
नवदुर्गा विशेष | श्रृंखला – 8

“प्रतिभा कभी मंच की मोहताज नहीं होती, बल्कि प्रतिभा होने पर मंच स्वतः ही आपकी तलाश करते हैं और आपके सहयोगी बन जाते हैं।”
प्रतिभा कई बार हमें आनुवंशिक रूप से मिलती है तो कुछ लोग अपने हुनर को निखारने के लिए अपने व्यक्तित्व पर निरंतर काम करते हैं। ऐसे लोग समाज में आम जनमानस के बीच एक विशेष पहचान बनाते हैं और अपनी प्रतिभा से एक सकारात्मक संदेश देते हैं।
जब प्रतिभा दादा-दादी, नाना-नानी और माता-पिता से विरासत में मिलती है, तो वह कहावत बिल्कुल सटीक बैठती है कि ‘पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं’। इसे लिखते हुए महाभारत का वह प्रसंग अवश्य याद आ जाता है, जब वीर योद्धा अभिमन्यु ने अपनी मां के गर्भ में ही चक्रव्यूह तोड़ने की बात सुन ली थी। यानी प्रतिभा मां के गर्भ से ही संचित होने वाली एक अद्भुत प्रक्रिया है। इसी कड़ी में ‘गर्भधान संस्कार’ का स्मरण भी प्रासंगिक हो जाता है, जो हिंदू धर्म के सोलह संस्कारों में प्रथम है एक स्वस्थ, मेधावी और संस्कारवान पीढ़ी गढ़ने की दिशा में यह पहला आध्यात्मिक और मानसिक कदम है।

आइए, आज की इस कड़ी में हम आपको एक ऐसी विशिष्ट सौम्य , सरल लेकिन सशक्त व्यक्तित्व से रूबरू करवाते हैं, जो जन्मी तो पहाड़ में, जिनकी पठन-पाठन का सफर शहर में बीता और विवाह के पश्चात जो पुनः पूरी तरह पहाड़ की हो गईं। जिनकी कलम की नोंक में पहाड़ बसता है, जिनकी वाणी में पहाड़ की गूंज है, जिनकी रस्याण में पहाड़ महकता है और जिनकी रचनाओं में समाज को आईना दिखाती गहरी संवेदनशीलता है—ऐसी लेखिका शशि कुड़ियाल से ‘शशि कुड़ियाल चंद्रभा’ तक की यह यात्रा बेहद संघर्षपूर्ण और प्रेरणादायक है।
बहुआयामी प्रतिभा और चुपचाप करती कर्मसाधना
शशि कुड़ियाल एक ऐसी प्रतिभावान व्यक्तित्व हैं, जो एक साथ शिक्षिका, लेखिका, कवयित्री, संपादक, गीत-गजलकार, काउंसलर, मोटिवेशनल स्पीकर, सामाजिक कार्यकर्ता, गायिका और कुशल नृत्यांगना के रूप में अपनी एक विशिष्ट पहचान बना चुकी हैं। इन तमाम क्षेत्रों में शिखर छूने के बाद अब वह उद्यमिता के क्षेत्र में भी पूरी सक्रियता से संलग्न हैं। सबसे सुंदर बात यह है कि वह यह सब किसी प्रचार या शोर-शराबे से इतर, पूरी तल्लीनता और खामोशी के साथ करती हैं।
संगीत, शिक्षा और साहित्य सृजन के इन विभिन्न आयामों में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें शिक्षा के क्षेत्र में प्रतिष्ठित ‘शिक्षा रत्न’ और ‘बेस्ट टीचर अवार्ड’ से सम्मानित किया जा चुका है। इसके साथ ही विभिन्न साहित्यिक पटलों द्वारा उन्हें ‘साहित्यिक गौरव सम्मान’ और स्त्री सशक्तिकरण हेतु ‘संपर्क अपराजिता पुरस्कार’ से भी नवाजा जा चुका है, जो उनकी निरंतर साधना की मुहर हैं।

