देता है. इसलिए लोकवासी श्रीकृष्ण जन्मोत्सव को उसी दिन न मनाकर उसी माह के शुक्ल पक्ष में आने वाली अष्टमी तिथि यानी ग्यारहवें दिन अर्थात् भगवान के घर का शुद्धि हो जाने पर मनाते हैं. भाद्रपद मास की अष्टमी तिथि को बनाये जाने पर because ही इसे ‘आठाँईं’ तथा कृष्ण जन्म पर दुर्बा भेंट किए जाने के चलते ‘दुर्बाष्टमी’ के रुप में मनाते हैं. इस लोकाचार एवं व्यवहार से उसकी निष्पक्षता का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है. समझा जा सकता है कि उसके नीत—नियत देव—मानव या सभी पर किस प्रकार से समान रुप से लागू होते हैं. इसलिए कहा गया है कि लोक की छलनी इनती महीन होती है कि शक की कोई गुंजाइश शेष नहीं रह जाती है.

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आठाँईं पर ‘बिल्ले’ डालते हैं. because बिल्ले अंकुरित धान्य होते हैं.जिसके लिए भाद्रपद की शुक्ल प्रतिपदा की पंचमी तिथि को गेहूँ, जौ, सरसों, सोयाबीन आदि में से तीन प्रकार के अनाज को भिगोते हैं. यहीं से आठाँईं उत्सव शुरु हो जाता है.घर—घर में लोकवादक बढ़ाई बजाते हैं. लोग उन्हें दान—दक्षिणा भेंट करते हैं, जिसे ‘बिलाणी’ कहते हैं.

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श्रीकृष्ण जन्म से आनन्दित—उत्साहित, हर्षित—उल्लासितलोकवासी प्रकृति के सन्निकट रहते हुए प्रकृति प्रदत्त उपादानों के सहारे ही अपनी आस्था व भक्ति को अभिव्यक्त करते हैं जिसके लिए because खेतों में तैयार फसलों की बालियाँ यथा— नाज (अनाज), चीणा, कौणी, झंगरु, कोदू (मंडवा), मार्सा (चौलाई) तथा कूसा व दरबा घास को एक साथ बांधते हुए उनसे आठाँईं पूजन हेतु विग्रह प्रतिमा बनाकर पुष्प—मालाओं से सुसज्जित कर पूजा स्थल पर स्थापित करते हैं. आठाँईं के लिए दरबा को जड़ों सहित ही लाया—लगाया जाता है.इसमें दरबा का विशेष महत्व होता है. उसी से महिलाएंपूजन के दौरान नवजात ​श्रीकृष्ण के केश संवारती हैं.

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आठाँईं पूजन के लिए थोड़ी—थोड़ी मात्रा में सभी प्रकार की साग—सब्जी निकालकर मिश्रित सब्जी बनायी जाती है. पूरी—परसाद, स्वाले—पकोड़े, खीर, दूध, दही के अतिरिक्त मक्का, अखरोट व समस्त मौसमी फलों को भोग लगाते हुए धूप—दीप के साथ यथेष्ट पूजन किया जाता है. महिलाओं का व्रत (उपवास) होता है. आठाँईं पूजन के दौरान वे because अनाजकी बालियों तथा कूसा घास केसाथ लगे दरबा को बाल भगवान श्रीकृष्ण के केश मानते हुए उन्हें संवारती—सुलझाती हैं. चुटिया बनाती हैं. केश संवारते या चुटिया बनाते हुए मन में श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप का ध्यान और घर—परिवार की सामाजार्थिक सुख—सम्पन्नता एवं खुशहाली की कामना साथ—साथ चलती रहती हैं.

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मान्यता यह भी प्रचलित है कि इस रुप में श्रीकृष्ण के केश संवारना भाइयों के लिए विशेष शुभ फलदायी होता है. चुटिया एक—दो नहीं बल्किक्रमशः सात बार बनाती हैं. एक के बाद एक करते because हुए महिलाएं उन्हें गूंथती और खोलती जाती है. चुटिया गूंथने के दौरान पहली से सातवीं बार तक इसअनुपात में पूरा करते हैं कि सातवीं बार में पूरी हो जाए.जैसे पहले चौथाई से भी कम, दूसरी बार उससे थोड़ा अधिक यानी हर बार थोड़ा अधिक और सातवीं बार पूरी चुटिया गूंथी जाती है.

