फाल्गुनी प्रीत का रंगोत्सव: भील संस्कृति का जीवंत पर्व ‘भगोरिया’

Bhagoria Festival

 

भगोरिया पर्व 2026: भील जनजाति का अनोखा प्रेम उत्सव, जानें इतिहास, परंपरा और सांस्कृतिक महत्व

Manju kala

मंजू काला, देहरादून

जब हवाएँ गर्मी के तेवर दिखाने लगती हैं, जब उनमें मादक खुशबू तैरने लगती है, गीतों में उन्माद भरने लगता है, पत्थर तोड़ने वाले हाथों की उँगलियों पर मेहँदी की लाली सजने लगती है, ताड़ी और महुआ में रस भरने लगता है, टेसू के फूल खिल उठते हैं और वसंत यौवन की सीमा पर पहुँच जाता है, तो समझ लीजिए कि भगोरिया का आगमन हो रहा है। यह भील समुदाय का अपना विशेष त्योहार है, जिसे हम फाल्गुन मास की प्रीत या भगोरिया के नाम से जानते हैं। यह ऐसा पर्व है जो हर युग की नई चमक को अपनी प्राचीन तहजीब और संस्कृति से जोड़ता है। यह न केवल मनुष्य का उत्सव है, बल्कि प्रकृति भी अपने संकेतों, फूलों, हवाओं और रंगों के साथ इसमें शामिल हो जाती है।

भगोरिया उन लोगों का त्योहार है जिनकी हड्डियाँ रोज़ाना कठिन श्रम से मजबूत होती हैं, जिनके हृदय में कोमल भावनाओं की धारा बहती है, मगर जीवन की कठोरता ने उनके चारों ओर एक मजबूत कवच बना दिया है। इसे नारियल से समझने की कोशिश न करें, क्योंकि नारियल में कोमलता और कठोरता के बीच मोटी स्वाद की परत होती है। बल्कि इसे भूमिगत जल की उस पतली, अदृश्य धारा से समझिए जो सैकड़ों फुट मोटी मिट्टी और चट्टानों के नीचे बहती रहती है। भगोरिया इसी कोमल धारा को धरती चीरकर छू लेता है, उसे बाहर लाता है और जीवन को नया अर्थ देता है।

सभी फोटो : मध्यप्रदेश आदिवासी विकास परिषद की फेसबुक वॉल से साभार

इस उत्सव में प्रेम पाने की खुशी किसी बड़ी मुराद पूरी होने या दैवीय प्रसाद प्राप्त करने से कम नहीं होती। भगोरिया में मिला प्रेम ठीक वैसे ही पवित्र और अमूल्य होता है जैसे भूमिगत जल को गंगा माँ का प्रसाद मानकर लोग घर-आँगन में स्थापित कर लेते हैं। यह ढीठपन या छेड़छाड़ का प्रतीक नहीं है। यहाँ प्रेम या तो मन्नत से मिलता है या पुरुषार्थ, साहस और समर्पण से प्राप्त किया जाता है। हजारों लोगों की भीड़ में अपनी पसंद पर हाथ रख देना अपने आप पर, अपनी भावनाओं पर और अपने पुरुषार्थ पर अटूट विश्वास के बिना संभव नहीं होता।

