

प्रकाश चन्द्र पुनेठा
सिलपाटा, पिथौरागढ़
पिथौरागढ़ की सोर घाटी में हिलजात्रा केवल एक लोकपर्व नहीं, बल्कि पहाड़ के उस सामूहिक जीवन की स्मृति है, जिसमें खेती, पशु, जंगल, देवता और मनुष्य एक-दूसरे से अलग नहीं थे। कुमौड़ में मनाया जाने वाला यह पर्व लगभग पाँच सौ वर्षों की परंपरा को अपने भीतर समेटे हुए है। समय बदला, खेतों की मेड़ें सूनी होने लगीं, गांवों से पलायन बढ़ा और खेती का स्वरूप भी बदलता गया, लेकिन हिलजात्रा आज भी उस लोक-संसार की बची हुई आवाज की तरह हमारे सामने आती है।
हिलजात्रा के केंद्र में उसके मुखौटे और पात्र हैं—लखिया भूत, वीरभद्र तथा खेती-किसानी और ग्रामीण जीवन से जुड़े अनेक रूप। ये मुखौटे केवल मनोरंजन के लिए नहीं हैं। इनके पीछे पहाड़ के लोकजीवन की गहरी स्मृतियां छिपी हैं। जब कलाकार इन्हें धारण करते हैं, तो उनके चेहरे भले ही ओझल हो जाते हैं, लेकिन उन्हीं मुखौटों के भीतर से सदियों पुराना लोकविश्वास बोलने लगता है।
लखिया भूत का विराट रूप लोगों के बीच कौतूहल और आकर्षण पैदा करता है। बच्चे उसके आने की प्रतीक्षा करते हैं, बुजुर्ग उसके रूप में अपनी पुरानी स्मृतियां खोजते हैं और नई पीढ़ी उसे उत्सव और रोमांच के रूप में देखती है। लेकिन इस दृश्य के भीतर केवल उत्सव नहीं है। इसमें उस समाज की सामूहिक कल्पना भी मौजूद है, जिसने प्रकृति की शक्तियों को भय, श्रद्धा और देवत्व के विविध रूपों में समझा और अपने लोकजीवन में स्थान दिया।
हिलजात्रा में दिखाई देने वाले कृषि-आधारित पात्र और पशु-पक्षियों के रूप पहाड़ की उस पुरानी अर्थव्यवस्था की याद दिलाते हैं, जिसमें खेती जीवन का केंद्र थी। बैल, खेत, हल, बीज और वर्षा केवल रोजमर्रा के जीवन से जुड़ी चीजें नहीं थे; वे जीवन की निरंतरता के आधार थे। इसलिए हिलजात्रा को देखना एक अर्थ में उस पुराने पहाड़ को देखना भी है, जहां श्रम और उत्सव के बीच कोई स्पष्ट विभाजन नहीं था।
इस परंपरा को लेकर कई लोककथाएं और मान्यताएं प्रचलित हैं। इसका संबंध कुमौड़ की पुरानी सांस्कृतिक स्मृतियों से जोड़ा जाता है और इसके कुछ रूपों में इंद्रजात्रा जैसी परंपराओं का प्रभाव भी देखा जाता है। समय के साथ स्थानीय समाज ने बाहरी प्रभावों और अपनी लोकपरंपराओं को अपने जीवन तथा परिवेश के अनुरूप ढाला। शायद यही कारण है कि हिलजात्रा किसी एक धार्मिक आख्यान तक सीमित नहीं रही, बल्कि सोर घाटी के लोकजीवन की अपनी विशिष्ट अभिव्यक्ति बन गई।
आज जब पहाड़ का सामाजिक ढांचा तेजी से बदल रहा है, हिलजात्रा का महत्व और भी बढ़ जाता है। गांवों से लोगों का बाहर जाना, खेती का सिकुड़ना और पारंपरिक जीवन-पद्धतियों का कमजोर होना केवल आर्थिक या सामाजिक परिवर्तन नहीं है। इनके साथ लोकस्मृतियों का एक पूरा संसार भी धीरे-धीरे बदल रहा है। ऐसे समय में हिलजात्रा उन स्मृतियों को सामूहिक और सार्वजनिक रूप से जीवित रखने का माध्यम बनती है।
उत्सव के दिन कुमौड़ की गलियों में उमड़ती भीड़ को देखकर लगता है कि पहाड़ अभी अपने अतीत से पूरी तरह अलग नहीं हुआ है। ढोल की थाप, मुखौटों के पीछे छिपे चेहरे, खेतों और पशुओं की आकृतियां और लखिया भूत का विराट रूप—ये सब मिलकर एक ऐसा दृश्य रचते हैं, जिसमें वर्तमान और अतीत कुछ देर के लिए एक-दूसरे के पास आ खड़े होते हैं।
हिलजात्रा की सबसे बड़ी शक्ति शायद यही है कि वह किसी संग्रहालय में रखी हुई मृत परंपरा नहीं है। वह आज भी लोगों के बीच घटित होती है। उसके पात्र चलते हैं, मुखौटे पहने जाते हैं, ढोल बजते हैं और पूरा समुदाय उसमें किसी न किसी रूप में सहभागी बनता है। इसीलिए हिलजात्रा केवल अतीत को याद करने का अवसर नहीं, बल्कि सोर की जीवित लोक-स्मृति है।
पहाड़ बदल रहा है। खेतों की जगह नई आकांक्षाएं ले रही हैं और गांवों की पुरानी आवाजें धीरे-धीरे धीमी पड़ रही हैं। फिर भी हिलजात्रा के अवसर पर जब कोई चेहरा मुखौटे के भीतर छिप जाता है, तो लगता है कि वह चेहरा अकेला नहीं है। उसके पीछे कई पीढ़ियों के चेहरे मौजूद हैं—उन लोगों के, जिन्होंने इन्हीं पहाड़ों में खेत जोते, पशु पाले, बारिश की प्रतीक्षा की और अपने सुख-दुःख को सामूहिक उत्सवों में बांटा।
शायद इसीलिए हिलजात्रा को बचाना केवल एक पर्व को बचाना नहीं है। यह सोर की उस सामूहिक स्मृति को बचाना है, जिसमें पहाड़ ने सदियों से अपने श्रम, विश्वास, प्रकृति और मनुष्य के रिश्ते को पहचाना है। मुखौटों के भीतर आज भी उसी पहाड़ का एक हिस्सा जीवित है—बदलते समय के बीच अपनी स्मृतियों, अपनी आवाज और अपनी पहचान के साथ।
