October 30, 2020
पुस्तक समीक्षा

आत्मकथा में बस ‘अ’ और ‘ह’ बाकी कथा

कॉलम: किताबें कुछ कहती हैं…

  • प्रकाश उप्रेती

किसी को गिराया न ख़ुद को उछाला,
कटा ज़िंदगी का सफर धीरे-धीरे.
जहाँ आप पहुँचे छ्लांगे लगाकर,
वहाँ मैं भी आया मगर धीरे-धीरे..
रामदरश मिश्र जी की इन पंक्तियों से विपरीत यह आत्मकथा है. स्वयं उनका जिक्र भी आत्मकथा में है.

आत्मकथा ‘स्व’ से सामाजिक होनी की कथा है. वर्षों के ‘निज’ को सार्वजनिकता में झोंक देने की विधा आत्मकथा है. बशर्ते वह ‘आत्म’ का ‘कथ्य’ हो. 20वीं सदी के मध्य हिंदी साहित्य में अनेक चर्चित आत्मकथाएं लिखी गईं  जिनमें निजी अनुभवों के साथ–साथ एक विशिष्टता बोध भी रहा . दरअसल आत्मकथा से जिस नैतिक ईमानदारी की अपेक्षा की जाती है वह इन आत्मकथाओं में कम ही देखने को मिली. रूसो ने आत्मकथा को ‘कंफैशन्स’ नाम दिया तो उसके पीछे का भाव था, स्वीकार्य करने का साहस लेकिन हिंदी में जो भी आत्मकथाएँ खासकर  पुरुषों के द्वारा लिखी गई उनमें यह स्वीकार्य का साहस नहीं दिखाई देता. बहुधा हिंदी की आत्मकथाएं महानता बोध से ग्रसित हैं . वह स्वयं के महान होनी की कथाएँ भर हैं. उनमें आत्म का स्वीकार्य उतना ही है जितना सार्वजनिक रूप में मौजूद है.

हाल ही में निर्मला जैन की आत्मकथा  ‘ज़माने में हम’ पढ़ी. निर्मला जैन की शख्सियत से हिंदी साहित्य को बरतने वाले लोग वाकिफ़ हैं. उनका लेखन हिंदी आलोचना के क्षेत्र में शास्त्र और नवाचार के मेल से हिंदी आलोचना की लकीर के बरक्स एक नई लकीर खींचने वाला है. वह हिंदी आलोचना में लकीर की फकरी नहीं बनती बल्कि अपनी एक अलग पहचान गढ़ती हैं.

हाल ही में निर्मला जैन की आत्मकथा  ‘ज़माने में हम’ पढ़ी. निर्मला जैन की शख्सियत से हिंदी साहित्य को बरतने वाले लोग वाकिफ़ हैं. उनका लेखन हिंदी आलोचना के क्षेत्र में शास्त्र और नवाचार के मेल से हिंदी आलोचना की लकीर के बरक्स एक नई लकीर खींचने वाला है. वह हिंदी आलोचना में लकीर की फकरी नहीं बनती बल्कि अपनी एक अलग पहचान गढ़ती हैं. इस गढ़ंत आलोचना में कई व्यावहारिक दिक्कतें हैं जिन पर अलग से बात की जा सकती है. परन्तु यह सत्य है कि उनका लेखन हिंदी के विद्यार्थी की बेसिक समझ को दुरुस्त करता है. अब उसे आप अध्यापकीय आलोचना के दायरे में रखें या उससे बाहर, आपकी समझ पर निर्भर करता है.

