जोशीमठ भू-धंसाव : इस स्थिति के लिए आखिर कौन जिम्मेदार?

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जोशीमठ में भू-धंसान की त्रासदी को राष्ट्रीय आपदा घोषित की जाए!

  • डॉ. मोहन चंद तिवारी

धार्मिक,पौराणिक एवं ऐतिहासिक नगर जोशीमठ भू-धंसाव के कारण इस साल की सबसे बड़ी त्रासदी झेल रहा है. उत्तराखंड के जोशीमठ शहर में भू-धसाव की त्रासदी को लेकर हर तरफ चिंता है. जोशीमठ के डीएम ने बताया है कि नगर में कुल 561 भवनों में दरार आई है. साथ ही दो बहुमंजिला होटलों के खतरे की जद में आए पांच भवन खाली कराए गए हैं. उत्तराखंड डिजास्टर एंड एक्सीडेंट सिनोप्सिस (उदास) की रिपोर्ट के अनुसार, भी जोशीमठ में 500 घर रहने के लायक नहीं हैं.

जोशी मठ की ग्राउंड जीरो से मिली मीडिया रिपोर्टों के आधार पर कहा जा सकता है कि जोशीमठ में भू-धंसाव किसी बड़ी अनहोनी की ओर इशारा कर रहा है. इस ऐतिहासिक शहर में पड़ी दरारें, इस बात की गवाह हैं कि हालात ठीक नहीं. वहीं प्रशासन के राहत बचाव कार्य संतोष जनक नहीं हैं, जिससे प्रभावितों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है,उन्हें इस भारी ठंड में भी किसी अनहोनी के भय से रात घर से बाहर गुजारनी पड़ रही है.

बदरीनाथ के उच्च हिमालयी क्षेत्र से निकलने वाली अलकनंदा और धौलीगंगा के संगम स्थल विष्णुप्रयाग में दोनों नदियां लगातार कटाव कर रही हैं. विष्णुप्रयाग से ही जोशीमठ शहर का ढलान शुरू होता है. नीचे हो रहे कटाव के चलते जोशीमठ क्षेत्र का पूरा दबाव नीचे की तरफ हो रहा है. इसके चलते भू-धंसाव में बढ़ोतरी हुई है.
– डॉ. स्वप्नामिता चौधरी, वरिष्ठ भूस्खलन वैज्ञानिक 

चिंता की बात है कि भारत की इस अंतिम सरहदी शहर में भू-धंसाव का आकार दिन प्रतिदिन सुरसा राक्षसी की मुंह के समान बढ़ता ही जा रहा है. इसके घरों, सड़कों तथा खेतों में बड़ी-बड़ी दरारें आ गईं हैं. हालांकि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने जोखिम वाले घरों में रह रहे 600 परिवारों को तत्काल अन्यत्र भेजे जाने का आदेश दिया है. अब पीएमओ भी मामले की निगरानी कर रहा है, लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि आखिर जोशीमठ में यह भू-धंसाव की स्थिति उत्पन्न कैसे हुई ? और इस त्रासदी के लिए जिम्मेदार कौन है? स्थानीय लोगों में सरकार के खिलाफ भारी आक्रोश है. स्थानीय लोग इमारतों की खतरनाक स्थिति के लिए मुख्यतः राष्ट्रीय तापविद्युत निगम लिमिटेड (एनटीपीसी) की तपोवन -विष्णुगढ़ परियोजना को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं.

‘जोशी मठ बचाओ’ संघर्ष समिति के संयोजक अतुल सती ने कहा, “हम पिछले 14 महीनों से अधिकारियों का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन हमारी बात पर ध्यान नहीं दिया गया. अब जब स्थिति हाथ से निकल रही है तो वे चीजों का आकलन करने के लिए विशेषज्ञों की टीम भेज रहे हैं.” उन्होंने कहा, “अगर समय रहते हमारी बात पर ध्यान दिया गया होता तो जोशीमठ में हालात इतने चिंताजनक नहीं होते.”

अब जोशीमठ में धंसाव का मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है. धर्माचार्य  स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने सुप्रीम कोर्ट में दायर अपनी याचिका में अपील की गई है कि शीर्ष अदालत  जोशीमठ में हो रहे मरम्मत कार्य में तुरंत हस्तक्षेप करे. साथ ही जिंदगी और संपत्ति खोने का खतरा झेल रहे जोशीमठ के लोगों को तत्काल राहत प्रदान की जाए.

