
5,000 KM का हिमालयी सफर, 106 दर्रे, नीलकंठ-सासेर कांगड़ी की चोटियां और ब्रह्मपुत्र की प्रचंड धाराएं—एसपी चमोली को टेंज़िंग नोर्गे राष्ट्रीय साहसिक पुरस्कार की ‘लाइफटाइम अचीवमेंट’ श्रेणी के लिए चुना गया
- विजेन्द्र रावत, वरिष्ठ पत्रकार
मसूरी। 265 दिन। 5,000 किलोमीटर से अधिक का सफर। हिमालय के 106 दुर्गम दर्रे। एक तरफ कंचनजंगा, दूसरी तरफ काराकोरम। रास्ते में बर्फ, खतरनाक ढलानें और प्रकृति की ऐसी चुनौतियां, जहां एक गलत कदम जिंदगी पर भारी पड़ सकता था। यह किसी फिल्म की पटकथा नहीं थी।
वर्ष 1981 में शिव प्रसाद चमोली (एसपी चमोली) के नेतृत्व में निकले संयुक्त भारत–न्यूजीलैंड हिमालयन ट्रैवर्स अभियान की यह वास्तविक कहानी थी। महान पर्वतारोही सर एडमंड हिलेरी के संरक्षण में हुए इस अभियान ने चमोली का नाम भारतीय साहसिक इतिहास में दर्ज कर दिया। लेकिन यह उनकी कहानी का केवल एक अध्याय था।
नीलकंठ की दुर्गम चोटी पर आरोहण से लेकर काराकोरम की सासेर कांगड़ी-III पर प्रथम सफल चढ़ाई का नेतृत्व, केदार डोम पर स्की अभियान से लेकर ब्रह्मपुत्र की प्रचंड धाराओं में करीब 1,100 किलोमीटर की ऐतिहासिक राफ्टिंग तक—छह दशकों से अधिक समय से चमोली का जीवन हिमालय और साहस का पर्याय रहा है।
अब इसी जीवन-साधना को देश ने सर्वोच्च स्तर पर सम्मानित किया है।
भारत सरकार के युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्रालय ने 84 वर्षीय एसपी चमोली को टेंज़िंग नोर्गे राष्ट्रीय साहसिक पुरस्कार की ‘जीवनपर्यंत उपलब्धि’ श्रेणी के लिए चुना है। अर्जुन पुरस्कार के समकक्ष प्रतिष्ठा रखने वाले इस सम्मान के लिए उनका चयन उत्तराखंड के साथ पूरे भारतीय साहसिक समुदाय के लिए गौरव का क्षण है।
नीलकंठ ने रोका रास्ता, चमोली ने बना दिया इतिहास
1942 में जन्मे एसपी चमोली का हिमालय से रिश्ता एक युवा सैन्य अधिकारी के रूप में शुरू हुआ। बाद में वे भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) में पहुंचे और उप महानिरीक्षक के पद तक अपनी सेवाएं दीं।
लेकिन उनकी पहचान वर्दी के दायरे से कहीं आगे जाने वाली थी।
1974 में चमोली ने 21,640 फीट ऊंचे नीलकंठ शिखर पर सफल आरोहण अभियान का नेतृत्व किया। उस दौर में इस दुर्गम शिखर की चुनौती स्वीकार करना अपने आप में असाधारण था।
चार साल बाद, 1978 में भारत के प्रथम स्कीइंग अभियान में वे उप-नेता बने और 22,710 फीट ऊंचे केदार डोम पर आरोहण किया। उपलब्धि की सराहना तत्कालीन प्रधानमंत्री ने भी की।
1989 में इटली में विश्व पुलिस शीतकालीन खेलों और यूरोपीय स्की चैंपियनशिप में भारत की पहली टुकड़ी की कमान भी चमोली के हाथों में थी।
पहाड़ उन्हें लगातार बड़ी चुनौतियों की ओर बुला रहे थे।

265 दिन… 106 दर्रे… और 5,000 KM लंबी हिमालय की परीक्षा
1981 आया और उसके साथ वह अभियान भी, जिसने भारतीय साहसिक इतिहास में एक असाधारण अध्याय जोड़ा।
चमोली के नेतृत्व में संयुक्त भारत–न्यूजीलैंड दल ने कंचनजंगा से काराकोरम तक संपूर्ण हिमालय को पार करने की चुनौती स्वीकार की।
रास्ता हजारों किलोमीटर लंबा था। बर्फ से ढके दर्रे थे। दुर्गम भूभाग था। मौसम कभी भी करवट बदल सकता था।
अभियान चला—एक-दो सप्ताह नहीं, पूरे 265 दिन।
जब दल दूसरी ओर पहुंचा, उसके खाते में 5,000 किलोमीटर से अधिक का सफर और 106 हिमालयी दर्रे दर्ज हो चुके थे।
सर एडमंड हिलेरी के संरक्षण में संपन्न यह अभियान आज भी चमोली के साहसिक जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिना जाता है।
पहाड़ जीता तो नदी ने पुकारा
चमोली की कहानी की खासियत यह है कि उन्होंने खुद को पर्वतारोहण तक सीमित नहीं किया।
1986 में उन्होंने काराकोरम की 24,695 फीट ऊंची सासेर कांगड़ी-III पर प्रथम सफल आरोहण का नेतृत्व किया।
पहाड़ से उतरने के बाद अभियान समाप्त हो सकता था।
लेकिन चमोली के लिए नहीं।
इसके बाद उनकी टीम ने श्योक नदी में 105 किलोमीटर की राफ्टिंग यात्रा पूरी की।
और फिर सामने आई ब्रह्मपुत्र।
