अजनबी

ललित फुलारा

जो सच है उसे छिपाना क्यों? मैं स्वछंद हूं. जो मन में आता है, बिना किसी के परवाह के करती हूं. उसने भी मुझे इसी रूप में स्वीकारा था. हाथ पकड़ कहा था, ‘जो बित गया, उससे मुझे कोई लेना नहीं.‘ मैं  फिर भी नहीं मानी थी. जानती थी पुरुष के कहने और करने में बहुत फर्क होता है. वो जिद्दी था. पूरे पांच साल इंतजार करता रहा. जब हम करीब आए, मैंने ऐसे बंधन की कल्पना नहीं की थी. वह मेरा दोस्त और लाल-पीले-नीले रंगों से भरी डायरी के पन्नों का राजदार था. छोटी-छोटी ख्वाहिशों, फरमाइशों से लेकर प्यार और चाहत हर चीज़ से वाकीफ. शादी के बाद क्या औरत की चाहत खत्म हो जाती है? वह तकिए को छाती से लगाकर किसी के ख्वाब नहीं समेट सकती. किसी का साथ, हाथों का स्पर्श और बातें उसे नहीं भा सकती. समझौतों से दबी, सारी चाहत दफ्न कर देती है एक औरत और वह मर्द कभी नहीं समझता जो ख्वाबों तक ले जाने का दंब भरता है.

सपने में अब भी वो दो हाथ चुपचाप मेरी छाती की तरफ बढ़ आते हैं. उसदिन के बाद न कभी मेरी हिम्मत हुई और न ही वो करीब आया. आखिर क्यों होता है ऐसा? अंदर से मैं उसे स्वीकार कर चुकी थी और उन हाथों की तकिया बन जाना चाहती थी. सारी भावनाओं को मार डाला. अब सोचती हूं काश, मैं ही उसके करीब चली गई होती और बता देती तुमने कुछ भी गलत नहीं किया. मैं भी यही चाहती थी. हिम्मत नहीं थी.

सारी हदें पार कर उसे पाता है.. और फिर उसके बाद क्या होता है? वही उसको उसके अतीत में ले जाता है. छोटी-छोटी बातों पर कोई ऐसा ताना दे मारता है जो वो कब-का भुला चुकी होती है. शादी के तीन महीने बाद जब पहली बार गंदे पैर लेकर बेड पर ना चढ़ने की हिदायत दी तो छूटते ही ‘वो होता तो उससे भी ऐसा ही कहती’. अंदर के तूफान को मुश्किल से दबाया और बात आई-गई हो गई. 20 साल की उम्र में पहली बार किसी ने मेरे उरोज छुए. कैसे भूल सकती हूं उस एहसास को? शरमा गई थी. फटाफट घर भाग आई. चेहरा निढाल. अंदर ही अंदर ख्वाब बुन रही थी. सोच रही थी, उन हाथों की पकड़ और मजबूत क्यों नहीं थी? किसने रोका था उसे. बड़ी देर तक अपनी छाती दबाती रही उन हाथों की कल्पना कर. बहुत सुखद एहसास था वो, जो फिर कभी नहीं मिला.

हर हफ्ते मुझे उसके सुनसान कमरे में एक रात बितानी होती. पीजी की लड़कियां सोचती मैं मौसी के यहां जा रही हूं. वो पागल हो जाता, रातभर नहीं सोने देता. धीरे-धीरे मारपीट का दौर भी शुरू हो गया. उसे हमेशा मेरे ठंडे रहने की शिकायत रहती. मैं उसके बिस्तर पर फिर से उन्हीं हाथों की कल्पना करने लगी जिनके स्पर्श का मैंने लंबा इंतजार किया. 

सपने में अब भी वो दो हाथ चुपचाप मेरी छाती की तरफ बढ़ आते हैं. उसदिन के बाद न कभी मेरी हिम्मत हुई और न ही वो करीब आया. आखिर क्यों होता है ऐसा? अंदर से मैं उसे स्वीकार कर चुकी थी और उन हाथों की तकिया बन जाना चाहती थी. सारी भावनाओं को मार डाला. अब सोचती हूं काश, मैं ही उसके करीब चली गई होती और बता देती तुमने कुछ भी गलत नहीं किया. मैं भी यही चाहती थी. हिम्मत नहीं थी. तीन साल निकाल दिए उसके ख्यालों में और चुपचाप हर दिन उस स्पर्श को महसूस करती रही. पढ़ाई खत्म हुई नौकरी करने लगी. मेरे सामने की ही कुर्सी पर बैठता था वह. दिनभर हंसी मजाक करता और लड़कियों से घिरा रहता. पता ही नहीं चला कब वो दो हाथ बड़े हुए और खुद को एक दिन उसकी गोद में पाया. मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा था और उसे बहुत जल्दी थी. मैं बुत की तरह कुछ समझना चाह रही थी और वो पा लेना चाहता था. जीत उसकी ही हुई और मैं निढाल पड़ गई.

