कंडियाल गांव में आज भी जीवित है शेर-भालू का पौराणिक नृत्य

 

मुखौटे पहनकर जीवंत होती लोककथा

ढोलदमाऊ की थाप पर पीढ़ियों से निभाई जा रही अनूठी परंपरा, लोकसंस्कृति को सहेज रहे ग्रामीण

  • नीरज उत्तराखंडी, पुरोला/उत्तरकाशी

रवांई घाटी की समृद्ध लोकसंस्कृति आज भी अनेक प्राचीन परंपराओं के माध्यम से जीवंत दिखाई देती है. विकासखंड पुरोला के कंडियाल गांव में आज भी मुखौटे पहनकर शेर और भालू का पौराणिक लोकनृत्य प्रस्तुत किया जाता है. यह अनूठा नृत्य गांव की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है और पीढ़ियों से चली आ रही इस परंपरा को ग्रामीण आज भी पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ निभा रहे हैं.

गांव में विशेष अवसरों, पारंपरिक उत्सवों और सामुदायिक आयोजनों के दौरान युवक शेर और भालू के रूप में सजे विशेष मुखौटे पहनकर नृत्य करते हैं. ढोल-दमाऊ और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की थाप पर होने वाला यह नृत्य पूरे वातावरण को उत्साह और रोमांच से भर देता है.

नृत्य के दौरान कलाकार शेर और भालू की चाल-ढाल, हाव-भाव और स्वभाव की बारीक नकल करते हैं. कभी दोनों के बीच खेल और छेड़छाड़ का दृश्य प्रस्तुत किया जाता है तो कभी प्रतीकात्मक रूप से संघर्ष का दृश्य दिखाया जाता है. इस दौरान ग्रामीण लोकगीत गाते हैं और बच्चे-बुजुर्ग बड़ी उत्सुकता के साथ इस लोकनृत्य का आनंद लेते हैं.

स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार यह परंपरा प्रकृति और वन्यजीवन के प्रति सम्मान की भावना से भी जुड़ी हुई है. पहाड़ी समाज में जंगल और वन्यजीवों के साथ सहअस्तित्व की संस्कृति रही है, जिसे इस तरह के लोकनृत्य प्रतीकात्मक रूप से अभिव्यक्त करते हैं.

आज जब आधुनिकता के प्रभाव से कई लोकपरंपराएं विलुप्त होने के कगार पर हैं, ऐसे में कंडियाल गांव के लोग इस सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं. नई पीढ़ी भी इस परंपरा में बढ़-चढ़कर भाग लेकर अपनी संस्कृति को आगे बढ़ा रही है.

परंपरा की खास बातें

  • शेर और भालू के विशेष मुखौटे पहनकर किया जाता है नृत्य
  • ढोल-दमाऊ और लोकवाद्यों की थाप पर प्रस्तुति
  • पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक परंपरा
  • वन्यजीवन और प्रकृति के प्रति सम्मान का प्रतीक

लोकसंस्कृति की जीवंत मिसाल

कंडियाल गांव का यह पौराणिक नृत्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि क्षेत्र की लोकआस्था, सामुदायिक एकता और सांस्कृतिक पहचान का भी प्रतीक है. ग्रामीणों का मानना है कि इस तरह की परंपराओं को जीवित रखना आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ने का सबसे सशक्त माध्यम है.

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