
नवदुर्गा विशेष श्रृंखला – 1
ऋचा डोभाल बंधानी की कहानी: पहाड़ के पारंपरिक स्वादों को पहचान और महिलाओं को आत्मनिर्भरता की राह दिखाने की पहल

पहाड़ केवल प्राकृतिक सौंदर्य, ऊँचे पर्वतों और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के लिए ही नहीं जाने जाते, बल्कि यहाँ की मिट्टी में आत्मनिर्भरता, संघर्ष और संभावनाओं की अनगिनत कहानियाँ भी रची-बसी हैं। इन्हीं संभावनाओं को पहचानकर उन्हें आजीविका का आधार बनाने में जुटी हैं उत्तरकाशी के नौगाँव की बहू ऋचा डोभाल बंधानी।
‘आत्मनिर्भर भारत, आत्मनिर्भर पहाड़, आत्मनिर्भर युवा’ की सोच को साकार करने के उद्देश्य से ऋचा पहाड़ के पारंपरिक उत्पादों को हर घर की रसोई तक पहुँचाने का प्रयास कर रही हैं। उनकी यह पहल केवल स्थानीय उत्पादों को बाजार उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है, बल्कि उन ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने का माध्यम भी बन रही है, जो वर्षों से खेती-किसानी में श्रम तो करती रही हैं, लेकिन अपनी मेहनत से होने वाली आय पर उनका स्वतंत्र अधिकार हमेशा नहीं रहा।
पहाड़ के गाँवों में बीता बचपन
ऋचा का जन्म पौड़ी जनपद के कल्जीखाल विकासखंड स्थित मलाऊँ गाँव निवासी श्री विजय डोभाल और श्रीमती लक्ष्मी डोभाल के परिवार में हुआ। दो भाई-बहनों में ऋचा बड़ी हैं और उनका एक छोटा भाई है। उनके माता-पिता दोनों अध्यापन कार्य से जुड़े रहे। नौकरी के सिलसिले में उनकी तैनाती अलग-अलग स्थानों पर होती रही, जिसके कारण परिवार को एक गाँव से दूसरे गाँव जाना पड़ता था। इस तरह ऋचा का बचपन पहाड़ के विभिन्न गाँवों में बीता। दसवीं तक की शिक्षा भी उन्होंने पहाड़ में ही प्राप्त की। बचपन के इन अनुभवों ने उन्हें पहाड़ी जीवन, यहाँ की सामाजिक परिस्थितियों, कठिनाइयों और लोगों के संघर्षों को करीब से समझने का अवसर दिया।
आगे की पढ़ाई के लिए उन्हें शहर का रुख करना पड़ा। दरअसल, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाओं के अभाव में पहाड़ के युवाओं को आज भी अक्सर शहरों की ओर पलायन करना पड़ता है। उत्तराखंड के प्रसिद्ध लोकगायक और गीतकार नरेंद्र सिंह नेगी के गीत की पंक्तियाँ इस स्थिति को बड़ी सहजता से व्यक्त करती हैं— ‘सब्बि धाणी देरादूण होणी खाणी देरादूण।’
यह केवल एक गीत की पंक्ति नहीं, बल्कि पहाड़ से शहरों की ओर बढ़ते पलायन की पीड़ा को भी अभिव्यक्त करती है।

शहर से पहाड़ लौटने तक का सफर
स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद ऋचा ने पत्रकारिता में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। दिल्ली में पढ़ाई और नौकरी करने के साथ-साथ उन्होंने देहरादून के समाचारपत्रों और पत्रिकाओं में भी काम किया। लेकिन इस दौरान उनके मन में एक सवाल लगातार उठता रहा—अपने समुदाय के लिए क्या किया जा सकता है? पहाड़ के लोगों को स्थानीय स्तर पर आजीविका से कैसे जोड़ा जाए? क्या ऐसा कोई रास्ता हो सकता है, जिससे पहाड़ के संसाधन ही यहाँ के लोगों की आर्थिक मजबूती का आधार बनें?
