Tag: आगाज संस्था

माल्टा को मिले स्टेट फ्रूट का दर्जा

माल्टा को मिले स्टेट फ्रूट का दर्जा

देहरादून
  सिट्रस फल बदल सकते हैं पहाड़ के आर्थिक तंत्र का चेहराहिमांतर ब्यूरो, देहरादून‘माल्टा का महीना’ अभियान के तहत सिट्रस आर्थिकी पर दून लाइब्रेरी में एक विचार-विमर्श आयोजित किया गया. हरेला गांव, धाद की पहल पर आयोजित इस संवाद में विशेषज्ञों ने माल्टा सहित सिट्रस फलों को पहाड़ की आर्थिकी का मजबूत आधार बताते हुए इसे स्टेट फ्रूट का दर्जा देने की माँग रखी. कार्यक्रम में आगाज फेडरेशन के जगदम्बा मैठानी, कृषि उत्पादन मंडी समिति के सचिव अजय डबराल और गढ़वाल विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. तेजपाल बिष्ट ने अपने विचार रखे. स्वागत संबोधन में हरेला उद्यान के संयोजक पवन बिष्ट ने कहा कि पिछले तीन वर्षों से चल रहा ‘माल्टा का महीना’ अभियान इस वर्ष निर्णायक मोड़ पर पहुंचा है. समाज से लेकर शासन तक इसकी धमक बनी है और आम लोगों ने अभियान के तहत लगभग 12 टन माल्टा की खरीद कर किसानों को सीधा समर्थन दिया...
आगाज संस्था द्वारा हरेला पर्व पर 2000 कचनार – क्विराल के पौधों का रोपण

आगाज संस्था द्वारा हरेला पर्व पर 2000 कचनार – क्विराल के पौधों का रोपण

चमोली
आगाज संस्था द्वारा दशोली ब्लाक के  किरूली गाँव में हरेला के सुअवसर 2000 कचनार - क्विराल के पौधों के रोपण का कार्य प्रारंभ किया गया. इस कार्य में किरुली गाँव के 20 रिंगाल हश्त शिल्पी परिवारों जिनके पास निजी जमीन है, या जो भी परिवार इच्छुक है  उनको शामिल किया गया है. साथ ही इन सभी किसानों का जड़ी बूटी शोध संस्थान के साथ पंजीकरण भी किया जाएगा. आगाज के अध्यक्ष जे पी मैठाणी ने बताया की, तीन वर्ष तक चलने वाली इस परियोजना अभी तक अकेले जनपद चमोली और देहरादून के 783 किसान जुड़े हुए हैं.हिमालय की महत्वपूर्ण जड़ी बूटी जैसे - सुगंधबाला, तगर, टिमरू, लोध, रागा ( ब्लू पाइन ), कचनार के अलावा मैदानी जिले देहरादून में वरुणा और कुटज का रोपण किया जा रहा है. उन्होंने जानकारी दी कि किसानों  को यह पौधे नि:शुल्क दीए जा रहे हैं. इस परियोजना के लिए जीवन्ति वेलफेयर एंड चेरिटेबल ट्रस्ट / डाबर इंडिया लिमिटेड, नई दिल्...
प्राकृतिक रंग आधारित आजीविका के लिए वरदान है – आसाम नील पौधे की खेती

प्राकृतिक रंग आधारित आजीविका के लिए वरदान है – आसाम नील पौधे की खेती

खेती-बाड़ी
अनीता मैठाणी हिमालय क्षेत्र में प्राकृतिक रंग देने वाले कई पेड़ पौधे और झाड़ियाँ हैं. दूसरी तरफ पूरी दुनिया में नेचुरल कलर को लेकर - प्राकृतिक रंगों की बहुत मांग बढ़ गयी है. कुछ वर्षों तक हम उत्तरखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में - सेमल के फूल, सकीना (हिमालयन इंडिगो), रुइन के फल (सिन्दूर)  काफल की छल, किल्मोड की जड़ो, बुरांस के फूलों आदि को प्राकृतिक रंग के लिए उपयोग करते थे. लेकिन 5-6 वर्ष पूर्व - पहाड़ के हश्तशिल्प प्राकृतिक रंगों पर काम कर रही - सामाजिक संस्था अवनी को नार्थ ईस्ट के एक पौधे - आसाम नील के बारे में पता चला. अवनी संस्था की निदेशक श्रीमती रश्मि जी ने बताया कि, आसाम नील पौधे जिसको अंग्रेजी में - Strobilanthes Cusia कहते हैं, आसाम में सिर्फ नील कहते हैं , इस पौधे के प्राकृतिक रंग की पूरी दुनिया में बहुत मांग है, लेकिन ये पौधा अभी उत्तराखंड में सबसे पहले अवनी संस्था ही लाई - अवनी 7-8 स...