याचिका में लैंड स्लाइडिंग,सब्सिडेंस,लैंड सिंकिंग यानी जमीन फटने और जमीन व मकानों में दरार की वर्तमान घटनाओं को राष्ट्रीय आपदा घोषित करने की मांग की गई है. याचिका में कहा गया है कि उत्तराखंड राज्य में केंद्र और राज्य सरकार द्वारा औद्योगीकरण,शहरीकरण और प्राकृतिक संसाधनों के विनाश के रूप में बड़े पैमाने पर हस्तक्षेप के कारण ही पर्यावरण, पारिस्थितिक और भूगर्भीय गड़बड़ी पैदा हुई है. इसमें आगे कहा गया है कि “मानव जीवन और उनके पारिस्थितिकी तंत्र की कीमत पर किसी भी विकास की जरूरत नहीं है. और अगर ऐसा कुछ भी हो रहा है तो यह राज्य और केंद्र सरकार का कर्तव्य है कि युद्ध स्तर पर इसे तुरंत रोका जाए.” इस क्षेत्र से जुड़े भूवैज्ञानिक भी कह रहे हैं कि सरकारों की अन्धविकासवादी नीतियों के कारण यह त्रासदी उत्पन्न हुई है.

इस क्षेत्र से जुड़ी वरिष्ठ भूस्खलन वैज्ञानिक डॉ. स्वप्नामिता चौधरी का कहना है कि बदरीनाथ के उच्च हिमालयी क्षेत्र से निकलने वाली अलकनंदा और धौलीगंगा के संगम स्थल विष्णुप्रयाग में दोनों नदियां लगातार कटाव कर रही हैं. विष्णुप्रयाग से ही जोशीमठ शहर का ढलान शुरू होता है. नीचे हो रहे कटाव के चलते जोशीमठ क्षेत्र का पूरा दबाव नीचे की तरफ हो रहा है. इसके चलते भू-धंसाव में बढ़ोतरी हुई है.

डॉ. चौधरी के मुताबिक,पिछले दो दशक में जोशीमठ का अनियंत्रित तरीके से विकास हुआ है. इसके लिए ठोस कार्य योजना नहीं तैयार की गई. लिहाजा जलनिकासी का प्रबंधन बेहतर नहीं हो पाया. ऐसे में मानसून के दौरान बारिश और पूरे साल घरों से निकलने वाला पानी नदियों में जाने के बजाय जमीन के भीतर समा रहा है. यह भी भू-धंसाव का एक प्रमुख कारण है. डॉ. स्पप्नामिता चौधरी ने वर्ष 2006 में ही जोशीमठ पर अध्ययन करके सरकार को यह चेतावनी दे दी थी कि जलनिकासी की व्यवस्था नहीं होने और नाले,नालियों पर बेतरतीब अतिक्रमण से भारी मात्रा में पानी जमीन के भीतर समा रहा है. उन्होंने इस संबंध में अपनी रिपोर्ट शासन और आपदा प्रबंधन विभाग को भी सौंपी थी. किन्तु उस रिपोर्ट का क्या हुआ, इस संबंध में उन्हें जानकारी नहीं है.

वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के भूस्खलन वैज्ञानिकों का भी यही कहना है कि धौलीगंगा और अलकनंदा नदियां विष्णुप्रयाग क्षेत्र में लगातार टो कटिंग (नीचे से कटाव) कर रही हैं. इस वजह से जोशीमठ में भू-धंसाव तेजी से बढ़ा है. यही नहीं, वर्ष 2013 में आई केदारनाथ आपदा, वर्ष 2021 की रैणी आपदा और बदरीनाथ क्षेत्र के पांडुकेश्वर में बादल फटने की घटनाएं भी भू-धंसाव के लिए काफी हद तक जिम्मेदार हैं. भूवैज्ञानिकों द्वारा जोशीमठ में भू-धंसाव का कारण बेतरतीब निर्माण कार्य,पानी का रिसाव,ऊपरी मिट्टी का कटाव और मानव जनित कारणों से जल धाराओं के प्राकृतिक प्रवाह में रुकावट को बताया गया.

आदि गुरु शंकराचार्य की तपोभूमि के रूप में जाना जाने वाला हिन्दू धर्म का यह प्राचीन तीर्थ स्थल जोशीमठ आध्यात्मिक और सामरिक दोनों दृष्टियों से अत्यंत महत्त्वपूर्ण नगर है. बद्रीनाथ, हेमकुंड साहिब और अंतरराष्ट्रीय स्कीइंग स्थल औली जैसे प्रसिद्ध स्थलों का यह प्रवेश द्वार है. यहां से भारत तिब्बत सीमा महज 100 किमी की दूरी पर है. अब भू-धंसाव का क्षेत्र सेना और आईटीबीपी कैंप की ओर भी बढ़ना शुरू हो गया है. सेना मुख्यालय को जोड़ने वाली सड़क भी धंसनी शुरू हो गई है. जल्द इस पर कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया तो देश की सुरक्षा पर भी इसका असर पड़ सकता है.