इन्हीं सवालों के बीच वर्ष 2014 में योगेश बंधानी ने ‘युवा हिमालय’ की शुरुआत की। ऋचा भी स्थानीय उत्पादों पर शोध करने और बाजार की आवश्यकताओं को समझने के माध्यम से इस पहल से जुड़ गईं। वर्ष 2016 में योगेश बंधानी से विवाह के बाद ऋचा उत्तरकाशी के नौगाँव आ गईं और युवा हिमालय के कार्यों में सक्रिय भूमिका निभाने लगीं।
शहरों में रहते हुए जिन सवालों के जवाब वे तलाश रही थीं, अब उन्हें अपने ही लोगों के बीच रहकर उन विचारों को धरातल पर उतारने का अवसर मिला। ‘वोकल फॉर लोकल, लोकल फॉर ग्लोबल’ और ‘पहाड़ के लिए पहाड़’ की सोच के साथ उन्होंने स्थानीय उत्पादों को नई पहचान दिलाने की दिशा में काम शुरू किया।
पहाड़ के पारंपरिक स्वादों को मिली नई पहचान
कोरोना काल के दौरान युवा हिमालय का सफर एक नई पहचान बनाने लगा। पहाड़ के वे पारंपरिक उत्पाद, जो कभी विशेष मौसम में ही स्थानीय लोगों की थाली का हिस्सा बनते थे, अब प्रसंस्करण और संरक्षण के माध्यम से दूर-दराज के बाजारों तक पहुँचने लगे। प्रकृति ने पहाड़ को अनेक ऐसे उपहार दिए हैं, जो अपनी विशिष्ट जलवायु और भौगोलिक परिस्थितियों के कारण अलग पहचान रखते हैं।
लिंगुड़ा, तिमला, सेमल और कचनार जैसे स्थानीय वन उत्पादों और मौसमी सब्जियों को आधार बनाकर युवा हिमालय ने काम शुरू किया। इन उत्पादों को पारंपरिक स्वाद के साथ नए रूप में तैयार कर बाजार तक पहुँचाने की पहल की गई।
आज युवा हिमालय इन उत्पादों को हजारों किलोग्राम की मात्रा में उपभोक्ताओं तक पहुँचा रहा है। इस पहल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि पहाड़ की उपज का प्रसंस्करण पहाड़ में ही किया जाता है। इससे स्थानीय संसाधनों का बेहतर उपयोग होने के साथ-साथ रोजगार के अवसर भी पैदा हो रहे हैं।

युवा हिमालय की प्रसंस्करण इकाई अब स्थानीय उद्यमिता को समझने और सीखने का केंद्र भी बन रही है। यहाँ सरकारी और गैर-सरकारी संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ-साथ कॉलेजों, आईटीआई और विद्यालयों के विद्यार्थियों के एक्सपोजर विजिट तथा प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित होते रहते हैं।
इन कार्यक्रमों के माध्यम से लोग यह समझने का प्रयास करते हैं कि सीमित संसाधनों के बावजूद स्थानीय स्तर पर रोजगार और उद्यमिता की संभावनाएँ कैसे विकसित की जा सकती हैं।
जब किसान ही बन गए ब्रांड एंबेसडर
ऋचा का मानना है कि यदि इरादे मजबूत हों और संकल्प दृढ़ हो, तो कठिन परिस्थितियों में भी बहुत कुछ संभव किया जा सकता है। किसी उत्पाद को तैयार करना जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही चुनौतीपूर्ण है लोगों की पसंद, स्वाद और बाजार की माँग को समझना। आज बड़ी-बड़ी कंपनियाँ अपने उत्पादों की ब्रांडिंग और प्रचार-प्रसार पर भारी धनराशि खर्च करती हैं, लेकिन युवा हिमालय की सोच कुछ अलग है।
इस पहल का ब्रांड एंबेसडर वह हर व्यक्ति है, जो किसी न किसी रूप में इससे जुड़ा है। वह महिला, जो प्रसंस्करण इकाई में काम करती है; वह किसान, जो अपने खेतों में उम्मीदों की फसल उगाता है; और वह ग्राहक भी, जो पहाड़ के स्वाद को दूसरों तक पहुँचाता है।
