बाल पत्रकार से सीनियर पत्रकार बनने का सफर: “बेटियों को जिम्मेदारी नहीं, जिम्मेदार बनना आज की आवश्यकता है” रेनू सकलानी

Renu Saklani

 

नवदुर्गा विशेष | श्रृंखला  – 7

Ashita Dobhal Navdurga

भारतवर्ष में मातृशक्ति प्राचीन काल से ही सदैव पूजनीय और वंदनीय रही है l जीवन का हर प्रसंग नारीत्व की दिशा के बिना अधूरा है। अपाला, गार्गी, सावित्रीबाई फुले, महारानी लक्ष्मीबाई, दुर्गावती, तीलू रौतेली, महारानी कर्णावती और महारानी गुलेरिया जैसी अनेक वीर नारियों ने भारत मां का मान बढ़ाया है।  इन्हीं की भांति हमारे पहाड़ की महिलाओं ने भी अपने अदम्य साहस, शौर्य और अद्भुत कृतियों से देवभूमि का वैभव और श्रृंगार किया है।

अपनी कड़ी मेहनत और लगन से उन्होंने देवभूमि को वीरांगनाओं और देवियों की भूमि में तब्दील किया है। बात जब पहाड़ों की होती है तो संघर्ष और अभाव के कुछ पथ स्वतः ही जुड़ जाते हैं। पहाड़ के पहाड़ जैसे विराट और संकीर्ण गांवों के पथों से उभरकर सफलता की एक अलग कहानी लिख जाना ही हमारी इन महिलाओं एवं बेटियों की वीरता का एक पृथक परिचय कराता है। बरसों से यह कहावत हमारे पहाड़ों में काफी प्रचलन में रही है कि ” पहाड़ का पानी और जवानी पहाड़ के काम नही आती” लेकिन इस उक्ति को ग़लत साबित कर दिखाया है हमारी बेटियों ने। और यह सिद्ध कर दिया है कि यदि अपने पहाड़ों के लिए कुछ कर गुजरने का हौसला हो तो पहाड़ की जवानी सिर्फ पहाड़ के ही नहीं अपितु संपूर्ण विश्व और देश के काम आ सकती है। और उन्हीं बेटियों में से एक है रेनू सकलानी l

Renu Saklani-

बचपन के सवाल और वैचारिक मंथन

जी हां, आज की इस कड़ी में हम आपका परिचय एक ऐसी शख्सियत से करा रहे हैं जिनके नाज़ुक कंधों ने पहाड़ जैसी जिम्मेदारियों के समक्ष भी हार नहीं मानी l रेनू की घर-परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी, और समाज में बेटियों को बोझ समझने की कुप्रथा आज भी कायम है। पिता की मेहनत और मां के घरेलू प्रबंधन को देखते हुए रेनू के दिमाग में हमेशा यही सवाल चलता था—अगर बेटियों को बोझ समझा जाता है, तो महिलाओं के बिना घर क्यों नहीं चल सकता? और अगर घर चल रहा है, तो घर के निर्णय लेने का अधिकार महिला के पास क्यों नहीं? उसे अपने फैसले लेने के लिए पुरुष की इजाजत क्यों चाहिए? खाना भी महिला सबसे अंत में क्यों खाएगी, पुरुषों की थाली में ही घी क्यों?

यहां तक कि अगर घर में पंडित जी जन्मकुंडली देखने आते, तो उनके मुँह से भी वही भेदभावपूर्ण बातें निकलती थीं कि लड़का “साहब” बनेगा और लड़की को “अच्छा लड़का मिलेगा”। इस तरह की बातें रेनू के दिमाग में बचपन से ही बैठ गई थीं। जब उसने देखा कि धन के लिए माँ लक्ष्मी, विद्या के लिए मां सरस्वती और शक्ति के लिए मां दुर्गा ,इन तीनों देवियों का पूजन होता है और तीनों ही महिलाएं हैं तो फिर समाज में महिलाओं को बेसहारा या कमजोर क्यों समझा जाता है? मंदिर में महिलाओं का पूजन होता है, पर घर में उन्हें उतना सम्मान क्यों नहीं मिलता?