दरअसल, प्रकृति के साथ छेड़छाड़ करने के कारण आज हिमालय प्रकृति तनावग्रस्त है,जोशीमठ में उत्पन्न हुई यह भूमि धंसाव की त्रासदी पहली त्रासदी नहीं है,बल्कि हिमालय में भूकम्प, भूस्खलन आदि प्राकृतिक आपदाओं के पिछले आठ-दस वर्षों के रिकार्ड बताते हैं कि आज हिमालय प्रकृति अंध विकासवादियों से बहुत नाराज है. नेपाल और तिब्बत की सीमाओं से जुड़े उच्च हिमालय और टोंस से ले कर काली शारदा नदियों के मध्य तक फैले उत्तराखंड राज्य की भौगोलिक और जलवायु संबंधी विकृतियों की वजह से यहां रहने वाले नागरिकों को पिछले अनेक वर्षों से लगातार इन भूकम्प,भूस्खलन,बादल फटना आदि प्राकृतिक आपदाओं का दंश झेलना पड़ रहा  है. फिर भी केंद्र सरकार हो या हिमालय क्षेत्र की राज्य सरकारें, प्राकृतिक आपदाओं से अपने नागरिकों की जान माल की सुरक्षा और हिमालय के पर्यावरण की रक्षा के प्रति सदैव उदासीन और लापरवाह रही हैं. सरकार को अपनी विकास योजनाओं में यहा के पहाड़ों, जंगलों,नदियों और प्राकृतिक जल स्रोतों की जैसी रक्षा की जानी चाहिए थी,उस प्रकृति संरक्षण के प्रति घोर उपेक्षा बरती गई. ऐसा लगता है कि मौसम की गंभीर चुनौतियों और प्राकृतिक आपदाओं के दंश को झेलना इन हिमालयीय राज्यों की आज नियति सी बन गई है.

खास चिंता की बात यह है कि उत्तराखंड हिमालय का पूरा क्षेत्र भूकम्प के अति  संवेदनशील खतरे के जोन के अंतर्गत आता है. भूगर्भ विशेषज्ञों का कहना है कि उत्तराखंड भूकंप के लिहाज से जोन 5 में आता है, जहां रिक्टर स्केल पर आठ की तीव्रता से बड़े भूकंप आने की आशंका सदा बनी ही रहती है. इस क्षेत्र में टेक्टोनिक प्लेटों के टकराने से भूकंप आते हैं. यहां यूरेशियन और भारतीय प्लेटों के बीच भी टकराहट देखने को मिलती है, जिस कारण भूकंप आते हैं. यूरेशियन प्लेट में चीन,कश्मीर का हिस्सा आता है. बद्रीनाथ, केदारनाथ समेत इस इलाके में किसी बडे भूकंप आने की आशंका भूगर्भ विज्ञानी काफी समय पहले से जताते आए हैं.

उत्तराखण्ड में उच्च हिमालय पर स्थित चौखुटिया,पिथौरागढ़ केदारनाथ,जोशीमठ जैसे अत्यंत संवेदनशील इलाके बहुतायत से हैं,जहां बादल फटने,पहाड़ खिसकने, जैसी भूमि स्खलन की घटनाएं आए दिन अखबारों की सुर्खियां बनती रहती हैं और भारी मात्रा में हर साल जान और माल का नुकसान भी होता आया है. मगर इन संवेदनशील इलाकों की सुरक्षा का कोई स्थायी इंतजाम नहीं किया गया है. प्रतिवर्ष प्राकृतिक आपदाओं की त्रासदियां झेलने के लिए यहां की जनता मानो विवश है. हिमालय के पर्यावरण की परिस्थितियों के अनुरूप ताल मेल रख कर आर्थिक विकास का मॉडल यहां की राज्य सरकार के पास नहीं है.

उत्तराखण्ड राज्य के गठन के बाद पिछली अनेक राज्य सरकारों ने हिमालय के प्राकृतिक संसाधनों की लूट-खसोट मचाने वाली पर्यावरण विरोधी योजनाओं को जो राजनैतिक संरक्षण प्रदान किया है, उससे हिमालय क्षेत्र में प्राकृतिक आपदाओं का कहर बढता ही गया  है और आम जनता यहां से पलायन के लिए मजबूर हुई है. अंधाधुन्ध वनों की कटाई, डायनामाइट विस्फोट से हिमालय की गिरि कन्दराओं की तोड़-फोड़ करने, खनन माफियों द्वारा पहाड़ों की जड़ों को खोदने और विशालकाय बांधों की पर्यावरण विरोधी योजनाओं के कारण समूचे हिमालय पर्यावरण की पारिस्थिकी आज निरन्तर रूप से बिगड़ती जा रही है. उत्तराखण्ड राज्य की इसी पर्यावरण विरोधी गलत  अन्ध-विकासवादी नीतियों का ही दुष्परिणाम है कि पहाड़ के पर्यावरण मित्र परम्परागत उद्योग धन्धे तथा आजीविका के साधन यहां से लुप्त होते जा रहे हैं और पर्यावरण को नुक्सान पहुंचाने वाले बाहर से लाए गए उद्योग-धंधे यहां फल-फूल रहे हैं.