गाँव के अंतिम छोर पर बैठा वह किसान भी इस मुहिम का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसकी उपज भले ही दस किलोग्राम हो या एक टन। युवा हिमालय का प्रयास रहता है कि स्थानीय किसानों की उपज को अपने उत्पादों में स्थान दिया जाए, ताकि छोटी-से-छोटी खेती करने वाले किसान को भी बाजार से जुड़ने का अवसर मिल सके। इस तरह पहाड़ की उपज को पहचान मिल रही है और यहाँ का पारंपरिक स्वाद देश के अलग-अलग हिस्सों में लोगों की थाली तक पहुँच रहा है।
केवल उत्पाद नहीं, पहाड़ की यादें भी
भोजन केवल स्वाद का विषय नहीं होता। उससे हमारी स्मृतियाँ, परंपराएँ और भावनाएँ भी जुड़ी होती हैं। पहाड़ के पारंपरिक अचार, चटनी, जूस और अन्य उत्पाद उन लोगों के लिए विशेष महत्व रखते हैं, जो वर्षों पहले रोजगार या शिक्षा के लिए अपना गाँव छोड़कर शहरों में बस गए।
इन स्वादों में उन्हें अपने घर की रसोई, माँ के हाथों का बना भोजन, बचपन की यादें और अपनी मिट्टी की महक महसूस होती है। युवा हिमालय का प्रयास केवल खाद्य उत्पादों को बाजार तक पहुँचाना नहीं, बल्कि पहाड़ से जुड़े इन्हीं एहसासों और जज्बातों को भी लोगों तक पहुँचाना है।

महिलाओं के हाथों में हुनर के साथ आत्मनिर्भरता की ताकत
युवा हिमालय की इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी है। आज लगभग 30 महिलाएँ इस प्रसंस्करण इकाई से जुड़ी हुई हैं। ये महिलाएँ केवल उत्पादन कार्य तक सीमित नहीं हैं, बल्कि मशीनों का संचालन करने और नई जुड़ने वाली महिलाओं को प्रशिक्षित करने की जिम्मेदारी भी निभा रही हैं।
पहाड़ की महिलाएँ सदियों से खेती-किसानी, पशुपालन, परिवार और घर की जिम्मेदारियों का निर्वहन करती आई हैं। उनका श्रम पहाड़ की अर्थव्यवस्था की रीढ़ रहा है, लेकिन कई बार उनके योगदान को आर्थिक पहचान नहीं मिल पाती। ऐसे में अपनी मेहनत से आय अर्जित करना, अपने हुनर का उपयोग करना और उस कमाई पर अधिकार होना उनके आत्मविश्वास को नई मजबूती देता है।
युवा हिमालय की इकाई से जुड़ी महिलाएँ आज केवल कामगार नहीं, बल्कि इस उद्यम की आधारशिला हैं। जब एक अनुभवी महिला दूसरी महिला को मशीन चलाना सिखाती है या उत्पादन की बारीकियाँ समझाती है, तो वह केवल तकनीकी ज्ञान ही साझा नहीं करती, बल्कि आत्मनिर्भरता का विश्वास भी आगे बढ़ाती है।
यही इस पहल की वास्तविक शक्ति है।
रोजगार से सम्मान तक की यात्रा
युवा हिमालय की पहल से लगभग 30 से 40 परिवार प्रत्यक्ष रूप से और करीब 15 गाँव अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार एवं आजीविका के अवसरों से जुड़े हैं। स्थानीय संसाधनों के आधार पर रोजगार सृजन और उद्यमिता को बढ़ावा देने के इस प्रयास को राज्य स्तर पर भी सराहना मिली है। युवा हिमालय की इकाई को मुख्यमंत्री और राज्यपाल द्वारा सम्मानित किया जा चुका है।
आज युवा हिमालय के नौगाँव बाजार में दो और देहरादून शहर में एक आउटलेट हैं। इसके अतिरिक्त उत्तरकाशी, बड़कोट, पुरोला, ऋषिकेश, देहरादून, हल्द्वानी, दिल्ली और हिमाचल प्रदेश के विभिन्न बाजारों की दुकानों तक इसके उत्पाद पहुँच रहे हैं।
इन उत्पादों की लोकप्रियता का एक रोचक पहलू यह भी है कि अनेक ग्राहक इन्हें अपने परिचितों और रिश्तेदारों को उपहार के रूप में देते हैं। इस तरह एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुँचता पहाड़ का स्वाद युवा हिमालय की पहचान को और व्यापक बना रहा है।
