पाथा: पहाड़ी मानक पात्र

  • विजय कुमार डोभाल

पहाड़ में गांववासी अपने उत्पादन (अनाज, दालें, सब्जी या दूध -घी) आदि से यह अनुमान लगाते थे कि उनके पास अपनी जरूरतें पूरा करने के लिए यह काफी होगा कि कुछ कमी हो सकती है. ‘मापन’ की कोई व्यवस्था न होने से वे किसी से उधार न तो ले सकते थे और न दे सकते थे. धीरे-धीरे सभ्यता के विकास के साथ ‘मापन -पात्रों’ की खोज भी हुई जिससे आदान-प्रदान सरल हो गया. प्रसिद्ध पहाड़ी कहावत- ‘नाता बढ़ा कि पाथा’ से भी पाथे की मापन क्षमता का पता चलता है.

हमारे गांव में नाप-तौल के लिए बाट-तराजू का प्रयोग बहुत सीमित होता है क्योंकि बाट-तराजू कुछ ही परिवारों के पास होता है जबकि प्रत्येक परिवार के पास पूर्वजों की धरोहर के रूप में कई मापन-पात्र सुरक्षित तथा कार्यकारी अवस्था में हैं.

हमारे जिस पात्र में जितना अनाज या द्रव पदार्थ समाता है उसे उसकी धारिता कहते हैं. यह मापन-पात्र मुट्ठी, अदुड़ी, माणी (सेर), पाथा जैसे नामों से जाने जाते हैं. हम लोग अपना उत्पाद जैसे अनाज, दालें, मिर्च, जख़्या, दूध, घी, तेल आदि इन्हीं के द्वारा मापते हैं.

हमारे ये पात्र हमारे ही ग्रामीण दस्तकारों द्वारा तांबे, पीतल, लकड़ी, बांस तथा रिंगाल से तैयार किए जाते हैं. छोटे-बड़े कुछ पात्र नक्काशीदार भी होते हैं.

हम अपने गांवों में मांगलिक अवसरों या श्राद्ध आदि के समय दावत (घरवात्) के लिए दी जाने वाली भोज्य सामग्री-दालें चावल या आटा सरूल (पाकशास्त्री) को इसी पाथे से माप कर देते हैं. विवाह आदि अवसरों पर मायके आई हुई दिशा-ध्याणी (फूफू, दीदी-भूलि, बेटी) को विदाई के समय दूण (16 पाथा या 32 किलो) पाथ से माप कर दिया जाता है.

हमारे दुधारू पशुओं की कीमत भी उनके द्वारा दिए जाने वाले दूध-घी पर निर्भर करती है. जो पाव से शुरू होकर पाथा (नाली) तक दूध देते हैं और अपना मूल्य स्वयं ही बता देते हैं. पहले कुछ ‘चतुर’ साहूकार दो प्रकार के पाथा रखते थे, उधार देने का पाथा छोटा तथा वसूलने का बड़ा. इस प्रकार वे अपना ब्याज बिना प्रयास के ही वसूल लेते थे.

हम अपने गांवों में मांगलिक अवसरों या श्राद्ध आदि के समय दावत (घरवात्) के लिए दी जाने वाली भोज्य सामग्री-दालें चावल या आटा सरूल (पाकशास्त्री) को इसी पाथे से माप कर देते हैं. विवाह आदि अवसरों पर मायके आई हुई दिशा-ध्याणी (फूफू, दीदी-भूलि, बेटी) को विदाई के समय दूण (16 पाथा या 32 किलो) पाथ से माप कर दिया जाता है.

परिवारजनों की संख्या के आधार पर भोजन की मात्रा-पाव, अंज्वाल (दोनों हथेली से बना दोना), सेर अथवा पाथा निर्धारित होती है.

हम पाथे का उपयोग केवल राशन मापने के लिए ही नहीं करते हैं बल्कि देव-पूजन में जलने वाले अखंड दीपक (द्युल-पाथा) के लिए भी करते हैं, इसमें पाथे को झंगोरे से भर कर जलता हुआ दीपक रखा जाता है, जिसे साक्षात भैरवनाथ का प्रतिरूप माना जाता है. जागर (देव-स्तुति) गाने-बजाने वाला धामी अपनी कांसे की थाली पाथे पर रख कर बजाता है.

हमारी पाथी मात्र एक मापन-पात्र ही नहीं बल्कि यह हमारी सभ्यता एवं संस्कृति का अभिन्न अंग है. इसके अभाव में वस्तुओं की अदला-बदली, क्रय-विक्रय आदि असंभव है. यह एक ऐसा पात्र है जिस पर सभी लोगों (क्रेता-विक्रेता) की ईश्वर के समान अटूट श्रद्धा और विश्वास होता है.

हम इस पाथे को ‘नाली’ भी कहते हैं जो भूमि की नाप मानी जाती है. एक पाथा गेहूं या धान का बीज जितने क्षेत्रफल में बोया जाता है वह एक ‘नाली’ होता है. एक पाथे में सोलह मुठ्ठी, एक बीघे में चालीस मुठ्ठी या ढाई नाली का एक बीघा माना जाता है.

हमारी पाथी मात्र एक मापन-पात्र ही नहीं बल्कि यह हमारी सभ्यता एवं संस्कृति का अभिन्न अंग है. इसके अभाव में वस्तुओं की अदला-बदली, क्रय-विक्रय आदि असंभव है. यह एक ऐसा पात्र है जिस पर सभी लोगों (क्रेता-विक्रेता) की ईश्वर के समान अटूट श्रद्धा और विश्वास होता है.

 (लेखक अवकाशप्राप्त अध्यापक हैं)

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