भगोरिया महज एक मौका नहीं है जहाँ लोग लूट-खसोट करें या क्षणिक सुख लूट लें। यह एक नए जीवन की शुरुआत है, जिसकी नींव प्रेम की उस बूँद पर टिकी होती है जो सदियों से बहती आ रही है। बिना किसी आधुनिक सुविधा की चाह के पूरी जिंदगी अभावों को गले लगाकर जी लेना, दुख-तकलीफ़ को ठुकराकर एक पल के आनंद में सारी जिंदगी समेट लेना—यही भगोरिया का सार है। इस उत्सव में इतनी जीवंतता होती है कि सूरज कब ढल जाता है, पता ही नहीं चलता। लोकगीत ऐसे होते हैं कि शब्दों का अर्थ समझ न आए, फिर भी कान उनसे चिपके रहते हैं। चेहरों पर भाव इतने जीवंत कि कैमरा उन्हें पकड़ पाने में नाकाम रहता है। सज-धज इतनी स्वाभाविक कि प्राकृतिक सौंदर्य को अलग से तलाशने की ज़रूरत नहीं पड़ती। जब कोई विशेष व्यक्ति सामने आता है तो आँखों में चमक जाग उठती है। यह चमक लज्जाहीन नहीं होती, बल्कि इसमें इतना साहस होता है कि वह समाज की अर्थपूर्ण नज़रों का डटकर मुकाबला करती है। इस एक सप्ताह के आयोजन में पूरी जिंदगी के रिश्ते, शर्तें और वादे तय हो जाते हैं। हर रोज़ नए भगोरिया में वही इंतज़ार रहता है, वही उत्सुकता। दिन उस व्यक्ति को देखने में और रातें नाच-गाने में बीत जाती हैं। होली से ठीक एक सप्ताह पहले शुरू होने वाला यह उत्सव भीली संस्कृति की पहचान है। इसे दो भागों में बाँटा जा सकता है—भगोरिया मेला और भगोरिया त्योहार। मेला प्रेम प्राप्ति का प्रयास है, जबकि त्योहार आध्यात्मिकता और वैराग्य में रमने का। दोनों साथ-साथ शुरू होते हैं। त्योहार उसी महीने समाप्त हो जाता है, लेकिन मेला जिसने अपनाया, वह जन्म-जन्म तक बंधा रहता है।

त्योहार मुख्य रूप से प्रौढ़ पुरुषों का होता है, जिसमें महिलाओं की प्रत्यक्ष भागीदारी नहीं होती। वे अपने शरीर पर हल्दी का लेप करते हैं, ऊपरी शरीर खुला रखते हैं, सिर पर साफा बाँधते हैं, हाथ में नारियल और काँच रखते हैं। एक समय भोजन करते हैं, वह भी हाथ से बनाकर। जीवनसाथी से दूर रहकर साधना पूरी करते हैं। होली के बाद गल देवता की पूजा करते हैं, मन्नतें उतारते हैं। मन्नतधारी को गल देवता पर चढ़ाकर हवा में घुमाया जाता है। मन्नतें अजीबोगरीब होती हैं—अच्छी बारिश, अच्छी फसल, बीमारी से मुक्ति, कर्ज़ से छुटकारा आदि। इस दौरान शराब-मांस का त्याग होता है। मन्नतधारी ज़मीन पर सोता है। मेले की तैयारी एक सप्ताह पहले से शुरू हो जाती है। सुगंधित साबुन, पाउडर, नए कपड़े खरीदे जाते हैं। फिर निगाहें किसी खास को ढूँढती हैं। यह प्रेम आधुनिक परिभाषा से परे है। इसमें वादे, धन या सौंदर्य का बोलबाला नहीं। यह पत्थर पर उग आए गुलाब की तरह होता है—कठिन परिस्थितियों में भी खिलता है और दिलों पर लंबे समय तक निशान छोड़ता है।