शशि कुड़ियाल चंद्रभा का जन्म टिहरी गढ़वाल के थौलधार विकासखंड (पुराने छाम और आज के कंडीसौड़ के नजदीक) के जसपुर गांव में, श्री कमलेश्वर प्रसाद खंडूडी और श्रीमती भुवनेश्वरी देवी के घर दूसरी संतान के रूप में हुआ। शशि की दो छोटी बहनें और एक बड़े भैया हैं। हमारे पहाड़ी समाज की सबसे मजबूत कड़ी संयुक्त परिवार प्रणाली रही है, जिसका जितना बड़ा परिवार होता था, समाज में उसका उतना ही बड़ा आदर और ओहदा माना जाता था।
पहाड़ों से पलायन और संघर्षों की भट्टी में तपता बचपन
अमूमन पहाड़ में सत्तर से नब्बे का दशक ऐसा दौर था, जब लोग व्यवस्था की मार और पलायन के कड़वे घूंट पीने को मजबूर थे, और यह सिलसिला आज भी किसी न किसी रूप में जारी है। शशि के पिताजी छाम के एक निजी स्कूल में गणित के शिक्षक थे। लेकिन सरकारी महकमे में मर्ज होने की वजह से घर के पास मिली उस नौकरी को जैसे किसी की नजर लग गई और उन्हें मजबूरन शहर की ओर रुख करना पड़ा।
छह भाई-बहनों में सबसे बड़े होने के कारण उनके पिता पर परिवार के भरण-पोषण के साथ-साथ सामाजिक जिम्मेदारियों का भी भारी बोझ था। पहले वे खुद शहर गए और फिर परिवार के आग्रह पर सभी को फरीदाबाद ले आए। शशि जब मात्र ढाई वर्ष की थीं, तब वह पहाड़ से फरीदाबाद आ गईं। लेकिन उनके माता-पिता ने उन्हें गांव की सौंधी मिट्टी से जोड़े रखा; उन्हें पहाड़ों के रीति-रिवाजों, मेलों और हर सांस्कृतिक आयोजन से जोडकर रखा ताकि उनकी जड़ें मजबूत बनी रहें।

शहरी चकाचौंध के बीच जब भी गर्मियों की छुट्टियां होती थीं, उनका एकमात्र गंतव्य उनका अपना गांव होता था—जहां दादा-दादी और चाचा-चाची का सानिध्य मिलता था, जहां खेत-खलिहानों, नौले-धारों और गांव के प्रतीक उस विशाल सेमल के पेड़ की छांव में दिन बीतते थे। शशि आज भी अपनी बोली-भाषा, संस्कृति और पहाड़ी खान-पान को सहेजने का पूरा श्रेय अपने माता-पिता को ही देती हैं।
स्वावलंबन और जिम्मेदारी का पाठ
शशि की स्कूली शिक्षा फरीदाबाद के दयानंद पब्लिक स्कूल से हुई, जिसके पश्चात उन्होंने अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर (मास्टर्स) की डिग्री प्राप्त की। अंग्रेजी विषय की यह शिक्षिका बचपन से ही अत्यंत जिम्मेदार स्वभाव की थीं। मां के लंबे समय तक अस्वस्थ रहने के कारण बहुत कम उम्र में ही गृह कार्य की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई, या यों कहें कि उन्होंने स्वतः ही उसे संभाल लिया।
इन कठिन हालातों में अपनी पढ़ाई जारी रखना उनके लिए एक बड़े संघर्ष से कम नहीं था, क्योंकि उन्हें अक्सर विद्यालय से छुट्टियां लेनी पड़ती थीं। लेकिन दृढ़संकल्पित शशि ने महज 15 वर्ष की आयु से ही अपनी बहनों और आसपास के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया। यानी स्वावलंबन का बीज उनके भीतर बहुत कम उम्र में ही अंकुरित हो चुका था।