ये सारे सवाल उसके नन्हें मन में लगातार चलते रहते थे। रेनू का मानना है कि इन सब बातों को गहराई से समझते-समझते ही शायद आज मैं पत्रकार बनी हूँ। मेरे पिता और मेरे भाई को लोग बड़ी दया की नजरों से देखते थे, और उसका एकमात्र कारण था—तीन बेटियां

जिम्मेदार बनने का संकल्प

रेनू का कहना है कि समाज बेटों को ‘जिम्मेदार’ मानता है और बेटियों को ‘जिम्मेदारी’। मन में शायद मेरे यह बात उसी वक्त आ गई थी कि मैं ‘जिम्मेदारी’ नहीं बल्कि ‘जिम्मेदार’ बनना चुनना चाहती हूँ। मेरा मानना है कि अगर हम लड़कियां घर में बराबरी की इच्छा रखती हैं, तो घर की जिम्मेदारियां उठाने में भी हमें बराबरी करनी चाहिए।

पारिवारिक पृष्ठभूमि और शिक्षा

रेनू सकलानी का जन्म एक साधारण परिवार में देहरादून में हुआ था। उनकी माता एक गृहणी हैं जो घर की माली हालत सुधारने के लिए कड़ाई-बुनाई का काम करती थीं और पिता एक छोटा व्यवसाय कभी उत्तरकाशी तो कभी रुद्रप्रयाग के जखोली में स्थापित करने की कवायद में जुटे रहते थे। वे किसी तरह अपनी तीन बेटियों और एक बेटे की पढ़ाई-लिखाई के लिए दिन-रात हाथ पैर मारते रहे। रेनू ने अपने माता-पिता को संघर्ष की भट्टी में खूब तपते देखा है। उनकी प्रारंभिक शिक्षा जखोली (रुद्रप्रयाग) से हुई और आगे की पढ़ाई के लिए वे श्रीनगर गढ़वाल आ गईं।

बाल पत्रकार से जिनेवा और संयुक्त राष्ट्र तक का सफर

रेनू पढ़ाई-लिखाई में भले ही एक सामान्य छात्रा थीं लेकिन कहीं न कहीं बचपन से ही संप्रेषण की एक अच्छी मिसाल कायम करने की क्षमता उनमें भरपूर थी। इसी खूबी के चलते बाल पत्रकार के रूप में उनका चयन जिनेवा शहर (स्विट्जरलैंड की राजधानी) में होने वाले 15 देशों के बच्चों के बीच प्रतिभाग करने के लिए हुआ। 15 देशों से आए बच्चों के साथ अपने अनुभवों और विचारों को साझा करने का उन्हें यह सुनहरा अवसर मिला। अपने-अपने देशों का प्रतिनिधित्व कर रहे बच्चों ने बताया कि उनके देश में बच्चों की क्या स्थिति है।

बच्चों की ओर से ‘As We See It’ नाम से एक वैकल्पिक रिपोर्ट तैयार की गई, जिसे रेनू और उनकी साथी ने संयुक्त राष्ट्र संघ में प्रस्तुत किया। यह रिपोर्ट भारत के अलग-अलग राज्यों के बच्चों की ओर से तैयार की गई थी, जिसमें बच्चों की स्थिति, जेंडर डिस्क्रिमिनेशन (लैंगिक भेदभाव), शिक्षा, जन्म पंजीकरण, बाल विवाह और बाल सुरक्षा जैसे गंभीर मुद्दे शामिल थे। चाइल्ड राइट्स कमेटी की अध्यक्ष यांगली को यह रिपोर्ट सबमिट करने के बाद, दिल्ली जैसे महानगर में प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए उन्होंने अपनी बात को बेहद दमदार तरीके से रखा। जो लड़की क्लासरूम में एकदम गुमसुम सी रहती थी, आज वह प्रेस कॉन्फ्रेंस में अपनी बात सहजता से रख रही थी और यहीं से उसकी जिंदगी का बदलाव शुरू हो गया था।

