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हिलजात्रा: मुखौटों में जीवित सोर घाटी की 500 साल पुरानी लोक-स्मृति

हिलजात्रा: मुखौटों में जीवित सोर घाटी की 500 साल पुरानी लोक-स्मृति

पिथौरागढ़, लोक पर्व-त्योहार
 प्रकाश चन्द्र पुनेठा सिलपाटा, पिथौरागढ़ पिथौरागढ़ की सोर घाटी में हिलजात्रा केवल एक लोकपर्व नहीं, बल्कि पहाड़ के उस सामूहिक जीवन की स्मृति है, जिसमें खेती, पशु, जंगल, देवता और मनुष्य एक-दूसरे से अलग नहीं थे। कुमौड़ में मनाया जाने वाला यह पर्व लगभग पाँच सौ वर्षों की परंपरा को अपने भीतर समेटे हुए है। समय बदला, खेतों की मेड़ें सूनी होने लगीं, गांवों से पलायन बढ़ा और खेती का स्वरूप भी बदलता गया, लेकिन हिलजात्रा आज भी उस लोक-संसार की बची हुई आवाज की तरह हमारे सामने आती है। हिलजात्रा के केंद्र में उसके मुखौटे और पात्र हैं—लखिया भूत, वीरभद्र तथा खेती-किसानी और ग्रामीण जीवन से जुड़े अनेक रूप। ये मुखौटे केवल मनोरंजन के लिए नहीं हैं। इनके पीछे पहाड़ के लोकजीवन की गहरी स्मृतियां छिपी हैं। जब कलाकार इन्हें धारण करते हैं, तो उनके चेहरे भले ही ओझल हो जाते हैं, लेकिन उन्हीं मुखौटों के भीतर...