

जे. पी. मैठाणी
आज हम आपको आयुर्वेद की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण पौधे कुटज के बारे में जानकारी दे रहे हैं …
कुटज को आम बोल चाल की भाषा में इंद्र जौ या कूड़ा भी कहते हैं. देहरादून में रायपुर थानों रोड से सड़क के किनारे इसके पेड़ दिखने शुरू हो जात एहेन और आजकल इन पेड़ों पर गुच्छों में सफ़ेद फूल खिले हुए हैं . भारत में इस पेड़ को कुछ स्थानों पर दूधि भी कहते हैं .कुटज के पौधे भी दो प्रकार के होते हैं एक मीठा कुटज और एक कडुवा कुटज – दोनों के वानस्पतिक नाम अलग अलग है , जैसे – मीठा इंद्र जौ- Wrightia tinctoria और कडुवा इंद्र जौ- Holorrhena dysentrica.
मीठा इंद्र जौ के पौधे बहुत कम पाए जाते हैं यहां तक की देहरादून और इसके आस पास इसके बहुत कम पौधे हैं,जबकि रानीपोखरी से नटराज चौक ऋषिकेश के बीच सात मोड़ और लच्छीवाला के जंगलों में इंद्र जौ के काफी सारे पेड़ आपको आसानी से दिख जायेंगे. कुटज भारत वर्ष में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार, छत्तीसगढ़, आन्ध्र प्रदेश में प्राकृतिक रूप से जंगलों में पाया जात है , लेकिन कुटज की व्यावसायिक खेती अभी तक कम हो रही है. जबकि दूसरी ओर कुटज के कच्चे माल की आयुर्वेदिक कंपनियों में बहुत मांग है.

ये एक शानदार बात है कि, आयुर्वेद चिकित्सा में इस पौधे के लगभग प्रत्येक अंग जैसे – पातियों, फूल, बीज, और छाल का प्रयोग किया जाता है.
कुटज के उपयोग – कुटज की छाल और अन्य हिस्सों का प्रयोग- कफ, डायरिया, पाइल्स, पित्त, रक्त विकार , त्वचा के रोग के इलाज में काम आता है . इस पौधे के अलग अलग भाग का उपयोग अलग – अलग रोगों के लिए किया जाता है. इसकी छाल और बीज की बहुत डिमांड है.
कैसे बनाये कुटज के पौधे
कड़वे कुटज के बीज देखने में बारीक और लम्बे जौ जैसे दिखते हैं, हालांकि बीजों के लम्बाई अधिक होती है और रंग भी हल्का भूरा और चोकलेटी होता है. आगाज फैडरेशन, पीपलकोटी, चमोली के द्वारा डाबर इण्डिया के सहयोग से किये जा रहे अध्ययन के अनुसार छत्तिसगढ़ से मंगाए बीज पर किये गए अनुसंधान के अनुसार 10 ग्राम बीज में लगभग 500 बीज आते हैं इस हिसाब से से 1 किलो बीज में लगभग 50400 बीज होते हैं कुटज के बीजों का जर्मिनेशन का प्रतिशत अधिक होता है लेकिन ये बीज ज़मने के तुरंत बाद ये बीज बड़ी मात्रा में फंगल अटैक की वजह से नीचे से गलने लगते हैं.
तो कैसे बनाएं मदर बेड- कुटज के बीजों की पहले क्यारियां बनकर पौध तैयार करनी चाहिए इसके लिए 60% बारीक बालू, 20% मिटटी और 20% गोबर की बिलकुल सड़ी हुई खाद का मिश्रण बना लीजिये, फिर जमीन या पालीहाउस के भीतर ट्रे में बोना चाहिए. ट्रे में कम से कम पानी के आवा जाही के लिए ट्रे के तलुवे पर छेद बना लीजिये ताकि ट्रे में पानी न रुके और जमे हुए छोटे छोटे पौधे सड़े और गले नहीं. यही नहीं अगर क्यारियाँ जमीन पर बनायी गई हैं तो वहाँ पर भी पानी रुकना नहीं चाहिए . क्यूंकि कुटज की छोटी छोटी पौध ज्यादा पानी या नमी से सड जाती है.

