उत्तराखंड के गांवों, कस्बों व शहरों में गूंज रही होली गायन की धूम

kumaoni Holi

 

  • सी.एम. पपनैं, भतरौंजखान (नैनीताल)

रंगों का पर्व होली सामाजिक और धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण त्योहार है. इसे होली, होलिका या होलाका के नाम से बड़े आनंद और उल्लास के साथ मनाया जाता है. फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह पर्व उत्तर भारत में लगभग एक सप्ताह तक चलता है, जबकि Manipur में यह उत्सव छह दिनों तक मनाया जाता है.

बैठकी होली से होती है शुरुआत

उत्तराखंड के पर्वतीय अंचल में पौष माह से बैठकी होली की शुरुआत हो जाती है. बसंत पंचमी तक आध्यात्मिक होली, पंचमी से महाशिवरात्रि तक अर्ध-श्रृंगारिक और उसके बाद पूर्ण श्रृंगार रस में डूबी होली गाई जाती है. बसंत पंचमी के साथ ही होल्यारों का उत्साह चरम पर पहुंच जाता है. महाशिवरात्रि से खड़ी होली प्रारंभ होती है और रंग एकादशी को चीर बांधी जाती है. इसके बाद होली का पर्व पूरे शबाब पर होता है.

महिला और पुरुष समूह कदमताल करते हुए गीतों में झूमते नजर आते हैं. सांझ ढलते ही होली की महफिलें सज जाती हैं. ढोल, मंजीरा, हारमोनियम, हुड़का, चिमटा, ढपली और थाली की मधुर ध्वनि वातावरण को उल्लासमय बना देती है. रातभर होली गायन चलता है और भोर का पता ही नहीं चलता.

राग आधारित शास्त्रीय परंपरा

पर्वतीय अंचल की होली बैठकें राग-आधारित शास्त्रीय गायन के लिए प्रसिद्ध हैं. शुभारंभ भगवान गणेश के स्मरण से होता है, तत्पश्चात देवी-देवताओं, प्रकृति, भक्ति और श्रृंगार के गीत गाए जाते हैं. सुबह भैरवी राग के साथ बैठक का समापन होता है.

होली गायन में भक्ति, वैराग्य, विरह, कृष्ण-गोपियों की हंसी-ठिठोली, प्रेम-प्रसंग और देवर-भाभी की चुटीली छेड़छाड़ जैसे विविध रस समाहित रहते हैं. यही बहुरंगी भाव इसकी विशेषता है.

कुमाऊंनी होली की अलग पहचान

कुमाऊ की होली राग आधारित गायन के कारण राष्ट्रीय स्तर पर विशिष्ट मानी जाती है. यद्यपि इसे कुमाऊंनी होली कहा जाता है, इसकी भाषा ब्रज होती है. यह परंपरा लगभग दो सौ वर्ष पुरानी मानी जाती है और चंद राजाओं के समय से इसका उल्लेख मिलता है.

महिलाएं दिन में बैठकर होली गाती हैं, जबकि पुरुषों की खड़ी होली में गोल घेरा बनाकर नृत्य और गायन किया जाता है. होल्यारों का पारंपरिक परिधान—सफेद कुर्ता-पायजामा तथा महिलाओं की साड़ियां—उत्सव की गरिमा बढ़ाते हैं.

चीर प्रथा और पारंपरिक आयोजन

कई स्थानों पर चीर प्रथा प्रचलित है. प्रत्येक घर से कपड़े का टुकड़ा एकत्र कर ‘पौंय’ वृक्ष की डाली पर बांधा जाता है. पूर्णिमा को चीर दहन और अगले दिन छरड़ी (धुलेंडी) मनाई जाती है. होली के अगले दिन टीका कार्यक्रम के साथ पर्व का समापन होता है.

जहां नहीं मनाई जाती होली

गढ़वाल मंडल के रुद्रप्रयाग जिले के अगस्त्यमुनि ब्लॉक, तल्ला नागपुर पट्टी के क्वेली, चौदला और कुटछड़ गांवों में पौराणिक मान्यताओं के कारण पिछले लगभग पंद्रह पीढ़ियों से होली नहीं मनाई जाती. स्थानीय मान्यता के अनुसार उनकी ईष्ट देवी त्रिपुरा सुंदरी को होली का हुड़दंग पसंद नहीं था, इसलिए ग्रामीण आज भी इस परंपरा का पालन करते हैं.

विभिन्न स्थानों पर आयोजन

नैनीताल (Nainital) में शारदा संघ, युगमंच और नैना देवी ट्रस्ट द्वारा आयोजन किए गए. रानीखेत (Ranikhet), चंपावत (Champawat), हल्द्वानी (Haldwani), अल्मोड़ा (Almora), पिथौरागढ़ (Pithoragarh) और लोहाघाट (Lohaghat) सहित कई स्थानों पर बैठकी और खड़ी होली के प्रभावशाली कार्यक्रम हुए. युवा और बाल होल्यारों की भागीदारी ने उत्सव में नई ऊर्जा भरी.

ऐतिहासिक और पौराणिक संदर्भ

होली से जुड़ी कथाएं प्रह्लाद, कामदेव, ढुंढी और पूतना की कहानियों से संबंधित हैं, जिनका मूल संदेश अधर्म पर धर्म की विजय है. नारद पुराण और भविष्य पुराण सहित प्राचीन ग्रंथों में इस पर्व का उल्लेख मिलता है.

उत्तराखंड की होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि लोकसंगीत, शास्त्रीय परंपरा और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत संगम है. रागों और रंगों से सजी कुमाऊंनी होली आज भी राष्ट्रीय फलक पर अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए है.

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