September 19, 2020
संस्मरण

गुड़ की भेलि में लिपटे अखबार का एक दिन

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—44

  • प्रकाश उप्रेती

आज किस्सा- “ईजा और अखबार” का.  ईजा अपने जमाने की पाँच क्लास पढ़ी हुई हैं. वह भी बिना एक वर्ष नागा किए. जब भी पढ़ाई-लिखाई की बात आती है तो ईजा ‘अपने जमाने’ वाली बात को दोहरा ही देती हैं. हम भी कई बार गुणा-भाग और जोड़-घटाने में ईजा से भिड़ पड़ते थे लेकिन ईजा चूल्हे से “कोय्ली” (कोयला) निकाल कर जमीन में लिख कर जोड़-घटा, गुणा-भाग तुरंत कर लेती थीं. अक्सर सही करने के बाद ईजा की खुशी किसी अबोध शिशु सी होती थी. हम कहते थे- “क्या बात ईजा, एकदम सही किया है”. ईजा फिर अपने जमाने की पढ़ाई वाली बात दोहरा देती थीं.

तब अखबार से कोई लेना-देना नहीं था. अक्सर “गुड़ की भेली” अखबार में लपेट कर आती थी. इतना ही अखबार की उपयोगिता ईजा समझती थी लेकिन जब भी शाम को केदार के बाज़ार जाते थे तो देखते थे कि कुछ लोग चाय पी रहे होते, कुछ हुक्का तो कुछ अखबार भी पढ़ रहे होते थे. उससे हमें थोड़ा बहुत अखबार की अहमियत पता चली थी. वहीं से पता चला कि सरकार अखबार में लिखती है. ईजा भी कहती थीं- “ऊ अखबार में आ रहो, दुकानुपन मेस बात कमछि” ( वो अखबार में आ रखा है, बाजार में आदमी लोग बात कर रहे थे). हम ईजा की बात को ध्यान से सुनते थे.

जैसे ही पोस्टमैन दिखाई दे सब ‘पा रे बाखे’ चले जाते और अपना-अपना रोल नं. देखने की उत्सुकता में बैचेन रहते थे. रोल नं. देखने के वो पैसे लेते थे. अगर पास हुए तो 50 रूपए और चाय और फेल हुए तो खाली चाय. रोल नम्बर पूछ कर वो पहले खुद ही देखते थे और बाद में जिनका होता उन्हें दिखाते थे. सिर्फ पास वाले को दिखाया जाता था. जो फेल हो जाता उसे कहते- “त्यर रोल नम्बर इमें नि छु”

हमारे यहाँ अखबार शाम को ही पढ़ा जाता था. बाजार जाने का नियम भी शाम का ही था. ईजा ने कभी अखबार हाथ में लिया हो, मुझे ध्यान नहीं लेकिन उस दिन की बात ही अलग थी. बात थी भाई के 10वीं के रिजल्ट आने की. तब बोर्ड का रिजल्ट अखबार में ही आता था. गाँव में पहले भी कुछ लोगों का रिजल्ट अखबार के जरिए ही देखा गया था. सुबह अखबार में रिजल्ट आ जाता था लेकिन हमारे गाँव में वो शाम तक पहुंचता था कई बार गाँव भी नहीं पहुँचता बल्कि देखने बाजार जाना पड़ता था.

गांव में अखबार पोस्टमैन लेकर आते थे. सुबह से रिजल्ट की प्रतीक्षा कर रहे लोग रास्ते की तरफ ही टकटकी लगाए देखते रहते थे. पोस्टमैन तो 4-5 बजे प्रकट होता था. जैसे ही पोस्टमैन दिखाई दे सब ‘पा रे बाखे’ चले जाते और अपना-अपना रोल नं. देखने की उत्सुकता में बैचेन रहते थे. रोल नं. देखने के वो पैसे लेते थे. अगर पास हुए तो 50 रूपए और चाय और फेल हुए तो खाली चाय. रोल नम्बर पूछ कर वो पहले खुद ही देखते थे और बाद में जिनका होता उन्हें दिखाते थे. सिर्फ पास वाले को दिखाया जाता था. जो फेल हो जाता उसे कहते- “त्यर रोल नम्बर इमें नि छु” ( तेरा रोल नम्बर इसमें नहीं है). इसी वाक्य से समझ आ जाता था कि फेल है. अगर फेल होने वालों की संख्या ज्यादा होती तो दुःख कम होता और संख्या कम होती तो दुःख ज्यादा होता था. तब पहली बार में ही कोई 10वीं पास कर जाए यह बड़ी खबर होती थी.