अपनी इस यात्रा को साझा करते हुए रेनू सकलानी कहती हैं कि उनके गुरुओं ने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी।\

संघर्षों भरी डगर और पत्रकारिता की ओर कदम

जेनेवा शहर जाते समय जब वे अपने पिता के साथ देहरादून में कुछ जरूरी कागजी कार्रवाई कर रही थीं तब तत्कालीन मुख्यमंत्री मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूरी जी का फोन आया। पहले तो उन्हें इस पर यकीन ही नहीं हुआ और यहीं से उनके असली सफर की शुरुआत हो चुकी थी। अखबारों में आए दिन उनकी खबरें छपने लगीं l नाते-रिश्तेदारों ने खुशियां मनाईं और बधाइयां प्रेषित की जाने लगीं।
परंतु कहानी यहीं खत्म नहीं हुई आर्थिक तंगी किसी अवसाद की तरह उनके साथ चिपकी रही। अब जिंदगी के सबसे कठिन दौर से गुजरने का वक्त आ गया था l आगे की पढ़ाई के लिए श्रीनगर जाना और अपने लिए हर महीने के खर्च का खुद इंतजाम करना सबसे बड़ी चुनौती थी। उन्होंने दुकानों पर जा-जाकर जॉब मांगी। अपने खर्चे उठाने के लिए रेनू ने ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया साथ ही बच्चों को डांस और पेंटिंग भी सिखाने लगीं।

हेस्को (HESCO) का साइकिल अभियान और नया मोड़

अपनी प्रतिभा को निखारने का अब सही वक्त आ गया था। रघुवीर कंडवाल जी के एक फोन ने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी। उन्होंने रेनू को ‘हेस्को’ (HESCO – Himalayan Environment Studies and Conversion Organisation) के साइक्लिंग अभियान का हिस्सा बनने की बात कही। जोश और जुनून से भरी वह लड़की, जिसे अपने परिवार और घर की स्थिति को बदलना था और जो इसके लिए किसी भी कड़ी परीक्षा से गुजरने से पीछे नहीं हटना चाहती थी उसे बस अपने आप को साबित करने का एक मौका मिल गया था। वह इस अभियान का हिस्सा बनने के लिए निकल पड़ीं, जबकि उन्हें दूर-दूर तक साइकिल चलानी नहीं आती थी और डर के मारे उन्होंने किसी को बताया भी नहीं कि उन्हें साइकिल चलानी नहीं आती है!

इस अभियान का उद्देश्य जल, जंगल और जमीन को बचाना था। 45 दिनों तक चली इस यात्रा ने रेनू को सिर्फ शारीरिक रूप से ही नहीं, बल्कि मानसिक रूप से भी परिपक्व बना दिया और उनके गुरु की नजरों में यह साबित कर दिया कि रेनू सकलानी सिर्फ गांव से निकली डरी-सहमी कम बोलने वाली लड़की नहीं है, बल्कि उसकी क्षमताओं का भंडार बहुत बड़ा है जिसे थोड़े से सहारे और इशारे की जरूरत है।

‘अमर उजाला’ से जुड़ाव और सफलता के शिखर

रेनू कहती हैं कि भले ही वह मैथ्स में बहुत अच्छी नहीं थीं या क्लास में हमेशा फर्स्ट नहीं आती थीं, इसलिए उन्हें कुछ नहीं आता ,ऐसा नहीं था l बल्कि वे इतने गहरे मुद्दों को बहुत अच्छे से समझने लगी थीं। यहीं से रेनू सकलानी के जीवन में ‘अमर उजाला’ सिर्फ एक अखबार नहीं बल्कि उनके जीवन का वह उजाला बना जिसने उनके हुनर को पहचाना और आगे बढ़ने के अनगिनत मौके दिए। पहले ट्रेनिंग, फिर एक गोद लिए गांव की महिलाओं की आर्थिकी (अर्थव्यवस्था) के दस्तावेजीकरण की जिम्मेदारी, और धीरे-धीरे ‘बाल पत्रकार से सीनियर पत्रकार’ बनने तक का उनका यह सफर बहुत संघर्षपूर्ण रहा। लेकिन इस संघर्ष ने उन्हें मजबूत बनाया, हर चुनौती ने निखारा और हर पीड़ा ने आगे बढ़ने की हिम्मत दी।