लोकगीतों की धुन, बाँसुरियों की तान पर थिरकती टोलियाँ जब पारंपरिक वेशभूषा में मेले में आती हैं तो मन होली की मस्ती से झूम उठता है। भगोरिया प्रकृति के आनंद का प्रतीक है, जो अभावों और मायूसी पर विजय का घोषणा करता है। बाहरी दुनिया इसे फैशन परेड या शारीरिक प्रदर्शन समझ लेती है, लेकिन यह इंतज़ार की चरम सीमा पर प्राप्त वह क्षण है जो जिंदगी से भी बड़ा होता है। इसे समझने के लिए दुनियादारी छोड़कर आदि मानव की तरह प्रकृति के करीब जाना पड़ता है। जब दो अलग हाथ एक ही फूल को छूते हैं, तभी भगोरिया का मर्म खुलता है। इसे ज्ञान या पंडिताई से नहीं, दीवानगी और दिल की सुनकर देखा जाता है। झाबुआ, धार, खरगोन के आदिवासी मुस्कुराते टेसू, गुनगुनाते गीत, बजती बाँसुरी और थिरकते कदमों से कहते हैं—अपने सारे गम हमें सौंप दो! फागुन का महीना रंगों, वासंती अठखेलियों और उमंगों का है। मध्य प्रदेश की धार नगरी पार करते ही झाबुआ की वादियों में मन रम जाता है। भूरी पहाड़ियों के बीच महुआ, करंजी और आम के पेड़ अठखेलियाँ करते दिखते हैं। हवा वसंत की खुशबू लाती है। आमों पर बौर आ चुके होते हैं, टेसू और पलाश के लाल-केसरिया फूल जंगल को होली खेलने के लिए तैयार कर देते हैं। मानो किसी ने जंगल पर ढेर सारा गुलाल बिखेर दिया हो। दिशाओं में फैली अनुगूँज, मधुर तान, लय-ताल पर जीवन आनंद मनाता है। सुरमई इच्छाएँ थिरकती हैं, उमंगें समय को गवाह बनाती हैं। यह भीलों की रंग-रूपहली दुनिया है, जो सदियों से अपनी धरोहर पर गर्व करती है। भगोरिया एक आदिम यात्रा का निमंत्रण है।

यह सिलसिला भगोरिया हाट से शुरू होता है। फागुन पूर्णिमा से सात दिन पहले हाट भरने लगते हैं और धुरेड़ी पर चरम पर पहुँचते हैं। भील युवक-युवतियाँ बाँसुरी बजाते, सज-धजकर आते हैं। लड़कियाँ सहेलियों के साथ, लड़के मित्रों के साथ। पूरा गाँव—बूढ़े, बच्चे, स्त्री-पुरुष—मेले में शामिल होते हैं। भगोरिया हाट में जीवनसाथी चुना जाता है। कोई युवक यदि किसी युवती पर रीझता है तो उसके गाल पर गुलाल मल देता है। यदि जवाब में गुलाल मिले तो बात बन जाती है, अन्यथा नहीं। यह खोज पूरे दिन चलती है। शाम ढलते ही सब अगले हाट का वादा लेकर लौटते हैं। भील युवक कान में मूँदड़े-टोटवा, गले में बनजारी साँकल, हाथों में चाँदी के कड़े, सिर पर लंबा साफा बाँधते हैं। रंग-बिरंगे अंगरखे, धोती पहनते हैं। टोलियाँ बनाकर बाँसुरी बजाते आते हैं। दूर से धुन सुनते ही युवतियाँ मेला देखने निकल पड़ती हैं।

भीलों का जीवन विंध्याचल, सतपुड़ा और सह्याद्रि के जंगलों से जुड़ा है। झाबुआ, धार, रतलाम, खरगोन में भिलाला, पटेलिया, बरेला जैसी उपजातियाँ बसी हैं। गुजराती, राजस्थानी, मराठी प्रभाव दिखता है, मगर तीर-कमान से वे एकलव्य के वंशज माने जाते हैं। कुछ कथाओं में शिव से संबंध जोड़ते हैं। भगौर गाँव प्राचीन राजधानी था, जहाँ भृगु ऋषि का प्रभाव माना जाता है। भगोरिया नृत्य से पहले थान पर होम-पूजा होती है। फिर मादल, थालियाँ, शहनाई, बाँसुरी बजती हैं। भीलनियाँ गोपियों की तरह नाचती हैं—पाँव आगे-पीछे, कुण्डल हिलते हुए। ताल ५-६ मात्राओं की होती है, उमंग के साथ तेज़ होती जाती है। यह आनंद का उमड़ता आवेग है। भगोरिया नृत्य प्रकृति की कृपा, फसल, इंद्र की मेहर, पूर्वजों का आशीर्वाद और परिश्रम का फल है। यह सपनों का इंद्रधनुष धरती पर उतरता है। आस्थाएँ झुकती हैं, अनुष्ठान रूह में उतरते हैं। सारा कल्मष, कटुता प्रेम में बदल जाती है। जीवन उत्सव बन जाता है।

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