पलायन की चुनौती के बीच उम्मीद की नई राह
आज उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों के सामने पलायन एक गंभीर चुनौती है। रोजगार, शिक्षा और बेहतर सुविधाओं की तलाश में युवाओं का शहरों की ओर जाना तथा गाँवों का धीरे-धीरे खाली होना चिंता का विषय है। पलायन की समस्या के अध्ययन और समाधान के लिए आयोग का गठन भी किया गया है, लेकिन इस चुनौती का स्थायी समाधान स्थानीय स्तर पर रोजगार और आजीविका के अवसर विकसित करने में ही निहित है।
युवा हिमालय की अवधारणा—‘युवा + हिमालय’—इसी दिशा में संभावनाओं का नया द्वार खोलती है। यह पहल बताती है कि यदि स्थानीय संसाधनों, पारंपरिक ज्ञान, आधुनिक तकनीक और बाजार की आवश्यकताओं को एक साथ जोड़ा जाए, तो पहाड़ में रहकर भी उद्यमिता की नई राह बनाई जा सकती है। इसके लिए जरूरी है कि पहाड़ को केवल अभाव, कठिनाइयों और पलायन के संदर्भ में न देखा जाए, बल्कि उसकी संभावनाओं और सामर्थ्य को भी पहचाना जाए।
पहाड़ केवल पलायन की पीड़ा का नाम नहीं है। वह कठिन परिस्थितियों में भी अडिग खड़े रहने, संघर्ष करने और बार-बार नई शुरुआत करने की प्रेरणा देता है।
लोकमान्यताओं में संजीवनी जैसी जीवनदायिनी औषधि का संबंध भी हिमालय से जोड़ा जाता है। शायद यही कारण है कि पहाड़ की मिट्टी में आज भी जीवन को नई ऊर्जा देने की अपार संभावनाएँ मौजूद हैं।
ऋचा डोभाल बंधानी और युवा हिमालय की यह यात्रा उन्हीं संभावनाओं को साकार करने का एक प्रयास है।
नारी शक्ति का वह स्वरूप, जो दूसरों को भी सशक्त बनाता है
नवरात्रि के अवसर पर जब हम माँ दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की आराधना करते हैं, तब अपने आसपास उन महिलाओं को पहचानना भी आवश्यक हो जाता है, जो अपने कर्म, संकल्प और साहस से समाज में सकारात्मक बदलाव ला रही हैं। ऋचा डोभाल बंधानी की कहानी भी ऐसी ही एक प्रेरक यात्रा है। उन्होंने केवल अपने लिए आजीविका का रास्ता नहीं चुना, बल्कि अपने आसपास की महिलाओं, किसानों और स्थानीय युवाओं को साथ लेकर आगे बढ़ने का प्रयास किया। उनकी पहल यह संदेश देती है कि आत्मनिर्भरता केवल आर्थिक उपलब्धि नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, आत्मविश्वास और सामूहिक प्रगति की यात्रा भी है।
जब एक महिला आत्मनिर्भर बनती है, तो वह केवल अपना जीवन नहीं बदलती, बल्कि अनेक परिवारों और आने वाली पीढ़ियों के लिए भी संभावनाओं के नए द्वार खोलती है।
आइए, इस नवरात्रि उन महिलाओं के प्रयासों को भी सम्मान दें, जो अपने श्रम, साहस और संकल्प से पहाड़ में उम्मीदों की नई फसल उगा रही हैं।
और उन लोगों का हौसला बढ़ाएँ, जो कठिन परिस्थितियों के बावजूद अपनी मिट्टी से जुड़े रहकर एक आत्मनिर्भर पहाड़ का सपना साकार करने में जुटे हैं।

युवा हिमालय के प्रमुख उत्पाद
अचार: आम, आँवला, मिर्च, लिंगुड़ा, कचनार, सेमल, करेला, नींबू और मिक्स अचार।
चटनी: चुल्लू की खट्टी-मीठी चटनी, सेब की चटनी और टमाटर की चटनी।
जैम: सेब का जैम।
स्क्वैश: बुरांश, माल्टा, नींबू, लीची, अमरूद और पुदीना।
जूस: बिना अतिरिक्त चीनी और प्रिज़र्वेटिव के तैयार शुद्ध सेब और नाशपाती का जूस।