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परम्परानुसार सरसों को अखरोट और शेष को कद्दू के पत्तों में बांधा जाता है. बांधने के लिए भी दरबा घास को रस्सी के रूप में प्रयोग में लाया जाता है. पत्तों के अंदर अंकुरण हेतु बांधे जाने पर इन्हें ‘बीड़’ कहते हैं. बीड़ सदैव विषम संख्या में बनते हैं. उसी टोकरी में बीड़ों के साथ 4 छोटे—छोटे कंकण भी रखे जाते हैं. because सप्तमी तिथि को उन्हें वैसे ही रहने दिया जाता है, जिसे ‘बेठरऊ’ कहते हैं और अष्टमी यानी आठाँईं के दिन विधिवत् पूजन—अर्चन के बाद खोलते है तो अंकुर निकले होते हैं. बिल्लरूपी अंकुरित बीजों कोसर्वप्रथम आठाँईं पर डालते हैं.

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आठाँईं पर ‘बिल्ले’ डालते हैं. बिल्ले अंकुरित धान्य होते हैं.जिसके लिए भाद्रपद की शुक्ल प्रतिपदा की पंचमी तिथि को गेहूँ, जौ, सरसों, सोयाबीन आदि में से तीन प्रकार के अनाज को भिगोते हैं. यहीं से आठाँईं उत्सव शुरु हो जाता है.घर—घर में लोकवादक बढ़ाई बजाते हैं. लोग उन्हें दान—दक्षिणा भेंट करते हैं, जिसे ‘बिलाणी’ कहते हैं. because अगली सुबह भिगोये गये धान्य को स्वच्छ पानी से धोकर पूरी शुद्धता व शुचिता के साथ पत्तों में बांधकर रिंगाल कीस्वच्छ टोकरी में रख देते हैं. धान्य को बांधने के​ लिए अखरोट व कद्दू के पत्तों को उपयोग में लाया जाता है.

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परम्परानुसार सरसों को अखरोट और शेष को कद्दू के पत्तों में बांधा जाता है. बांधने के लिए भी दरबा घास को रस्सी के रूप में प्रयोग में लाया जाता है. पत्तों के अंदर अंकुरण हेतु बांधे जाने पर इन्हें ‘बीड़’ कहते हैं. बीड़ सदैव विषम संख्या में बनते हैं. उसी टोकरी में बीड़ों के साथ 4 छोटे—छोटे कंकण भी रखे जाते हैं. सप्तमी तिथि को because उन्हें वैसे ही रहने दिया जाता है, जिसे ‘बेठरऊ’ कहते हैं और अष्टमी यानी आठाँईं के दिन विधिवत् पूजन—अर्चन के बाद खोलते है तो अंकुर निकले होते हैं. बिल्लरूपी अंकुरित बीजों कोसर्वप्रथम आठाँईं पर डालते हैं. तत्पश्चात् सभी परिजन अपने से बड़ों पर पैरो से लेकर सिर तक बहुत ही सलीके के साथ (बिल्ल) डालते हैं, जिसे बिल्ल खेलना कहते हैं. इस दौरान मंगलकामनाओं की जो पंक्तियाँ गायी—दोहरायी जाती हैं, दृष्टव्य हैं:—

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आकाश की तारी, पाताल की गारी
जेखताईं पूस—बिराऊ की सींग ना आई
तेखताईं तुमारी बारी.
अर्थात् आकाश में जब तक तारें रहें/ पाताल में कंकड़—पत्थर रहें/ चूहे—बिल्लियों की सींग न आए/ तब तक आप जीते रहें.