एक समय ऐसा भी आया जब उनके पिता की कंपनी बंद हो जाने के कारण घर की आर्थिक स्थिति बेहद चरमरा गई। ऐसे संकट काल में शशि ने अत्यंत कम उम्र में अपने पिता और भाई के साथ कंधे से कंधा मिलाकर परिवार को संभाला।
विरासत में मिली कलम और लेखन का विहंगम संसार
शशि की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह प्रत्येक रिश्ते को पूरे समर्पण और शिद्दत से निभाती हैं। उनके लेखन में एक अनूठा प्रयोग दिखता है, जो उन्हें एक उत्कृष्ट लेखिका बनाता है। वह किसी एक विधा या भाषा तक सीमित नहीं हैं; वह हिंदी, अंग्रेजी और गढ़वाली तीनों भाषाओं में सहजता और सुंदरता के साथ लिखती हैं। उन्होंने कविता, कहानी, गजल, गीत, आलेख, संस्मरण और उपन्यास—तमाम विधाओं में अपनी लेखनी चलाई है। उन्होंने अपनी पहली कहानी मात्र 15 वर्ष की आयु में और पहला नाटक 17 वर्ष की आयु में लिख दिया था, जिसका मंचन उन्होंने अपने स्कूल के साथियों के साथ किया था।
उनके नाना ज्योतिष जगत में एक जाने-माने नाम थे, और साहित्य तथा लेखन की यह बानगी उन्हें एक विरासत के रूप में मिली थी, जिसे उन्होंने पूरी निष्ठा से आगे बढ़ाया। इस यात्रा में राष्ट्रीय संस्था ‘संपर्क संस्थान’ के सानिध्य ने उनके काम में चार चांद लगा दिए।
आपदा को अवसर में बदलने का हुनर और साहित्य साधना
वर्ष 1999 में शशि का विवाह उत्तरकाशी निवासी श्री महिमानंद कुड़ियाल के सुपुत्र, आर्किटेक्ट कृष्ण चंद्र कुड़ियाल के साथ हुआ। दो पुत्रों की माता और एक कुशल गृहिणी होने के साथ-साथ शिक्षण, लेखन और अपने पति के व्यवसाय में हाथ बंटाना—इन सभी भूमिकाओं को वह अद्भुत सहजता से निभाती आ रही हैं।
देहरादून के डीपीएस और सेंटर स्कूल में अध्यापन कर चुकीं शशि आज भी ऑनलाइन माध्यम से जरूरतमंद बच्चों को पढ़ाती हैं। समय-समय पर युवतियों व महिलाओं की करियर काउंसलिंग करती हैं, उन्हें स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करती हैं और आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनने के गुर सिखाती हैं। इसके अलावा, समाज के वंचित वर्ग के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन वह और उनके पति पूरी तरह खामोशी से करते हैं।
उत्तरकाशी के मसीह दिलासा स्कूल में लंबे समय तक अंग्रेजी की अध्यापिका के रूप में सेवा देते हुए उनके लेखन को एक नया आयाम मिला। स्कूल प्रबंधन ने उन्हें स्कूल की अंग्रेजी पत्रिका ‘MDS ECHO’ के संपादन की जिम्मेदारी सौंपी, जिसने उन्हें एक संपादक के रूप में एक नई पहचान दी।

