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सीमांत क्षेत्र के बुनकरों की आजीविका पर संकट, घट रही पारम्परिक कताई-बुनाई की परंपरा

सीमांत क्षेत्र के बुनकरों की आजीविका पर संकट, घट रही पारम्परिक कताई-बुनाई की परंपरा

उत्तरकाशी
 नीरज उत्तराखंडी, मोरी/पुरोला/उत्तरकाशीजनपद उत्तरकाशी के सीमांत क्षेत्रों मोरी, सरबडियार, हर्षिल और डुंडा में सदियों पुरानी पारम्परिक कताई-बुनाई की कला आज संकट के दौर से गुजर रही है। भेड़-बकरी पालन से प्राप्त ऊन पर आधारित यह कुटीर उद्योग कभी स्थानीय लोगों की आजीविका का प्रमुख साधन हुआ करता था, लेकिन बदलते समय, बाजार की कमी और आधुनिक उत्पादों की प्रतिस्पर्धा के कारण यह परंपरा धीरे-धीरे कमजोर होती जा रही है। स्थानीय लोगों के अनुसार पहले लगभग हर गांव में कई घरों में चरखा और करघा चलता था, लेकिन आज गिने-चुने परिवार ही इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।इन क्षेत्रों में विशेषकर महिलाएं घरों में चरखे से ऊन कातकर हाथकरघे पर शॉल, थुलमा, टोपी, मफलर और अन्य ऊनी वस्त्र तैयार करती रही हैं। यह शिल्प स्थानीय संस्कृति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।भेड़-बकरी पालन से...
सीमांत क्षेत्रों में रहने वाले जनजातीय भाई देश के प्रहरी : मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी

सीमांत क्षेत्रों में रहने वाले जनजातीय भाई देश के प्रहरी : मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी

चमोली
 हिमांतर ब्यूरो, चमोलीमुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने आज जनपद चमोली के बिरही (बेडूबगड़) में नीति-माणा जनजाति कल्याण समिति, चमोली द्वारा आयोजित तीन दिवसीय “जनजाति समागम 2026” के समापन कार्यक्रम में प्रतिभाग किया. इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया. नीति-माणा क्षेत्र की भोटिया समुदाय की महिलाओं ने पारंपरिक परिधान में मुख्यमंत्री का स्वागत किया. अपने संबोधन में मुख्यमंत्री ने कहा कि ऐसे आयोजन जनजातीय परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को सहेजने तथा नई पीढ़ी तक पहुंचाने का सशक्त माध्यम हैं. उन्होंने कहा कि जनजातीय समाज ने सदियों से अपनी परंपराओं, लोकज्ञान और प्रकृति संरक्षण की भावना से हमारी सभ्यता को समृद्ध किया है. सीमांत क्षेत्रों में रहने वाले जनजातीय भाई-बहन देश के सजग प्रहरी हैं. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जनजातीय...