
ऐतिहासिक परंपरा के साक्षी बने लाखों श्रद्धालु, मुख्यमंत्री धामी ने की कई विकास घोषणाएं
- हिमांतर ब्यूरो, चम्पावत
विश्व प्रसिद्ध शक्तिपीठ माँ वाराही धाम, देवीधुरा में शुक्रवार को ऐतिहासिक बग्वाल मेले का भव्य आयोजन हुआ। रक्षाबंधन के अवसर पर आयोजित इस अनूठे मेले में आस्था, लोक परंपरा और उत्साह का अद्भुत संगम देखने को मिला। फलों और फूलों की बरसात के बीच चार खाम-सात थोक के बग्वालियों ने सदियों पुरानी परंपरा को जीवंत किया। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी मेले में पहुंचकर माँ वाराही के दर्शन किए और बग्वाल का अवलोकन किया।
मुख्यमंत्री हेलीकॉप्टर से देवीधुरा पहुंचे, जहां जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों ने उनका स्वागत किया। पारंपरिक छोलिया नृत्य के साथ उनका अभिनंदन किया गया। इसके बाद उन्होंने माँ वाराही देवी की पूजा-अर्चना कर प्रदेश की सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना की।
मुख्यमंत्री ने देवीधुरा की बग्वाल को उत्तराखंड की समृद्ध लोक-संस्कृति, आस्था और सामुदायिक एकता का जीवंत प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार आधुनिक विकास के साथ-साथ धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण को भी समान प्राथमिकता दे रही है।

उन्होंने बताया कि ‘मानसखंड मंदिर माला मिशन’ के तहत कुमाऊँ के प्रमुख धार्मिक स्थलों का विकास किया जा रहा है। देवीधुरा मंदिर परिसर में 4.27 करोड़ रुपये की लागत से गढ़वाल खाम भवन और 4.57 करोड़ रुपये की लागत से रणकोची मंदिर के पुनर्निर्माण का कार्य चल रहा है। घटोत्कच मंदिर, घटकु हिडिंबा मंदिर, सप्तेश्वर महादेव मंदिर और लधौनधुरा मेला स्थल से जुड़े कई विकास कार्य भी पूरे किए जा चुके हैं।
मुख्यमंत्री ने बताया कि घटोत्कच से झालिमाली मंदिर मार्ग के डामरीकरण पर 1.95 करोड़ रुपये, विभिन्न मंदिरों के सौंदर्यीकरण पर 4.70 करोड़ रुपये और पूर्णागिरि मार्ग पर पांच करोड़ रुपये की स्ट्रीट लाइट परियोजना पर कार्य किया जा रहा है। पिछले पांच वर्षों में धार्मिक अवस्थापना और सौंदर्यीकरण के तहत 68.58 करोड़ रुपये की लागत से 397 कार्य किए गए हैं।
मुख्यमंत्री ने देवीधुरा को नगर पंचायत क्षेत्र बनाने की बात कही और 9.80 करोड़ रुपये की लागत से मल्टीलेवल पार्किंग के निर्माण की घोषणा की। उन्होंने कहा कि बग्वाल मेले को ‘राजकीय मेला’ घोषित करने से इसकी गरिमा और व्यवस्थाओं, दोनों को मजबूती मिली है।
उन्होंने धार्मिक पर्यटन को स्थानीय अर्थव्यवस्था, रोजगार और स्वरोजगार से जोड़ने पर जोर देते हुए युवाओं से लोक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण में सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया। उन्होंने ‘विकास भी और विरासत भी’ का संकल्प दोहराया।
आठ मिनट तक चला बग्वाल का रोमांच
माँ वाराही धाम में प्रधान पुजारी की पूजा-अर्चना के बाद चारों खाम—वालिक, चम्याल, गहड़वाल और लमगड़िया—के बग्वालियों ने पारंपरिक वेशभूषा में मैदान में प्रवेश किया। उनके हाथों में बांस और रिंगाल से बनी ढालें थीं। शंखनाद और माँ वाराही के जयकारों के बीच बग्वाल शुरू हुई।
इस वर्ष बग्वाल दोपहर 1:48 बजे शुरू होकर 1:55 बजे समाप्त हुई। करीब आठ मिनट तक मैदान में फल और फूल बरसते रहे। इस दौरान पूरा क्षेत्र माँ वाराही के जयकारों से गूंजता रहा। पीठाचार्य कीर्तिबल्लभ जोशी के अनुसार, फल-फूलों से खेली जाने वाली बग्वाल शुभ और फलदायी मानी जाती है। खामों के आगमन और बग्वाल के संचालन की जिम्मेदारी भी उन्होंने निभाई।

मुख्यमंत्री ने कहा कि देवीधुरा की यह परंपरा अनुशासन, आस्था और भाईचारे की अनूठी मिसाल है। बग्वाल समाप्त होने के बाद सभी योद्धाओं का एक-दूसरे से गले मिलना इस परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता है।रक्षाबंधन के अवसर पर बच्चियों और महिलाओं ने मुख्यमंत्री को राखी भी बांधी।
मेले में कैबिनेट मंत्री राम सिंह कैड़ा, केंद्रीय राज्यमंत्री एवं सांसद अजय टम्टा, जिला पंचायत अध्यक्ष आनंद सिंह अधिकारी, माँ वाराही मंदिर समिति अध्यक्ष हीराबल्लभ जोशी, भाजपा जिलाध्यक्ष गोविन्द सामन्त सहित बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधि, अधिकारी और श्रद्धालु मौजूद रहे।
