कचरे और सीवर में दम तोड़ती रिस्पना, ‘टेम्स’ बनाने का सपना आठ साल बाद भी अधूरा!

Rispana River

 

कभी देहरादून की जीवनरेखा थी रिस्पना, अब कई हिस्सों में नाले जैसी हालत; सीवर, कचरा और अतिक्रमण बड़ी चुनौती, पुनर्जीवन के लिए फिर बनी टास्क फोर्स

  • प्रेम पंचोली, वरिष्ठ पत्रकार

देहरादून। कभी देहरादून की जीवनरेखा कही जाने वाली रिस्पना आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। मसूरी की पहाड़ियों के जलागम क्षेत्र से निकलने वाली इस नदी का साफ पानी शहर में प्रवेश करते-करते कई स्थानों पर सीवर और गंदे नालों के प्रवाह में बदलता दिखाई देता है। नदी में कूड़ा, अनुपचारित गंदा पानी और लगातार बढ़ता मानवीय दबाव इसके प्राकृतिक स्वरूप को खत्म कर रहा है।

करीब आठ वर्ष पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने रिस्पना को पुनर्जीवित कर ‘ऋषिपर्णा’ बनाने का महत्वाकांक्षी अभियान शुरू किया था। लंदन की टेम्स नदी के पुनर्जीवन का उदाहरण देते हुए उन्होंने जनभागीदारी के जरिए रिस्पना को फिर से जीवित करने का संकल्प जताया था। वर्ष 2018 में बड़े पैमाने पर पौधरोपण अभियान भी चलाया गया। लेकिन आज नदी की स्थिति इस अभियान की सफलता और उसके बाद हुए प्रयासों पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

दीपनगर में नदी की जगह बह रहा गंदा पानी

दीपनगर रेलवे फाटक के आसपास रिस्पना की मौजूदा तस्वीर इसकी बदहाली की कहानी खुद कहती है। यहां नदी कई स्थानों पर किसी बड़े नाले जैसी नजर आती है। दूषित पानी, किनारों पर जमा कूड़ा और सिकुड़ता प्राकृतिक जलप्रवाह बताते हैं कि नदी अपने पुराने स्वरूप से कितनी दूर जा चुकी है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि बरसात के दिनों को छोड़ दिया जाए तो नदी के कई हिस्सों में दिखाई देने वाले प्रवाह में नालों और सीवर से आने वाले दूषित पानी की बड़ी हिस्सेदारी है। शहर के विस्तार के साथ रिस्पना के आसपास बस्तियां और कॉलोनियां बढ़ीं, लेकिन सीवेज और ठोस कचरे के प्रबंधन की चुनौती भी उसी अनुपात में बढ़ती गई।

नदी में घरेलू सीवर के साथ डेयरी और अन्य अपशिष्ट गिराए जाने का मुद्दा अब राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) तक पहुंच चुका है। जुलाई 2026 में एनजीटी ने रिस्पना के सक्रिय बाढ़ क्षेत्र में चिह्नित अतिक्रमणों की स्थिति को लेकर उत्तराखंड सरकार से जवाब मांगा। मामला नदी में अनुपचारित घरेलू सीवर, डेयरी अपशिष्ट और औद्योगिक प्रवाह छोड़े जाने संबंधी शिकायतों से भी जुड़ा है।

Rispana River
सभी फोटो प्रेम पंचोली
कभी बारहमासी स्वरूप के संकेत, आज प्रदूषित धारा

रिस्पना की मौजूदा स्थिति हमेशा ऐसी नहीं थी। राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान से जुड़े विशेषज्ञों के 2021 में प्रकाशित अध्ययन में ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर कहा गया कि 19वीं सदी के मध्य में रिस्पना के बारहमासी होने के संकेत मिलते हैं। अध्ययन में यह भी दर्ज किया गया कि वर्तमान में इसका बारहमासी प्रवाह शिखर फॉल तक सीमित रह गया है।