रात को रेडियो पर 10वीं के रिजल्ट आने की घोषणा हो गई थी. ईजा ने ही सुनकर भाई को बताया- “भोह हैं त्यर रिजल्ट आमों, रेडू बतामों” (कल तेरा रिजल्ट आ रहा है, रेडियो बता रहा है). भाई को कोई उत्सुकता नहीं थी लेकिन ईजा को बड़ी उत्सुकता थी क्योंकि उन्होंने परीक्षा के दिनों में 3-3 बजे उठकर उसे नाश्ता कराकर “छिलुक” जलाकर केदार तक छोड़ा था. उसका सेंटर मांसी था. केदार से जीप बुक कर रखी थी. 7 बजे से पेपर शुरू हो जाता था तो 6.30 बजे तक वहाँ पहुंचना अनिवार्य होता था. इस रिजल्ट में जितनी मेहनत भाई की थी उससे कहीं कम ईजा की भी नहीं थी. इसलिए रिजल्ट की उत्सुकता ईजा को भी थी.

पोस्टमैन बगल के गाँव के ही थे तो ‘नमस्कार-पुस्कार’ के बाद ईजा ने ही पूछा- “अखबार ल्या रह छा”. पोस्टमैन ने कोई जवाब देने के बजाय अपने झोले में से अखबार निकाला. तब पहाड़ में अमर उजाला और दैनिक जागरण दो ही अखबार थे. रिजल्ट शायद दैनिक जागरण में था. उन्होंने अखबार निकालते ही कहा- “यो बार तो बिनोली इस्कूल साफ होगो”. ईजा का दिल बैठ गया चेहरे के भाव बदल गए लेकिन फिर कहने लगीं- “ये म्यर च्यलक रिजल्ट देखो ढैय्”.

अब वो दिन और सुबह भी आ गई थी. ईजा सुबह से ही भाई को कह रही थीं- “जा मांसी बे अख़बारम रिज़ल्ट देख्य हा” (जा मांसी जाकर अखबार में अपना रिजल्ट देख आ). भाई कह रहा था,  जब यहां आएगा तब ही देख लूँगा. अब ईजा की नज़र सुबह से ही ‘रुचि खाव’ (जगह का नाम) की तरफ थी. पोस्टमैन के आने का वही रास्ता था. शाम को 4 बजे के आस- पास एक झोला टांगा  हुआ आदमी ‘रुचि खाव’ से नीचे को आता दिखाई दिया. ईजा की नज़र पड़ते ही- “अरे ऊ अगो पोस्टमास्टर, च्यला उनुकें इथां बुला ल्या ढैय्” (अरे वो आ गया पोस्टमैन, बेटा उनको इधर ही बुला ला). हम बुलाने जाते ही लेकिन देखा कि वो सीधे हमारे घर की तरफ ही आ रहे हैं. उनको घर की तरफ आता देख ईजा ने बाहर बोरा बिछा दिया और भाई अपना रोल नम्बर ढूंढने लगा.

