
जौनसार-बावर का अनूठा ‘पाइंता पर्व’: देव आराधना, शस्त्र पूजन, वीर गाथाओं और पश्चाताप की सदियों पुरानी परंपराओं का संगम

इन्द्र सिंह नेगी
वरिष्ठ पत्रकार
उत्तराखंड के जनजातीय क्षेत्र जौनसार-बावर की लोक संस्कृति अपनी विशिष्ट परंपराओं, देवी-देवताओं के प्रति अगाध आस्था और ऐतिहासिक विरासत के लिए अलग पहचान रखती है। यहाँ विजयदशमी का पर्व देश के अधिकांश हिस्सों से बिल्कुल अलग स्वरूप में मनाया जाता है। जहाँ सामान्यतः दशहरा भगवान राम की रावण पर विजय के प्रतीक के रूप में रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतलों के दहन के साथ मनाया जाता है, वहीं जौनसार-बावर में परंपरागत रूप से रावण-दहन के बजाय देव आराधना, शस्त्र पूजन, वीरों के स्मरण और सामूहिक उल्लास का पर्व ‘पाइंता’ मनाया जाता है। जौनसार-बावर के महासू महाराज और सिलगुर महाराज के देवालयों में पाइंता विशेष श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। बिसोई, लखवाड़, लखस्यार, टगरी, सिमोग और कनबुवा सहित अनेक देवस्थलों में पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान आयोजित होते हैं।

पर्व से पहले नाग देवता को कौणी, जो पहाड़ी क्षेत्रों का पारंपरिक अनाज है, का प्रसाद अर्पित करने की परंपरा है। सप्तमी को ‘पाँचों पर्व’ तथा अष्टमी को विशेष पूजा-अर्चना का विधान भी विभिन्न देवस्थलों की मान्यताओं से जुड़ा है।
पाइंता के दिन देवताओं के पवित्र निसाण, प्रतीक चिह्न और देव पालकियाँ श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ मंदिर प्रांगण में लाई जाती हैं। श्रद्धालु चावल, मुद्रा और अखरोट अर्पित कर आराध्य देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। देव डोलियों को कंधों और सिर पर रखकर पारंपरिक ढंग से नचाया जाता है। देवताओं के पश्वा, जिन्हें देवता का माध्यम माना जाता है, देव-आवेश में नृत्य करते हैं। ढोल-दमाऊ की गूंज, देव-गायन और श्रद्धालुओं के जयकारों से वातावरण भक्तिमय हो उठता है।
पाइंता पर्व की एक महत्वपूर्ण विशेषता मंदिर प्रांगण में स्थित विशेष समतल पत्थर है, जिसे स्थानीय परंपरा में ‘पाइंते की पटाल’ कहा जाता है। इसके चारों ओर खूंटियाँ गाड़कर हल्दी लगे धागे अथवा रक्षा सूत्र बाँधे जाते हैं। इसी स्थान पर विधि-विधान से शस्त्र पूजन संपन्न होता है। पूजा के बाद श्रद्धालु इन रक्षा सूत्रों को अपनी कलाई पर बाँधकर देव कृपा और मंगल की कामना करते हैं। इस परंपरा में धार्मिक आस्था के साथ सामूहिक सुरक्षा, साहस और सामाजिक एकता की भावना भी निहित है। इसकी विशेषता यह है कि यहाँ विजयदशमी से जुड़ी परंपराएँ किसी एक धार्मिक आख्यान तक सीमित नहीं, बल्कि इनमें वीरता, सामाजिक न्याय, पश्चाताप और सामुदायिक एकता के विविध रंग समाहित हैं।

पाइंता पर्व के अवसर पर पशगाँव खत के मलेथा गाँव में क्षेत्र के ऐतिहासिक वीर नंत राम नेगी के अस्त्र-शस्त्रों का पारंपरिक पूजन किया जाता है। उनकी वीर गाथाएँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोक स्मृतियों में जीवित हैं। विजयदशमी पर उनके शस्त्रों का पूजन पूर्वजों के साहस, पराक्रम और गौरवशाली विरासत के प्रति सम्मान प्रकट करने की परंपरा है।
पाइंता पर्व की सबसे अनूठी परंपराओं में उदपाल्टा और कुरौली गाँवों के बीच खेला जाने वाला प्रसिद्ध ‘गागली युद्ध’ है। यह युद्ध किसी विजय या पराजय के लिए नहीं, बल्कि एक दुखद घटना की स्मृति और सामूहिक पश्चाताप के प्रतीक के रूप में खेला जाता है। इसका रामलीला अथवा राम-रावण युद्ध से कोई संबंध नहीं है।