अब महीने में एक बार वो मेरे शरीर का मुआयना करता. मैं बदल गई थी. मेरी न, हमेशा उसकी हां होती. वक्त बीतने के साथ ही महीने की जगह हफ्ते ने ले ली. हर हफ्ते मुझे उसके सुनसान कमरे में एक रात बितानी होती. पीजी की लड़कियां सोचती मैं मौसी के यहां जा रही हूं. वो पागल हो जाता, रातभर नहीं सोने देता. धीरे-धीरे मारपीट का दौर भी शुरू हो गया. उसे हमेशा मेरे ठंडे रहने की शिकायत रहती. मैं उसके बिस्तर पर फिर से उन्हीं हाथों की कल्पना करने लगी जिनके स्पर्श का मैंने लंबा इंतजार किया. फिर अचानक से उसने कमरे पर बुलाना बंद कर दिया. मैं सब जानती थी क्या हो रहा है लेकिन उसकी आजादी में कोई दखल नहीं दिया. सही कहूं तो मैं भी यही चाहती थी. धीरे-धीरे वक्त बीता और मैं जयपुर से दिल्ली आ गई. यहां एक ऑफिस में अकाउंटेंट का काम करने लगी. अब मैंने सोच लिया था न जीवन में किसी से प्यार करुंगी और न ही किसी को अपने करीब आने दूंगी. पीजी की लड़कियां रात दो बजे तक अपने प्रेमियों के साथ फोन पर चिपकी रहती. सामने पार्क में प्रेम मिलन होता और मैं न चाहते हुए भी सहेलियों के साथ होती. जैसे ही मैं सामने किसी को लिपटे देखती वो सिलनभरा कमरा याद आ जाता, मेरी बैचने बढ़ने लगती. पांव साथ छोड़ने लगते.

मैं समझ गई और उसके बाद हम दोनों में से किसी ने भी इस पर कोई बात नहीं की और फिर से हम वैसे ही वक्त बिताने लगे. पता नहीं अब वो कहां होगा. उसका धुंधला चेहरा मेरी आंखों से हटता ही नहीं है. उसी तरह से जिस तरह से उन हाथों का स्पर्श मेरे अहसास में हमेशा बना रहता है. मैं अपनी जिंदगी के सच को छिपाती नहीं. मुझे अब उतरना है. उसने सीट से उठते हुए कहा, जो पता नहीं कब मेरे बगल में आ बैठी थी.

सहेलियों में कइयों की कहानी मुझसे मिलती जुलती थी. फर्क बस इतना था वो खुलकर बताया करती, मैं आदर्शवादी होने का चोला ओढ़े रहती. एक साल भी नहीं बिता था, मुझे फिर उन हाथों की एहसास होने लगा. फिर मैं भी करवट बदलकर तकिए को छाती से दबाए ख्वाबों की दुनिया में तैरने लगी. मेरे चेहरे की उदासी छटने लगी. उसका नाम रोहन था. पढ़ने-लिखने का जबर शौकीन. बातों में फिलॉसफर. वह कहता, प्रेम मिल जाए तो समझौता बन जाता है और न मिले तो अमरता पा लेता है. कभी कहता, हर पहले प्रेम के बाद दूसरा उससे कई गुना ज्यादा परिपक्व और मजबूत होता है. उसे पहला प्यार पांचवी में हुआ और उसने हमेशा लड़की को आम के पेड़ के नीचे छुपाने का ख्वाब बुना. आठवीं में गया कैमेस्ट्री पढ़ाने वाली मैडम के सपने देखने लगा.

10 वीं में पहली बार ट्यूशन वाली दीदी का ख्वाब देखना शुरू किया. बारहवीं में पहली बार अपनी प्रेमिका के साथ दो घंटे बिताए और जीभर बातें करता रहा. वह अपनी जिंदगी की हर बात खुलकर बताता. न झिझक होती और न ही शर्म महसूस करता. हम दोनों का वक्त एक दूसरे के साथ बीतने लगा. खूब बातें होती. पर उसने हमेशा एक बराबर दूरी बनाए रखी. बहुत सोचने के बाद, एक दिन मैंने उसे अपने दिल की बात कह दी. उसके चेहरे की हंसी उड़ गई. कुछ नहीं बोला और सारा वक्त एक अजीब-सी उलझन उसके चेहरे पर खिंची रही. फिर शाम को उसने मैसेज में एक तस्वीर भेजी. ये तस्वीर एक सांवली लड़की की थी. रिया नाम था.

मैं समझ गई और उसके बाद हम दोनों में से किसी ने भी इस पर कोई बात नहीं की और फिर से हम वैसे ही वक्त बिताने लगे. पता नहीं अब वो कहां होगा. उसका धुंधला चेहरा मेरी आंखों से हटता ही नहीं है. उसी तरह से जिस तरह से उन हाथों का स्पर्श मेरे अहसास में हमेशा बना रहता है. मैं अपनी जिंदगी के सच को छिपाती नहीं. मुझे अब उतरना है. उसने सीट से उठते हुए कहा, जो पता नहीं कब मेरे बगल में आ बैठी थी.

(पत्रकारिता में स्नातकोत्तर ललित फुलारा ‘अमर उजाला’ में चीफ सब एडिटर हैं. दैनिक भास्करज़ी न्यूजराजस्थान पत्रिका और न्यूज़ 18 समेत कई संस्थानों में काम कर चुके हैं. व्यंग्य के जरिए अपनी बात कहने में माहिर हैं.)

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