आज समूचे देश को जल,वनस्पति और मौसमी ऋतुएं प्रदान करने वाले हिमालय पर्यावरण को बचाने और उत्तराखण्ड राज्य में रहने वाले नागरिकों के अस्तित्व की रक्षा करने के लिए बहुत जरूरी हो गया है कि भूकंप,बादल फटने जैसी आपदाओं से उत्तराखंड हिमालय और वहां बसने वाली जनता के मौलिक मानवाधिकारों की रक्षा की जाए, जिनकी मुख्य जिम्मेदारी यहां के राज्य सरकार की है. इसके लिए हिमालय के प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करना तथा पर्यावरणवादी विकास योजनाओं को भी अमल में लाए जाने की आज खास जरूरत है.

मगर उत्तराखंड का दुर्भाग्य रहा है कि क्षेत्र की शस्य श्यामला धरती को हमारे नेताओं ने सिंचाई योजनाओं के अभाव में कृषिविहीन और बंजर बना कर रख दिया है, वहां पहाड़ और प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट करके ग्राम संस्कृति की सारी रौनक मिटा कर रख दी और अध्यात्म व तपश्चर्या की इस देवभूमि को होटलों और रिसोर्ट में बदल कर रख दिया है. वहां तपोभूमि मैं एनटीपीसी जैसी योजनाएं लागू करके हिमालय की नदियों और पहाड़ों की पारिस्थिकी को बिगाड़ने का काम किया है.

तनावग्रस्त हिमालय के पर्यावरण से उत्पन्न होने वाली केदारनाथ और जोशीमठ जैसी भयावह त्रासदियों से उत्तराखंड को यदि बचाना है तो भारत सरकार के पर्यावरण मंत्रालय द्वारा सन् 2009 में ‘गवर्नेंश फॉर सस्टेनिंग हिमालयन इको सिस्टम गाइडलाइन्स एण्ड बैस्ट प्रैक्टिसिज’ की जो पर्यावरण सम्बन्धी आचार संहिता का प्रारूप तैयार किया गया था उसे केंद्र सरकार और उत्तराखंड राज्य को तुरंत लागु करने की जरूरत है ताकि इस संवेदनशील क्षेत्र को भविष्य में होने वाले भूकम्पों, भूस्खलनों, सूखा,अतिवृष्टि,बादल फटने जैसी आपदाओं से बचाया जा सके.

हमें याद रखना चाहिए कि हिमालय पर्वत मौसम नियंता होने के साथ-साथ समस्त देशवासियों को राजनैतिक सुरक्षा और आर्थिक संसाधन भी मुहैया करता है. हिमालय क्षेत्र के इसी राष्ट्रीय महत्त्व को उजागर करने के लिए भारत के प्राचीन पर्यावरणविदों ने इस हिमालय प्रकृति के  नौ रूपों में ‘शैलपुत्री’ के रूप में प्रथम स्थान दिया है. हिमालय पर्वत प्रकृति परमेश्वरी का उद्भव स्थान होने के साथ-साथ विश्व पर्यावरण को नियंत्रित करने का भी केन्द्रीय संस्थान है. इसलिए आज हिमालय की रक्षा केवल राजधर्म ही नहीं बल्कि राष्ट्रधर्म की भावना से की जानी चाहिए. हिमालय प्रकृति को नष्ट करना स्वयं को और अपनी सभ्यता संस्कृति को नष्ट करना है.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के  रामजस कॉलेज से एसोसिएट प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हैं. एवं विभिन्न पुरस्कार व सम्मानों से सम्मानित हैं. जिनमें 1994 में ‘संस्कृत शिक्षक पुरस्कार’, 1986 में ‘विद्या रत्न सम्मान’ और 1989 में उपराष्ट्रपति डा. शंकर दयाल शर्मा द्वारा ‘आचार्यरत्न देशभूषण सम्मान’ से अलंकृत. साथ ही विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े हुए हैं और देश के तमाम पत्र—पत्रिकाओं में दर्जनों लेख प्रकाशित)

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