1991 में संयुक्त भारत–जापान ब्रह्मपुत्र राफ्टिंग अभियान की कमान चमोली ने संभाली। त्सांगपो गॉर्ज और ब्रह्मपुत्र की विकराल धाराओं के बीच दल ने गेलिंग से धुबरी तक करीब 1,100 किलोमीटर की ऐतिहासिक राफ्टिंग पूरी की।
बर्फीली चोटियों को चुनौती देने वाला पर्वतारोही अब उफनती नदियों में भी भारतीय साहस की नई कहानी लिख चुका था।
रिकॉर्ड अपने नाम किए, जिंदगी दूसरों को तैयार करने में लगा दी
किसी साहसिक अभियानकर्ता के लिए इतने कीर्तिमान ही जीवन की पर्याप्त उपलब्धि हो सकते थे।
लेकिन एसपी चमोली यहां नहीं रुके।
ITBP से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने अपने अनुभव को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का निर्णय लिया और 1994 में केम्पटी फॉल, मसूरी में हिमालयन एडवेंचर इंस्टीट्यूट (HAI) की स्थापना की।
लक्ष्य स्पष्ट था—ऐसी पीढ़ी तैयार करना जो हिमालय से प्रेम तो करे, लेकिन उसकी चुनौतियों को समझते हुए प्रशिक्षित, अनुशासित और आपदा के समय उपयोगी भी बने।
आज उनके नेतृत्व में संस्थान 21,000 से अधिक युवाओं, छात्रों और नागरिकों को पर्वतारोहण, रॉक एवं स्पोर्ट्स क्लाइम्बिंग, उच्च हिमालयी ट्रेकिंग और आउटडोर नेतृत्व का प्रशिक्षण दे चुका है।
चमोली ने देश में स्पोर्ट्स क्लाइम्बिंग को संगठित स्वरूप देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1997 से भारतीय पर्वतारोहण फाउंडेशन (IMF) की राष्ट्रीय स्पोर्ट्स क्लाइम्बिंग समिति के संस्थापक अध्यक्ष के रूप में उन्होंने इस खेल को देशभर में आगे बढ़ाने का काम किया।
1,420 बचावकर्मी तैयार- कीर्तिमानों से आगे है यह विरासत
एसपी चमोली की सबसे बड़ी विरासत शायद पर्वतों पर दर्ज रिकॉर्ड से भी आगे दिखाई देती है।
उनके नेतृत्व में हिमालयन एडवेंचर इंस्टीट्यूट ने उत्तराखंड पुलिस, एनडीआरएफ, होम गार्ड, अग्निशमन सेवा और जिला प्रशासन के 1,420 से अधिक खोज एवं बचाव कर्मियों को पर्वतीय बचाव और आपदा प्रबंधन का प्रशिक्षण दिया है।
इनमें से अनेक प्रशिक्षित कर्मियों ने बाद में बाढ़, भूस्खलन और दूसरी प्राकृतिक आपदाओं के दौरान लोगों की जान बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इस तरह एक पर्वतारोही के दशकों के अनुभव ने हजारों लोगों तक पहुंचकर एक ऐसी श्रृंखला तैयार की, जिसका प्रभाव किसी एक अभियान या रिकॉर्ड से कहीं बड़ा है।
दुनिया ने पढ़े चमोली के हिमालयी अनुभव
चमोली ने अपने अनुभव केवल प्रशिक्षण मैदान तक सीमित नहीं रखे।
वे रॉयल जियोग्राफिकल सोसाइटी (FRGS) के फेलो हैं। The Great Himalayan Traverse और Rafting Down the Mystic Brahmaputra जैसी पुस्तकों में उन्होंने अपने असाधारण अभियानों को शब्दों में दर्ज किया।
उनके अभियानों और लेखों को American Alpine Journal, Himalayan Journal समेत अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रकाशनों में स्थान मिला।
84 की उम्र में भी नहीं उतरा ‘एडवेंचर गियर’
आमतौर पर ‘लाइफटाइम अचीवमेंट’ शब्द सुनते ही एक पूरी हो चुकी यात्रा का अहसास होता है।
एसपी चमोली के मामले में ऐसा नहीं है।
84 वर्ष की उम्र में भी वे हिमालयन एडवेंचर इंस्टीट्यूट में सक्रिय हैं। नई पीढ़ी को तैयार कर रहे हैं। साहसिक कर्मियों को अपने दशकों के अनुभव से परिचित करा रहे हैं और आपदा प्रतिक्रिया से जुड़े लोगों के प्रशिक्षण में योगदान दे रहे हैं।
इसलिए टेंज़िंग नोर्गे राष्ट्रीय साहसिक पुरस्कार की ‘जीवनपर्यंत उपलब्धि’ श्रेणी में उनका चयन केवल बीते छह दशकों के रिकॉर्ड का सम्मान नहीं है।
यह उस भारतीय साहसिक परंपरा का सम्मान है जिसमें हिमालय को जीतने से अधिक महत्वपूर्ण है—हिमालय से सीखना और वह सीख अगली पीढ़ी को सौंपना।
नीलकंठ से सासेर कांगड़ी तक, कंचनजंगा से काराकोरम तक और श्योक से ब्रह्मपुत्र तक एसपी चमोली ने साहस की अपनी लकीर खींची है।
आज 84 वर्ष की उम्र में भी उनका अभियान खत्म नहीं हुआ है।
पहले वे खुद चोटियों पर पहुंचे। अब वे ऐसी पीढ़ियां तैयार कर रहे हैं, जो उनसे भी ऊंची चोटियों तक पहुंच सकें।
