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विलुप्ति की कगार पर पहाड़ की पारंपरिक आभूषण संस्कृति: ‘बुलाक’ से ‘खगाली’ तक खोती विरासत

विलुप्ति की कगार पर पहाड़ की पारंपरिक आभूषण संस्कृति: ‘बुलाक’ से ‘खगाली’ तक खोती विरासत

उत्तरकाशी, साहित्‍य-संस्कृति
नीरजउत्तराखंडी, पुरोला, उत्तरकाशीहिमालयी क्षेत्रों- विशेषकर उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी इलाकों की पारंपरिक आभूषण संस्कृति आज धीरे-धीरे विलुप्ति की कगार पर पहुंचती जा रही है. कभी महिलाओं की पहचान और सामाजिक स्थिति का प्रतीक रहे ये आभूषण अब आधुनिकता की चकाचौंध में अपनी चमक खोते नजर आ रहे हैं. परंपरा में बसती थी पहचान पहाड़ों में आभूषण केवल सजावट नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपरा और सामाजिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं. ‘बुलाक’ (नाक का आभूषण), ‘मुर्की’ (कानों का छोटा गहना), ‘लाबी’ और ‘खगाली’ जैसे आभूषण पीढ़ी-दर-पीढ़ी विरासत के रूप में संजोए जाते थे. इन गहनों का संबंध केवल सौंदर्य से ही नहीं, बल्कि जीवन के विभिन्न संस्कारों—जैसे विवाह, त्योहार और पारिवारिक आयोजनों से भी गहराई से जुड़ा रहा है. कई आभूषण वैवाहिक स्थिति और आर्थिक सम्पन्नता के प्रतीक माने जाते थे.‘बुलाक’ से ‘मु...