रिपोर्टर, कंटेंट राइटर, न्यूज प्रेजेंटर और होस्ट के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने राजधानी में खुद को सफलतापूर्वक स्थापित किया। ‘युवा संवाद’ और ‘राजनीति संवाद’ को मॉडरेट करने के साथ-साथ वे अमर उजाला के चर्चित महिलाओं के मुद्दों पर आधारित ‘अपराजिता’ कार्यक्रम की कोऑर्डिनेटर बन गईं। रेनू सकलानी का कहना है कि जब उन्होंने पहली बार मुख्यमंत्री का इंटरव्यू लिया था, तब उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा था। और अब तो आए दिन बड़े-बड़े सेलिब्रिटीज के साथ इंटरव्यू होना उनके लिए आम बात है l जिसमें देश के बड़े नेता, मंत्री और अभिनेताओं की एक लंबी फेहरिस्त शामिल है। घर-परिवार के अलावा गांव के लोग उनकी हर उपलब्धि पर इतना खुश होते हैं कि जब वे देखते हैं कि वहां से निकली एक छोटी सी लड़की आज बड़े-बड़े कार्यक्रमों को होस्ट कर रही है l कभी किसी आयोजन का हिस्सा बन रही है तो कभी अवॉर्ड लेते हुए दिख रही है तो उन्हें भी बेहद गर्व महसूस होता है।

सम्मान और उपलब्धिया

रेनू सकलानी को उनकी उत्कृष्ट पत्रकारिता और सामाजिक योगदान के लिए कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया है। उन्हें गढ़वाल विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग की ओर से ‘अदिति स्मृति न्यास सम्मान’, पूर्व मुख्यमंत्री उत्तराखंड भगत सिंह कोश्यारी जी द्वारा ‘यूथ आइकॉन नेशनल अवार्ड’, ‘उम्मीदों के पहाड़ सम्मान’, ‘अमर शहीद रघुनंदन मेमोरियल सम्मान’, ‘उमा सम्मान’, ‘उत्तराखंड पत्रकार यूनियन सम्मान’ सहित सक्रिय पत्रकारिता के लिए लायंस क्लब और तमाम अन्य संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया जा चुका है।

निष्कर्ष और प्रेरणा

रेनू सकलानी जैसी लड़कियां भले ही किसी बड़े कॉलेज या संस्थान में नहीं पढ़ीं लेकिन जिंदगी के कठिन दौर से गुजरने का जो इम्तिहान उन्होंने सफलतापूर्वक पास किया और खुद को साबित किया, वह वाकई काबिलेतारीफ है। यह उन तमाम लड़कियों के लिए एक मजबूत प्रेरणास्रोत का काम करेगा जो आर्थिक रूप से मजबूत नहीं होती हैं। बस आपके पास हौसला और कुछ कर गुजरने का जोश-जुनून होना चाहिए तो सब कुछ संभव हो जाता है।

जिंदगी बदलती है, बशर्ते आपके अंदर बदलाव लाने की सच्ची इच्छाशक्ति होनी चाहिए। अगर आप सही-गलत का फर्क नहीं समझते हैं और गलत के खिलाफ आवाज नहीं उठा सकते तो आपका किताबें पढ़ना व्यर्थ है। इसलिए आपकी शिक्षा आपके व्यवहार में दिखनी चाहिए। संघर्ष हमेशा उसी के हिस्से में आता है जो लड़ सकता है। रेनू जैसी लड़कियां परिवार की जिम्मेदारी के साथ खुद को भी स्थापित करती हैं और समाज को यह संदेश देती हैं कि बेटा-बेटी के फर्क को दरकिनार करते हुए, वे ‘जिम्मेदारी’ नहीं बल्कि ‘जिम्मेदार’ बनना चुनती हैं।

Share this:

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *