Tag: भेड़ -बकरी पालन

सीमांत क्षेत्र के बुनकरों की आजीविका पर संकट, घट रही पारम्परिक कताई-बुनाई की परंपरा

सीमांत क्षेत्र के बुनकरों की आजीविका पर संकट, घट रही पारम्परिक कताई-बुनाई की परंपरा

उत्तरकाशी
 नीरज उत्तराखंडी, मोरी/पुरोला/उत्तरकाशीजनपद उत्तरकाशी के सीमांत क्षेत्रों मोरी, सरबडियार, हर्षिल और डुंडा में सदियों पुरानी पारम्परिक कताई-बुनाई की कला आज संकट के दौर से गुजर रही है। भेड़-बकरी पालन से प्राप्त ऊन पर आधारित यह कुटीर उद्योग कभी स्थानीय लोगों की आजीविका का प्रमुख साधन हुआ करता था, लेकिन बदलते समय, बाजार की कमी और आधुनिक उत्पादों की प्रतिस्पर्धा के कारण यह परंपरा धीरे-धीरे कमजोर होती जा रही है। स्थानीय लोगों के अनुसार पहले लगभग हर गांव में कई घरों में चरखा और करघा चलता था, लेकिन आज गिने-चुने परिवार ही इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।इन क्षेत्रों में विशेषकर महिलाएं घरों में चरखे से ऊन कातकर हाथकरघे पर शॉल, थुलमा, टोपी, मफलर और अन्य ऊनी वस्त्र तैयार करती रही हैं। यह शिल्प स्थानीय संस्कृति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।भेड़-बकरी पालन से...
 भेड़-बकरी पालन से आत्मनिर्भर बन रहे पहाड़ के गांव, महिलाओं की बढ़ी भागीदारी

 भेड़-बकरी पालन से आत्मनिर्भर बन रहे पहाड़ के गांव, महिलाओं की बढ़ी भागीदारी

उत्तरकाशी
पर्वतीय क्षेत्रों में आजीविका की रीढ़ बना भेड़-बकरी पालन, हजारों परिवारों को मिल रहा सहारानीरज उत्तराखंडी, पुरोलापर्वतीय क्षेत्रों में खेती की सीमित जमीन, कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और रोजगार के सीमित अवसरों के बीच भेड़-बकरी पालन पहाड़ की आर्थिकी और आजीविका की मजबूत रीढ़ बनकर उभरा है. सर बड़ियार क्षेत्र के दुर्गम गांवों में हजारों परिवार इस पारंपरिक व्यवसाय से सीधे जुड़े हुए हैं.आय और आत्मनिर्भरता का आधार विशेषज्ञों के अनुसार, पहाड़ में छोटे और सीमांत किसानों के लिए भेड़-बकरी पालन कम लागत और शीघ्र आमदनी देने वाला व्यवसाय है.बकरी का दूध, मांस और खाद स्थानीय बाजार में आसानी से बिक जाते हैं. भेड़ों से ऊन का उत्पादन होता है, जो हस्तशिल्प और वस्त्र उद्योग में उपयोगी है. प्राकृतिक चरागाहों की उपलब्धता से चारे की लागत अपेक्षाकृत कम रहती है.महिलाओं की बढ़ती भागीदारी...
पुरोला—मोरी: भेड़ पालकों का जीवन बीमा करने की मांग!

पुरोला—मोरी: भेड़ पालकों का जीवन बीमा करने की मांग!

उत्तरकाशी
नीरज  उत्तराखंडीभेड़ पहाड़ की  आर्थिकी की रीढ़ है लेकिन उचित  प्रोत्साहन न मिलने से भेड़ -बकरी पालन व्यवसाय  दम तोड़ता  नजर आ रहा है. आधुनिक सुख सविधाओं की ओर दौड़ती युवा पीढ़ी पारम्परिक व्यवसाय भेड़ बकरी पालन से विमुख होती जा रही है. जिसकी एक बडी वजह भेड़ पालकों की सरकारी अनदेखी भी शामिल है. उचित सहयोग प्रोत्साहन न मिले से युवा पीढ़ी इस पुश्तैनी  व्यवसाय  से  मुख मोड़ने लगी है. पहाड़ की जवानी रोटी रोजगार की तलाश  में  मैदान  की खाक छान रही है.आज के युवक भेड़ पालन व्यवसाय पर रुचि नहीं ले रहे हैं. जिससे लगातार भेड़-बकरी व्यवसायियों की संख्या में भारी गिरावट आ रही है. उच्च हिमालय की  सुन्दर घाटियों में समुद्रतल से  3566 मीटर (11700 फीट) की ऊंचाई पर भेड़ पालक बेखौफ मौसम की मार झेल कर  भेड़ बकरी व्यवसाय पालन करते है. प्रतिकूल परिस्थितियों में धूप, बारिश, सर्दी  आसमानी  बिजली  के संकट से जूझ...