स्थानीय लोककथा के अनुसार, प्राचीन समय में रानी और मुन्नी नाम की दो बहनें पानी भरने गई थीं। इसी दौरान रानी का पैर फिसलने से वह कुएँ में गिर गई। मुन्नी ने घर लौटकर घटना की जानकारी दी, लेकिन परिजनों ने उसी पर अपनी बहन को कुएँ में धक्का देने का आरोप लगा दिया। निर्दोष होने के बावजूद लगे इस कलंक से आहत मुन्नी ने भी कुएँ में कूदकर प्राण त्याग दिए। बाद में घटना की वास्तविकता सामने आने पर ग्रामीणों को अपने संदेह और आरोपों पर गहरा पश्चाताप हुआ। लोकमान्यता है कि इसी दुखद घटना की स्मृति में रानी-मुन्नी की पूजा और गागली युद्ध की परंपरा आरंभ हुई।
पाइंता से दो दिन पहले दोनों बहनों की काँस घास से प्रतीकात्मक आकृतियाँ तैयार कर उनकी पूजा की जाती है। पर्व के दिन इनका विधिवत विसर्जन होता है। इसके बाद उदपाल्टा और कुरौली के ग्रामीण आमने-सामने आकर अरबी, जिसे स्थानीय भाषा में गागली कहा जाता है, के डंठलों और पत्तों से सांकेतिक युद्ध करते हैं।

इस युद्ध में न कोई विजेता होता है, न पराजित। आयोजन के बाद दोनों गाँवों के लोग पंचायती आँगन में एकत्र होकर पारंपरिक हारुल और तांदी नृत्य करते हैं। इस प्रकार एक दुखद लोकस्मृति सामाजिक एकता और मेल-मिलाप के उत्सव में बदल जाती है। यह परंपरा बिना सत्य जाने किसी निर्दोष पर आरोप लगाने के गंभीर परिणामों का संदेश भी देती है।
महासू महाराज के प्रसिद्ध जागड़े के बाद पाइंता को जौनसार-बावर के प्रमुख धार्मिक और सांस्कृतिक पर्वों में गिना जाता है। रोजगार, शिक्षा और व्यवसाय के कारण क्षेत्र से बाहर रहने वाले लोग भी इस अवसर पर अपने पैतृक गाँवों और देवस्थलों में लौटने का प्रयास करते हैं। नाते-रिश्तेदारों और अतिथियों के आगमन से गाँवों में विशेष चहल-पहल रहती है। यह पर्व बिछड़े परिवारों को मिलाने, सामाजिक रिश्तों को मजबूत करने और नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से परिचित कराने का अवसर भी है।

जौनसार-बावर में पाइंता की विशिष्ट परंपरा के साथ रामलीला मंचन का भी अपना इतिहास रहा है। कालसी, लखवाड़, सहिया और चकराता जैसे स्थानों पर लंबे समय से रामलीला का मंचन होता आया है। एक समय कालसी, साहिया और लखवाड़ की रामलीलाएँ इतनी प्रसिद्ध थीं कि दूरदराज के गाँवों से लोग इन्हें देखने पहुँचते थे।
बदलती जीवनशैली और आधुनिक मनोरंजन के साधनों के बढ़ते प्रभाव के बीच पारंपरिक रामलीला मंचन के सामने चुनौतियाँ खड़ी हुई हैं। इसके बावजूद पाइंता पर्व की धार्मिक और सांस्कृतिक महत्ता आज भी बनी हुई है।

दरअसल, पाइंता की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि यहाँ विजयदशमी केवल विजय का उत्सव नहीं, बल्कि वीरता के सम्मान, देव आस्था, सामाजिक पश्चाताप और सामूहिक एकता का संदेश भी है। मलेथा में वीर नंत राम नेगी के शस्त्रों का पूजन, उदपाल्टा-कुरौली का गागली युद्ध और देवालयों में पाइंता पूजन इस बात के प्रमाण हैं कि जौनसार-बावर ने अपनी सदियों पुरानी लोक स्मृतियों और सांस्कृतिक विरासत को आज भी जीवंत रखा है।