वैज्ञानिकों ने नदी के पुनर्जीवन के लिए केवल सफाई या पौधरोपण के बजाय जलागम क्षेत्र में भूजल पुनर्भरण बढ़ाने पर जोर दिया। रूफटॉप रेन वाटर हार्वेस्टिंग और जलागम क्षेत्र में वैज्ञानिक ढंग से ट्रेंच निर्माण जैसे उपायों को प्रभावी विकल्पों में शामिल किया गया।

यानी रिस्पना का संकट केवल दिखाई देने वाले कूड़े तक सीमित नहीं है। नदी के प्राकृतिक जलप्रवाह और जलागम क्षेत्र को बचाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

2018 में ढाई लाख पौधे, टेम्स का दिया गया था उदाहरण

रिस्पना की बदहाली कोई नया मुद्दा नहीं है। वर्ष 2017 में तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने नदी के पुनर्जीवन की पहल शुरू की थी। इसके बाद 2018 में ‘रिस्पना से ऋषिपर्णा’ अभियान ने बड़े जनअभियान का रूप लिया।

जुलाई 2018 में सरकार, सामाजिक संगठनों, विद्यार्थियों और सुरक्षा बलों की भागीदारी से रिस्पना के किनारे करीब ढाई लाख पौधे लगाए गए थे।

अभियान के दौरान त्रिवेंद्र सिंह रावत ने लंदन की टेम्स का उदाहरण देते हुए कहा था कि जब वहां के लोग जनभागीदारी से अपनी नदी को साफ कर सकते हैं तो देहरादून के लोग भी रिस्पना को पुनर्जीवित कर सकते हैं। उनका संदेश साफ था—राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ जनता की भागीदारी भी जरूरी है।

इसके बावजूद आठ साल बाद सवाल कायम है—इतने बड़े अभियान और लाखों पौधे लगाए जाने के बाद रिस्पना की हालत में स्थायी बदलाव क्यों नहीं दिखाई दिया?

अब धामी सरकार के सामने रिस्पना की दोहरी चुनौती

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली सरकार के सामने रिस्पना को लेकर अब दोहरी चुनौती है। एक तरफ नदी के प्रदूषण, सीवर, अतिक्रमण और प्राकृतिक प्रवाह का सवाल है, तो दूसरी तरफ इसी नदी के ऊपर प्रस्तावित बड़ी एलिवेटेड रोड परियोजना को आगे बढ़ाया जा रहा है।

मुख्यमंत्री धामी ने फरवरी 2025 में अधिकारियों को रिस्पना-बिंदाल कॉरिडोर पर जल्द काम शुरू करने के निर्देश दिए थे। प्रस्ताव के अनुसार रिस्पना पर करीब 11 किलोमीटर और बिंदाल पर करीब 13 किलोमीटर लंबा चार लेन एलिवेटेड कॉरिडोर प्रस्तावित किया गया।

इसके बाद परियोजना की लागत करीब 6,200 करोड़ रुपये बताई गई। रिस्पना वाले हिस्से की लंबाई करीब 10.946 किलोमीटर और अनुमानित लागत 2,509 करोड़ रुपये बताई गई है।

ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि नदी के ऊपर आधुनिक यातायात ढांचा खड़ा करने के साथ-साथ नीचे बहने वाली रिस्पना के पर्यावरणीय पुनर्जीवन की योजना किस रूप में जमीन पर उतरेगी।

2026 में फिर बनी टास्क फोर्स, सात दिन में मांगा गया एक्शन प्लान

रिस्पना की स्थिति को लेकर प्रशासन ने 2026 में फिर सक्रियता दिखाई है। जून में देहरादून के जिलाधिकारी आशीष चौहान ने नदी के पुनर्जीवन के लिए विशेष टास्क फोर्स गठित कर संबंधित विभागों से विस्तृत कार्ययोजना मांगी।

नगर निगम को नदी में गिरने वाले नालों और कूड़ा डंपिंग वाले स्थानों की पहचान करने को कहा गया। इसके साथ ड्रोन सर्वे, नदी की अलग-अलग हिस्सों में मैपिंग, कचरे की स्थिति और सफाई व्यवस्था का आकलन करने के निर्देश दिए गए।