परिवार में बिल्ल खेलने का because क्रम शुरु हो उससे पहले ही आठाँई की पूजा—पिठाई करके भोग लगाकर सभी लोग थाती के पास ले आते हैं. थाती गाँव का एक सामूहिक स्थल होता है. कई ग्राम्य अंचलों में आठाँईं पूजन के लिए कुल पुरोहित पहुँचते हैं. आठाँईं के साथ लोग घरों में बना भोजन और फल—फूल इत्यादि भी थाती पर लेकर जाते हैं, जहाँ ऐसा नहीं होता वे लोग पूजा पश्चात आठाँई को जल स्रोत के पास पहुँचा आते हैं.

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थाती पर सभी घरों से आठाँईं पहुँच जाने के बादपुन: सभी को एक साथ बांध दिया जाता है. वहीं जमीन में एक गड्डा बना कर आठाँईं को पहले उसमें डालते हैं और फिर ढोल—बाजों के साथ because पूरी—प्रसाद चढ़ाते हैं. पंडित के मंत्रोचारण के साथ पुन: वैदिक व लौकिक तरीके से थाती पर आठाँई पूजन होता श्रीकृष्ण का जन्म व धरती से प्राप्त समस्त फसलों को अपने उपयोग में लाये जाने से पहले पूरी श्रद्धा—विश्वास के साथ धरती को अर्पित किया जाता है. पूजा समाप्ति पश्चात् प्रसाद स्वरूप उसके अंश वापस पाने को लोकवासी टूट पड़ते हैं. अंधेरा होने तक ये समाप्त हो चुका होता है. उसके बाद शुरु होता है ढोल—बाजों के साथ आनन्द—उत्सव मनाने का दौर. देर रात तक तांदी गीत चलते रहते हैं, जो अधिकांश गाँव में विलुप्त प्रायः ही हो गए हैं.

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आठाँईं पूजन, बिल्ल खेलना श्रीकृष्ण जन्मोत्सव, आराध्य देवी—देवताओं के पूजन एवं प्रकृति या धरती के प्रति आस्था—श्रद्धा व कृतज्ञता का पर्व है, जिससे हर्षोल्लास, because आनन्द—अनुरंजन, संस्कार—सरोकार व सांजस्य— समन्वय, मेल—मिलाप की साझी तस्वीर उभरकर सामने आती है.

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अगले दिन वहीं पूरे गाँव यानि भाई—भयात, बिरादरी में बिल्लखेले जाते हैं. सभी एक—दूसरों के नाते—रिश्ते में छोटे, बड़ों के घर बिल्ल खेलने जाते हैं. घरों में स्वाले—पकोड़े, खीर आदि बना रहता है. सभी एक—दूसरे के घर में बेहद आत्मीयता के साथ भोजन ग्रहण करते हैं. गाँव के बाद इष्टदेवता के मंदिर का नम्बर आता है. because आस—पास ग्रामों के सभी लोग ढोल—बाजों के साथ बिल्ल लेकर इष्टमंदिर के लिए निकलते और अपने इष्ट के श्रीचरणों में भी बिल्लरुपी अंकुरित धान्य अर्पित कर आते हैं. इष्टमंदिरमें सरसों के बिल्लही उपयोग में लाए जाते हैं. कई क्षेत्रों में उसके अगले दिन मंदिरों मे मेले बनते हैं, जो ‘भादऊथौल’ के रुप में प्रसिद्ध व प्रतिष्ठित होते हैं.

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इसके साथ ही वार्षिक पर्व—त्योहार—उत्सवों को दौर शुरु हो जाता है. इस प्रकार आठाँईं पूजन, बिल्ल खेलना श्रीकृष्ण जन्मोत्सव, आराध्य देवी—देवताओं के पूजन एवं प्रकृति या धरती के because प्रति आस्था—श्रद्धा व कृतज्ञता का पर्व है, जिससे हर्षोल्लास, आनन्द—अनुरंजन, संस्कार—सरोकार व सांजस्य— समन्वय, मेल—मिलाप की साझी तस्वीर उभरकर सामने आती है.

(लेखक साहित्यकार एवं वर्तमान में अध्यापक के रूप कार्यरत हैं)

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Himantar

हिमालय की धरोहर को समेटने का लघु प्रयास

1 Comment

    शानदार जानकारी। आपने लोक की एक अद्भुत परंपरा से नई पीढ़ी को आत्मसात करवाया। उन्हें लोक के होने का महत्व समझाया।

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