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पिज़्ज़ा-बर्गर के दौर में लुप्त हो रहे पारम्परिक पहाड़ी व्यंजन ‘सिड़ा–असका’, सांस्कृतिक पहचान पर संकट

पिज़्ज़ा-बर्गर के दौर में लुप्त हो रहे पारम्परिक पहाड़ी व्यंजन ‘सिड़ा–असका’, सांस्कृतिक पहचान पर संकट

उत्तरकाशी
 नीरज उत्तराखंडीहिमालयी क्षेत्रों की समृद्ध पाक परंपरा का अहम हिस्सा रहे पारम्परिक पहाड़ी व्यंजन ‘सिड़ा–असका’ आज अस्तित्व के संकट से जूझ रहे हैं. कभी त्योहारों, मेलों और विशेष अवसरों की शान माने जाने वाले ये व्यंजन अब धीरे-धीरे पहाड़ी रसोई से गायब होते जा रहे हैं.बदलती जीवनशैली का असरविशेषज्ञों का मानना है कि फास्ट फूड की बढ़ती लोकप्रियता, शहरीकरण और नई पीढ़ी की बदलती खान-पान आदतों ने पारम्परिक व्यंजनों को पीछे धकेल दिया है. पहले जहां घरों में गेहूं या मंडुए के आटे से सिड़ा (भाप में पका व्यंजन) और असका (स्थानीय शैली की रोटी/पकवान) बनाए जाते थे, वहीं अब उनकी जगह बाजारू खाद्य पदार्थों ने ले ली है.मेहनत और समय की मांगग्रामीण महिलाओं के अनुसार, सिड़ा–असका बनाने की प्रक्रिया समय और धैर्य की मांग करती है. आटे को विशेष तरीके से गूंथना, उसे खमीर उठाने देना और पारम्पर...
मूली की ‘थिचवानी’: एक स्वादिष्ट पहाड़ी व्यंजन 

मूली की ‘थिचवानी’: एक स्वादिष्ट पहाड़ी व्यंजन 

हिमालयन अरोमा, अल्‍मोड़ा
डॉ. मोहन चंद तिवारीअपने गांव जोयूं जब भी जाता हूँ तो मूली की थिच्वानी मुझे बहुत पसंद है. हमारे पड़ोस के गांव मंचौर की मूली की तो बात ही और है. दिल्ली जब आता हूं तो पहाड़ की मूली लाना कभी नहीं भूलता. सर्दियों में तो यह मूली की थिच्वानी स्वास्थ्य के लिए बहुत ही लाभकारी है. मूली तो मैदानों की भी बहुत लाभकारी है किंतु पहाड़ों की शलगमनुमा मूली की बात ही कुछ और है. इसमें हिमालय की वनौषधि के गुण समाविष्ट रहते हैं जो मैदानों में कैमिकल खाद से पैदा हुई मूली में नहीं मिलते. हमारे इलाके मंचौर की मूली इस दृष्टि से भी बहुत प्रसिद्ध है कि वहां की ताजी-ताजी मूली मिलती बड़ी मुश्किल से है क्योंकि पैदा ही बहुत कम होती है.आज मैं अपने इस लेख द्वारा पहाड़ी मूली से बनने वाली सब्जी 'थिचवानी' पर कुछ जानकारी शेयर करना चाहुंगा.कुमाऊं के स्थानीय व्यंजनों में एक स्थानीय कहावत है मनुवौ रवॉट, झुंगरौ भात, मुअकि थेच...