
- हिमांतर ब्यूरो, नई दिल्ली
दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रतिष्ठित शिवाजी कॉलेज में 16–17 मार्च को “शतावरी: भारत की आयुर्वेदिक विरासत का पुनर्जीवन” विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन एवं कार्यशाला सफलतापूर्वक संपन्न हुई। यह सम्मेलन आयुष मंत्रालय, भारत सरकार के अंतर्गत राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड द्वारा प्रायोजित था।
सम्मेलन की मुख्य थीम आयुष मंत्रालय की राष्ट्रीय पहल “शतावरी—बेहतर स्वास्थ्य के लिए” से जुड़ी थी, जिसका उद्देश्य शतावरी जैसे औषधीय पौधों के प्रति जागरूकता बढ़ाना, वैज्ञानिक शोध को प्रोत्साहित करना तथा सतत कृषि को बढ़ावा देना है। शतावरी भारतीय पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली में व्यापक रूप से उपयोग की जाने वाली एक महत्वपूर्ण औषधीय वनस्पति है।

कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र में शिवाजी कॉलेज के प्राचार्य प्रो. वीरेंद्र भारद्वाज ने अतिथियों का स्वागत करते हुए सम्मेलन की सफलता, महत्व और संभावनाओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के आयोजन न केवल शतावरी जैसे औषधीय पौधों के माध्यम से भारत की समृद्ध आयुर्वेदिक परंपरा को स्थापित करते हैं, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा की समकालीन प्रासंगिकता को भी उजागर करते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि यह सम्मेलन केवल एक अकादमिक गतिविधि न होकर एक व्यापक सामाजिक जागरूकता अभियान का रूप ले सकता है।
मुख्य अतिथि के रूप में राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी प्रो. महेश कुमार दाधीच ने अपने संबोधन में कहा कि भारतीय परंपरा में दवाओं के साथ-साथ खान-पान और जीवनशैली पर भी विशेष बल दिया गया है। उन्होंने कहा कि हमारे शास्त्रों में किसी भी शब्द को निरर्थक नहीं माना गया है। आंवला, मोरिंगा, अश्वगंधा के बाद अब शतावरी के औषधीय गुणों को जन-जन तक पहुंचाने के लिए अभियान चलाया जा रहा है। उन्होंने विश्वास जताया कि आने वाला समय प्राकृतिक चिकित्सा का होगा, इसलिए आयुर्वेद की ओर लौटना आवश्यक है।

विशिष्ट अतिथि एवं अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान के निदेशक प्रो. प्रदीप कुमार प्रजापति ने अपने संबोधन में छत्रपति शिवाजी महाराज की महान परंपरा का उल्लेख करते हुए शतावरी को एक सदाबहार पौधा बताया, जो वर्ष भर हरा-भरा रहता है।
दूसरे दिन की शुरुआत आयुष मंत्रालय के पूर्व सलाहकार डॉ. डी. सी. कटोच के वक्तव्य से हुई। उन्होंने कहा कि ऐसे सम्मेलनों की सार्थकता तभी है, जब हम आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा को अपने दैनिक जीवन में अपनाएं।
समापन सत्र में मुख्य अतिथि प्रो. रबिनारायण आचार्य, महानिदेशक (सीसीआरएएस) ने कहा कि उनका संस्थान शिवाजी कॉलेज के साथ शोध परियोजनाओं में सहयोग के लिए सदैव तैयार है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के संयुक्त प्रयासों से ही आयुर्वेदिक विरासत को व्यापक स्तर पर जन-जन तक पहुंचाया जा सकता है।
इस दो दिवसीय सम्मेलन में विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों, अकादमिक जगत और औद्योगिक क्षेत्र से जुड़े उद्यमियों ने सक्रिय भागीदारी की। शतावरी एवं अन्य औषधीय पौधों पर लगभग 80 पोस्टर और 50 से अधिक शोध पत्र प्रस्तुत किए गए। इसके अतिरिक्त, सोशल मीडिया के माध्यम से जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से रील-निर्माण, नारा लेखन, इन्फोग्राफिक्स और डिजिटल फोटोग्राफी जैसी विभिन्न छात्र प्रतियोगिताएं भी आयोजित की गईं।

यह सम्मेलन औषधीय पौधों की वैज्ञानिक खेती और व्यावसायिक संभावनाओं पर विचार-विमर्श के लिए एक महत्वपूर्ण मंच साबित हुआ, जहां आयुर्वेद, फार्मा, कृषि विज्ञान, जीव विज्ञान, वनस्पति विज्ञान और स्वास्थ्य विज्ञान के विशेषज्ञों ने अपने विचार और शोध साझा किए।
कार्यक्रम के दौरान प्राचार्य एवं अतिथियों द्वारा कॉलेज के हर्बल गार्डन में शतावरी के पौधों का रोपण भी किया गया।
उल्लेखनीय है कि यह सम्मेलन राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड द्वारा प्रदत्त 18.9 लाख रुपये की शोध परियोजना के अंतर्गत आयोजित किया गया। इस परियोजना के मुख्य शोधकर्ता शिवाजी कॉलेज (दिल्ली विश्वविद्यालय) के डॉ. अनुराग मौर्य, डॉ. स्मिता त्रिपाठी और डॉ. जितेंद्र कुमार चौधरी हैं। सम्मेलन के अंतर्गत एक महत्वपूर्ण लक्ष्य के रूप में 1 लाख शतावरी पौधों का जन-जन में वितरण करने का संकल्प भी लिया गया।