सब कुछ सुचारू रूप से चल रहा था कि वर्ष 2019-20 में माता-पिता के अचानक निधन ने शशि को जीवन के एक अत्यंत गहरे और कठिन मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया। इस गहरे शोक और अवसाद ने उन्हें पूरी तरह तोड़ देने के बजाय उनकी कलम को उनका सबसे बड़ा संबल बना दिया। अंतस के उद्गारों ने कागज और कलम के रिश्ते को और अधिक प्रगाढ़ कर दिया।
जहाँ ऐसे कठिन दौर में आम इंसान टूट जाता है, वहीं शशि ने अपनी डायरी के पन्नों से होते हुए सोशल मीडिया और फिर पुस्तकों के विमोचन तक का सफर तय किया। कोरोना काल (2020) के दौरान, जब पूरी दुनिया अपने घरों में सिमट गई थी, वह वर्चुअल माध्यमों से कविता और कहानियों के जरिए लोगों से जुड़ने लगीं। एक दिन अलमारी में रखी उनकी डायरियों पर जब उनके पति और बेटे की नजर पड़ी, तो वे उनके लेखन से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने तुरंत इन रचनाओं को प्रकाशित करवाने का आग्रह किया।
समाज और संस्कृति के प्रति प्रतिबद्धता
पति के उस प्रोत्साहन ने शशि को सोशल मीडिया पर अपनी कविताएं और आलेख साझा करने के लिए प्रेरित किया, जहाँ से उन्हें एक सशक्त कवयित्री के रूप में पहचान मिली। सोशल मीडिया के माध्यम से ही उनका जुड़ाव राष्ट्रीय संस्था ‘संपर्क संस्थान’ से हुआ, जिसके बैनर तले अब तक उनकी तीन पुस्तकें विमोचित हो चुकी हैं। शशि के कार्य और समर्पण को देखकर संपर्क संस्थान ने उन्हें संस्था के सह-सचिव की जिम्मेदारी भी सौंपी है।
उनकी उपलब्धियों का दायरा केवल साहित्य तक सीमित नहीं रहा; वह प्रसिद्ध ‘गृहलक्ष्मी’ पत्रिका के डिजिटल कवर पेज पर भी अपनी जगह बना चुकी हैं। शशि का मानना है कि लिखना केवल किताबों का ढेर लगाना नहीं है, बल्कि लिखना अपने भीतर की छुपी हुई पीड़ाओं को बाहर निकालकर खुद को एक नए सिरे से गढ़ने और ऊर्जावान बनाने की प्रक्रिया है। वह न केवल लिखती हैं, बल्कि दूरदर्शन, रेडियो केदार,अमर उजाला,उत्तराखंड की नौनी जैसे प्रतिष्ठित प्रसार माध्यमों के साथ-साथ अनगिनत मंचों पर अपनी स्वरचित गीत और कविताओं का निरंतर वाचन करती रहती हैं।

वर्तमान में वह अपनी मातृभाषा और गढ़वाली बोली-संस्कृति के संरक्षण व संवर्धन के लिए पूरी तन्मयता से जुटी हुई हैं। गढ़वाली गीत, कविताएं, कहानियां और संस्मरण लिखने के साथ-साथ वह एक पत्रिका के लिए गढ़वाली विशेषांक का संपादन भी कर रही हैं। उनका स्पष्ट मानना है कि भले ही हमारी पढ़ाई-लिखाई अंग्रेजी माध्यम से हुई हो और हम अपनी भाषा के संरक्षण में सौ प्रतिशत योगदान न भी दे पाएं, पर इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि हम तटस्थ या तमाशबीन बनकर खड़े रहें। बूंद-बूंद से घड़ा भरता है; छोटे-छोटे प्रयास भी यदि समाज के एक छोटे हिस्से की भी दशा और दिशा बदल सकें, तो वह लेखन को सार्थक मानती हैं।
आज के इस दौर में जहां लोग अपनी मूल बोली-भाषा और संस्कृति से दूर होते जा रहे हैं, वहीं हिंदी, अंग्रेजी और गढ़वाली तीनों भाषाओं में लिखने वाली शशि कुड़ियाल चंद्रभा जैसी विदुषी महिलाएं यह संदेश देती हैं कि अंग्रेजी बोलना या आधुनिक होना अपनी जगह महत्वपूर्ण है, लेकिन अपनी मातृभाषा और जड़ों से जुड़ा रहना ही हमारे अस्तित्व की असल पहचान है।
उनका यह जीवन दर्शन आज की पीढ़ी के लिए एक अटूट संदेश है “बड़ी बात अंग्रेजी बोलना नहीं, अपनी बोली और संस्कारों से प्रेम करना है।”