 

तब तक पोस्टमैन घर पर आ गए. पोस्टमैन बगल के गाँव के ही थे तो ‘नमस्कार-पुस्कार’ के बाद ईजा ने ही पूछा- “अखबार ल्या रह छा” (अखबार लाई हो). पोस्टमैन ने कोई जवाब देने के बजाय अपने झोले में से अखबार निकाला. तब पहाड़ में अमर उजाला और दैनिक जागरण दो ही अखबार थे. रिजल्ट शायद दैनिक जागरण में था. उन्होंने अखबार निकालते ही कहा- “यो बार तो बिनोली इस्कूल साफ होगो” (इस बार तो बिनोली का स्कूल साफ हो गया है). ईजा का दिल बैठ गया चेहरे के भाव बदल गए लेकिन फिर कहने लगीं- “ये म्यर च्यलक रिजल्ट देखो ढैय्” (मेरे बेटे का रिजल्ट देखना). भाई अपना रोल नंबर लिए खड़ा था. अखबार को लेकर ईजा की ऐसी उत्सुकता पहली बार देख रहा था.

पोस्टमैन ने अखबार को पलटना शुरू किया. तीसरे पेज पर  रोल नम्बर ही रोल नम्बर थे. ईजा टकटकी लगाए पेज पर नजर गड़ाए हुए थीं. ईजा की आँखों की चमक से अखबार के मटमैले शब्द मोती जैसे खिल रहे थे. भाई सरसरी नज़र फेर रहा था. पोस्टमैन उंगली घसीटते और मंद आवाज में कुछ पढ़ते जा रहे थे. तभी तीसरे पेज के पाँचवे कॉलम पर उनकी उँगली रुक गई. जिस सीरियल नम्बर से बिनोली स्कूल का रोल न. शुरू हो रहा था उसमें केवल एक ही रोल नंबर था.

पोस्टमैन ने भाई से रोल नं. के अंक बताने को कहा. भाई तुरंत बताने लगा. आगे के सारे अंक मिल गए लेकिन अंतिम अंक नहीं मिला. अंतिम अंक नहीं मिलते ही पोस्टमैन ने कहा- “यो त त्यूमर नि छो, त्यूमर पूरा इस्कूलम बति एके पास है रहो, बाकि सब फेले छैं” (ये तुम्हारा नहीं है, तुम्हारे पूरे स्कूल में से केवल एक ही बच्चा पास है बाकी सब फेल हैं). यह सुनते ही ईजा के चेहरे के भाव बदल गए. ऐसे की जैसे कोई बड़ी चीज खो दी हो. भाई थोड़ा दुःखी था लेकिन इस बात का उसे संतोष था कि सभी फेल हुए हैं. बाकी अब जो एक पास हुआ था उसको लेकर कयास लगाए जा रहे थे.

हमने पहली बार उसी दिन ईजा के हाथ में अख़बार देखा. आज ईजा से बात करते हुए मैंने  बताया कि- “ईजा आज पत्रकारिता दिवस छु”. ईजा ने छूटते ही कहा- “अख़बरोक दिन क्या”. मैंने अनमने मन से सिर्फ ‘हाँ’ कहा लेकिन तब से सोच रहा हूँ अखबार के दिन अब भी बचे हैं क्या…

ईजा ने पोस्टमैन को चाय दी. उनके लिए अखबार का काम अब खत्म हो चुका था. वह अखबार हमारे घर पर ही छोड़ गए. हम सब अखबार पर ऐसे टूटे जैसे मेहमान के जाने के बाद बिस्कुट और नमकीन पर टूटते थे. हमारी तसल्ली हो जाने के बाद ईजा अखबार को  उलटने-पलटने लगीं. शायद उनको अब भी चमत्कार की उम्मीद थी.

हमने पहली बार उसी दिन ईजा के हाथ में अख़बार देखा. आज ईजा से बात करते हुए मैंने  बताया कि- “ईजा आज पत्रकारिता दिवस छु”. ईजा ने छूटते ही कहा- “अख़बरोक दिन क्या”. मैंने अनमने मन से सिर्फ ‘हाँ’ कहा लेकिन तब से सोच रहा हूँ अखबार के दिन अब भी बचे हैं क्या…

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं.पहाड़ के सवालों को लेकर मुखर रहते हैं.)

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