पहाड़ों में प्रकृति, परम्परा, पवित्रता का पर्व- बसंत पंचमी

basant panchami

 

Prakash Upreti

डॉ. प्रकाश उप्रेती

आज पूरे उत्तराखंड में बसंत पंचमी पर्व के साथ बर्फबारी भी हो रही है। प्रकृति के उत्साह और उल्लास का पर्व बसंत पंचमी है। पर्वतीय समाज में बसंत पंचमी, प्रकृति, परम्परा, ऋतु स्वागत, कृषि और मनुष्य के साहचर्य का पर्व है। आज का दिन पहाड़ों के निवासियों के लिए ‘खास’ ‘शुभ’ और ‘पवित्र’ होता है। पहाड़ों में लोग आज के दिन अपने आस-पास की नदियों में स्नान करने जाते हैं। उनके आज के दिन अपनी आस- पास की नदियों में स्नान का महात्म्य गंगा में स्नान के बराबर माना जाता है। बंसत पंचमी के दिन की पवित्रता और शुभदायी होने का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि ‘पैट- अपैट’ की गणना के बिना कोई भी शुभ कार्य नहीं करने वाले पहाड़ का समाज आज के दिन बिना दिन-बार-मुहर्त देखे सभी (विवाह, मुंडन संस्कार,जनेऊ संस्कार ) शुभ कार्य करते हैं। बहुत सारे लोग आज के दिन विवाह की मंग-जंगनी भी करते हैं और जिन्होंने पहले मंग-जंगनी कर ली होती है। उनके घर से आज कोई बड़ा व्यक्ति होने वाली ‘बहू’ को जौ के पौधे देने अवश्य जाते हैं। घर के होने वाले नए सदस्य का जौ लगाकर सुख, समृद्धि के साथ प्रकृति के माध्यम से स्वागत किया जाता है।

आज के दिन खेतों, ‘बड़’ ( क्यारी) से पूरे विधि-विधान के साथ जौ के नवांकुर पौधों को घर लाते हैं। घर लाने के बाद उनकी ‘प्रतिष्ठा’ ( पिठ्या- अक्षत के माध्यम से पूरे विधि-विधान से पूजा) की जाती है। इसके बाद इन जौ के नवाकुंर पाँच- पाँच पौधों को गोबर के माध्यम से घर के सभी दरवाजों के ‘संगाड’ ( दरवाजे के दोनों तरफ लगी लकड़ियां) पर लगाते हैं। जौ की बालियों को पहाड़ों में सुख, समृद्धि, देव आशीर्वाद और सम्पन्नता के द्योतक मानते हैं। साथ ही कृषि और प्रकृति के शुभ संकेत के रूप में नवांकुर जौ की बालियों को देखा जाता है।

बंसत पंचमी का पर्व शुभदायी होने के साथ प्रकृति और कृषि की समृद्धि के रूप में भी मनाया जाता है। आज के दिन खेतों, ‘बड़’ ( क्यारी) से पूरे विधि-विधान के साथ जौ के नवांकुर पौधों को घर लाते हैं। घर लाने के बाद उनकी ‘प्रतिष्ठा’ ( पिठ्या- अक्षत के माध्यम से पूरे विधि-विधान से पूजा) की जाती है। इसके बाद इन जौ के नवाकुंर पाँच- पाँच पौधों को गोबर के माध्यम से घर के सभी दरवाजों के ‘संगाड’ ( दरवाजे के दोनों तरफ लगी लकड़ियां) पर लगाते हैं। जौ की बालियों को पहाड़ों में सुख, समृद्धि, देव आशीर्वाद और सम्पन्नता के द्योतक मानते हैं। साथ ही कृषि और प्रकृति के शुभ संकेत के रूप में नवांकुर जौ की बालियों को देखा जाता है।

पूरे पहाड़ के लिए बंसत पंचमी का दिन हर्ष, उल्लास और पवित्र होता है। प्रकृति, देव, मनुष्य, पशु-पक्षी और पालतू जानवरों को भी इस पवित्रता का एहसास होता है। आज एक तरफ जौ की बालियां मंदिर में चढ़ाई जाती हैं तो वहीं दूसरी तरफ पालतू जानवरों के सींगों पर तेल लगाकर उनका श्रृंगार किया जाता है और उनके खाने के लिए उनकी प्रिय चीज दी जाती है। साथ ही बंसत पंचमी के अवसर पर पकने वाले पकवान (पूरी, खीर, बड़े) में से सब कुछ थोड़ा बहुत पक्षियों के लिए भी निकाला जाता है। इस तरह पहाड़ों में बसंत पंचमी की अपनी शोभा होती है ।

बसंत पंचमी का पर्व पहाड़ी जीवन के सभी संदर्भों में मौजूद है। पहाड़ के नराई गीतों में भी बसंत पंचमी पर्व पर प्रकृति और मनुष्य की स्थिति का वर्णन मिलता है।

फुलि गै छ दैणा,मेरि बैणा ऐगो
माघ को म्हैणा।
कफुवा बासण बैगो,मेरि बैणा ऐगो माघ को म्हैणा।।
कसि छु इजु मेरि, लागि छू नराई कसि सुरमाई भैंसी,पुसुली बिराई।
हिया मेरो कूछ अब कथ न्है जा उड़ि,
तुम फुलि जैया, फलि जाया, जस फुलो दैणा।।।

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