विलुप्ति की कगार पर पहाड़ की पारंपरिक आभूषण संस्कृति: ‘बुलाक’ से ‘खगाली’ तक खोती विरासत

bulak Khagali Uttarakhand Jewellery

  • नीरजउत्तराखंडी, पुरोला, उत्तरकाशी

हिमालयी क्षेत्रों- विशेषकर उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी इलाकों की पारंपरिक आभूषण संस्कृति आज धीरे-धीरे विलुप्ति की कगार पर पहुंचती जा रही है. कभी महिलाओं की पहचान और सामाजिक स्थिति का प्रतीक रहे ये आभूषण अब आधुनिकता की चकाचौंध में अपनी चमक खोते नजर आ रहे हैं.

परंपरा में बसती थी पहचान

पहाड़ों में आभूषण केवल सजावट नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपरा और सामाजिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं. ‘बुलाक’ (नाक का आभूषण), ‘मुर्की’ (कानों का छोटा गहना), ‘लाबी’ और ‘खगाली’ जैसे आभूषण पीढ़ी-दर-पीढ़ी विरासत के रूप में संजोए जाते थे.

इन गहनों का संबंध केवल सौंदर्य से ही नहीं, बल्कि जीवन के विभिन्न संस्कारों—जैसे विवाह, त्योहार और पारिवारिक आयोजनों से भी गहराई से जुड़ा रहा है. कई आभूषण वैवाहिक स्थिति और आर्थिक सम्पन्नता के प्रतीक माने जाते थे.

बुलाकसेमुर्कीतकहर गहने की अपनी कहानी
  • बुलाक: नाक में पहना जाने वाला बड़ा और आकर्षक गहना, जो पारंपरिक पहचान का प्रतीक रहा है.
  • मुर्की/मुर्खली: कानों में पहना जाने वाला छोटा लेकिन कलात्मक आभूषण, जो दैनिक जीवन में भी उपयोग होता था.
  • लाबी और खगाली: स्थानीय स्तर पर प्रचलित पारंपरिक गहने, जो क्षेत्रीय सांस्कृतिक विविधता को दर्शाते हैं.

इसके अलावा हंसुली, गुलबंद, पौंछी जैसे अन्य गहने भी महिलाओं के श्रृंगार का अभिन्न हिस्सा रहे हैं.

क्यों खो रही है पहचान?

विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों के अनुसार इसके कई प्रमुख कारण हैं:

  • आधुनिक फैशन और हल्के आभूषणों की बढ़ती लोकप्रियता
  • पारंपरिक गहनों का भारी और महंगा होना
  • नई पीढ़ी में पारंपरिक विरासत के प्रति घटती रुचि
  • पारंपरिक कारीगरों की संख्या में लगातार कमी

आज स्थिति यह है कि कई आभूषण केवल पुराने संदूकों, संग्रहालयों या बुजुर्ग महिलाओं तक ही सीमित रह गए हैं.

कारीगर भी संकट में

पहाड़ी आभूषणों को बनाने वाले पारंपरिक कारीगरों की संख्या तेजी से घट रही है. नई पीढ़ी इस पेशे में रुचि नहीं ले रही, जिससे सदियों पुरानी यह शिल्पकला लुप्त होने के कगार पर पहुंच गई है.

संरक्षण की जरूरत

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते इन पारंपरिक आभूषणों को संरक्षित नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियां इन्हें केवल किताबों और तस्वीरों में ही देख पाएंगी.

संरक्षण के लिए कुछ जरूरी कदम:

  • स्थानीय मेलों और उत्सवों में पारंपरिक गहनों को बढ़ावा देना
  • कारीगरों को आर्थिक सहायता और प्रशिक्षण प्रदान करना
  • स्कूल और समाज स्तर पर सांस्कृतिक जागरूकता फैलाना
  • पारंपरिक आभूषणों को आधुनिक डिजाइन के साथ पुनर्परिभाषित करना
संदेश

पहाड़ की पारंपरिक आभूषण संस्कृति केवल गहनों का संग्रह नहीं, बल्कि एक जीवित विरासत है. ‘बुलाक’ से ‘लाबी’ और ‘मुर्की’ से ‘खगाली’ तक की यह परंपरा पहाड़ की पहचान है- जिसे बचाना आज समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन चुकी है.

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