यह कदम बताता है कि वर्षों के अभियानों के बावजूद रिस्पना में गिरने वाले नालों और कूड़े के स्रोतों की पहचान तथा उनके स्थायी समाधान की जरूरत आज भी बनी हुई है।

एनजीटी तक पहुंचा अतिक्रमण और सीवर का मामला

रिस्पना के सामने अतिक्रमण भी बड़ी चुनौती बन चुका है। जुलाई 2026 में एनजीटी ने उत्तराखंड सरकार से नदी के सक्रिय बाढ़ क्षेत्र में चिह्नित 324 संरचनाओं की स्थिति पर जवाब मांगा।

मामले में नदी के सूखे तल पर अनधिकृत निर्माण के साथ अनुपचारित घरेलू सीवर, डेयरी अपशिष्ट और औद्योगिक प्रवाह नदी में छोड़े जाने की शिकायतें भी उठाई गई हैं। एनजीटी की कार्रवाई ने रिस्पना की समस्या को केवल स्थानीय सफाई अभियान से आगे बढ़ाकर पर्यावरणीय जवाबदेही के दायरे में ला दिया है।

सिर्फ सौंदर्यीकरण नहीं, नदी में पानी लौटाना होगा

विशेषज्ञ अध्ययनों और नदी की मौजूदा स्थिति को साथ रखकर देखें तो रिस्पना का पुनर्जीवन केवल किनारों की सफाई, पौधरोपण या सौंदर्यीकरण से संभव नहीं दिखाई देता। नदी में गिरने वाले अनुपचारित सीवर को रोकना, ठोस कचरे का वैज्ञानिक निस्तारण, बाढ़ क्षेत्र को अतिक्रमण से बचाना और जलागम क्षेत्र में भूजल पुनर्भरण बढ़ाना जरूरी है।

इसके साथ यह सुनिश्चित करना भी महत्वपूर्ण होगा कि प्रस्तावित निर्माण और विकास परियोजनाएं नदी के प्राकृतिक जलप्रवाह तथा बाढ़ क्षेत्र की पारिस्थितिकी को प्रभावित न करें।

स्थानीय लोगों का कहना है कि सरकार के पास संसाधनों की कमी नहीं है। जरूरत विभिन्न विभागों के बीच समन्वय और दीर्घकालिक राजनीतिक इच्छाशक्ति की है। नदी में गिरने वाले हर बड़े नाले की पहचान कर उसके सीवर को उपचार संयंत्र तक पहुंचाया जाए, कूड़ा फेंकने पर सख्त कार्रवाई हो और नदी के प्राकृतिक स्रोतों को पुनर्जीवित किया जाए तो तस्वीर बदल सकती है।

टेम्स का सपना अब भी सवाल बनकर खड़ा

जिस टेम्स नदी का उदाहरण देकर 2018 में रिस्पना के पुनर्जीवन का सपना दिखाया गया था, वह सपना आज भी अधूरा है। अंतर इतना है कि अब रिस्पना के पुनर्जीवन के साथ हजारों करोड़ रुपये की एलिवेटेड रोड परियोजना भी जुड़ चुकी है।

ऐसे में धामी सरकार के सामने अवसर भी है और चुनौती भी—क्या रिस्पना के ऊपर आधुनिक सड़क बनाने के साथ नीचे बहती नदी को भी उसका जीवन वापस दिया जा सकेगा?

रिस्पना का सवाल अब केवल एक नदी की सफाई का नहीं है। यह देहरादून के अनियोजित शहरीकरण, सीवेज प्रबंधन, अतिक्रमण, भूजल, बाढ़ सुरक्षा और पर्यावरणीय भविष्य से जुड़ा सवाल बन चुका है।

आठ साल पहले नारा था—‘रिस्पना से ऋषिपर्णा’। अब देहरादून इंतजार कर रहा है कि यह संकल्प अभियानों और फाइलों से निकलकर नदी के बहते पानी में कब दिखाई देगा।

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