फिलहाल यहाँ उनकी आत्मकथा पर बात करनी है. अध्यायों में दर्ज़ यह आत्मकथा दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग केंद्रित है. बचपन, परिवार, शिक्षा के ताने -बाने के बीच से  गुजरती हुई यह कथा कॉलेज की नौकरी, हिंदी विभाग में नियुक्ति और संबंधों के जाल में उलझ जाती है. जीवन का एक बड़ा हिस्सा विश्वविद्यालय की नौकरी में रहने के कारण ये अपेक्षित है कि आत्मकथा में विश्वविद्यालय से जुड़े प्रसंग होंगे. परन्तु जब आत्मकथा के कुछ पृष्ठों के बाद यह पूरी कथा दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के 40 वर्षों के इर्दगिर्द ठहर जाती है तो बोझिल होने लगती है.

इन 40 वर्षों की कथा में भी एक हिस्स निन्दा रस से तो दूसरा महानता बोध से आच्छादित है. निंदा रस में विभागीय उठापटक, किसने किसकी नियुक्ति की, किस अध्यक्ष का कितना रौब रहा, किस अध्यक्ष ने निर्मला जैन के खिलाफ षड्यंत्र किया आदि, अनादि शामिल है. महानता बोध में निर्मला जैन ने किन- किन लोगों की नियुक्ति की, उनकी पहुँच किस-किस से थी,  विभाग से लेकर प्रशासनिक कामों में कितनी कुशल रहीं, हर बड़े व्यक्ति और उस दौर में आने वाले कुलपति से उनके हमेशा मधुर संबंध रहे, कितनी बार वह विदेश गईं आदि प्रसंग शामिल हैं. आत्मकथा का यह हिस्सा निंदा और महानता बोध तले दब जाता है. बहुत उत्सुकता जगाने वाला नहीं रहता. परन्तु रस लेने वाले इसमें भी रस ले सकते हैं.

आत्मकथा में आत्म संघर्ष भी है और परिवार तथा निजी संबंधों के बीच द्वंद्व भी है. घर, बड़ा भाई, मुकदमा, मां, बच्चे, आदि के बीच यह आत्मसंघर्ष और द्वंद है. जीवन का एक हिस्सा इनसे बाहर निकलने की जद्दोजहद में गुजर जाता है. बाकी हिस्से के लिए विभाग पर्याप्त है.

कुल मिलाकर जिन क्षेपकों, प्रसंगों और संदर्भों का उल्लेख आत्मकथा में किया गया है वह लगभग सभी ‘मंडी हाउस गैंग’ को जबानी याद हैं. कोई बड़ा सत्य या अर्द्धसत्य का उद्घाटन इसमें नहीं है. न आत्मस्वीकार्य की चेष्टा है न ग्लानि का भाव. एक महानता बोध का भाव इस आत्मकथा का पीछा लगातार अंत तक करता चलता है.

आत्मकथा में दो लोगों का जिक्र कई बार आता है. एक डॉ. नगेन्द्र और दूसरा डॉ. नामवर सिंह. कथा में डॉ. साहब अर्थात डॉ. नागेंद्र के स्वभाव से लेकर वृत्ति पर बहुत कुछ चमत्कारी है. उनकी विद्वता के सामने उनका अहंम हमेशा जीत जाता है. ‘न’  मतलब न की गुंजाइश उनके यहाँ नहीं थी. वह केवल हाँ सुनने के आदि रहे. नामवर सिंह का जिक्र संकोची वृत्ति, फक्कड़पन, वाक्पटुता, विचार और शिक्षण के प्रति प्रतिबद्धता के संदर्भ में आता है.

कुल मिलाकर जिन क्षेपकों, प्रसंगों और संदर्भों का उल्लेख आत्मकथा में किया गया है वह लगभग सभी ‘मंडी हाउस गैंग’ को जबानी याद हैं. कोई बड़ा सत्य या अर्द्धसत्य का उद्घाटन इसमें नहीं है. न आत्मस्वीकार्य की चेष्टा है न ग्लानि का भाव. एक महानता बोध का भाव इस आत्मकथा का पीछा लगातार अंत तक करता चलता है.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. पहाड़ के सवालों को लेकर मुखर रहते हैं.)

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