बीजों का उपचार- कुटज के ताजे बीजों को यानी जिस साल फल लगे उस साल के ही बीज होने चाहिए एक साल पुराने बीज बहुत कम जमते हैं. बीजों को अच्छे तरह सुखाकर, बोने से पहले कम से कम 6 घंटे पानी में डुबोकर रखिये एक किलो बीज में 10 ग्राम कोई भी बढ़िया फंफूद नाशक जैसे- बावस्टीन, डाईएथेन एम् -45 का पावडर का घोल मिलाकर बीजों का उपचार कर लीजिये, फिर पानी निथार कर गीले बीजों को रेत के साथ मिलाकर, ट्रे या खुली क्यारियों में छिड़कवां विधि या लाइन से बो दीजिये, और फव्वारे से हल्का पानी छिड़क दीजिये. बीज बोने और पानी से सिंचाई के बाद ऊपर से पुराने जूट के बोरे, पराली या अखबार से ढक दीजिये. ये बीज अगले 10-12 दिन में ज़मने लगेंगे, लेकिन ध्यान दीजिये – पानी ज्यादा या कम ना डालें.
पौध का प्रत्यारोपण – जब ट्रे या मदर बैड में ताज़ी उगी पौध पर 5-6 पत्तियां हो जाए और पौध की लम्बाई 3 इंच के आस पास हो जाए तो पौधों को – नर्सरी में भरी गयी थैलियों में प्रत्यारोपित की जानी चाहिए . लेकिन,
नर्सरी में भरी गयी थैलियों को कैसे मिश्रण से भरें – नर्सरी की थैलियों (5इंच x 7 इंच) को भरने के लिए – मिटटी, रेत और गोबर का मिश्रण भली भाँती तैयार करना होगा . इसके लिए 30% छानी हुई बारीक मिटटी, 30% बारीक सड़ा हुआ गोबर और 40% बालू का मिश्रण 5 इंच x 7 इंच की थैलियों में भरा जाना चाहिए , अब इन भरी हुई थैलियों में कुटज की पौधों को प्रत्यारोपित करना चाहिए.
पौधों के प्रत्यारोपण का कार्य अधिकतर शाम को ही करना चाहिए ताकि तेज गर्मी से नए नए पौध झुलसे नहीं . थैलियों में पौधे रोपने के बाद उन थैलियों के ऊपर कम से कम 15 दिन तक 50% वाली शेडिंग नेट की छाया बना के रखनी चाहिए. तब धीरे धीरे इन थैलियों को वापस सामान्य धूप में रखना चाहिए और ये पौध अगले 6 से 8 माह के भीतर जंगल, फ़ार्म हाउस या सडकों के किनारे रोपण के लिए तैयार हो जाते हैं. दोनों प्रकार के कुटज के पौधे 5 वर्ष बाद उत्पादन जैसे- फूल और बीज दें लायक हो जाते हैं और 8 वर्ष के बाद इनके तनों से छाल निकाली जा सकती है.

पौधारोपण कैसे करें – कुटज के 1 साल के पौधे को रोपने के लिए 18 इंच गहरा x18 इंच चौड़ा और 18 इंच लम्बा गड्ढा बनाएं एसएम कम से कम 4-5 किलो सड़े गोबर की खाद अच्छे तरह से मिलाकर पौधे को रोप दीजिये . एक पेड़ से दूसरे पेड़ की दूरी कम से कम 12 फीट होनी ही चाहिए साथ ही एक लाइन से दुसरे लाइन की दूरी 15 फीट होनी चाहिए.
आर्थिकी और कुटज की खेती या नर्सरी से आय
कुटज के एक किलो बीज का मूल्य लगभग 800 रूपये होता है. एक किलो बीज से कम से कम 3000 पौधे बनाये जा सकते हैं जिनके उत्पादन की लागत एक साल के भीतर प्रति पौध 20 से 25 रुपये होती है यानी 3000 पौध बनाने का कुल खर्च लगभग 75000 आएगा और एक साल की पौध का बिक्री मूल्य 40 से 50 रुपये होता है यानी एक साल के भीतर 1,50,000 की आमदनी हो सकती है.
इस प्रकार उत्तराखंड के ऐसे क्षेत्र जिस स्थान की उंचाई समुद्र तल से 1200 मीटर से कम और 300 मीटर से अधिक हो वहाँ दोनों प्रकार के कुटज की नर्सरियां बनाई जा सकती हैं और कुटज का रोपण भी किया जा सकता है.

उत्तराखंड में एक नाली भूमि में 25 से 30 पौधे रोपित किये सकते हैं जिनसे 5 साल बाद 25- 30 किलो बीज – यानी लगभग 3000 की आमदनी बीज से, 10000 की आमदनी पत्तियों से और दसवें साल में प्रति पेड़ से कम से कम 5000 की आमदनी छाल सहित बीज, पत्तियों , फूल और छाल से कम से कम 12000 की आमदनी प्रति पेड़ यानी 25 पेड़ों से प्रति वर्ष 3 लाख रुपये कमाए जा सकते हैं.
पौध कहा से प्राप्त करें – उत्तराखंड में कुटज के पौधे जनपद चमोली और देहरादून में- आगाज फैडरेशन द्वारा डाबर/ जीवन्ति वेलफेयर एंड चेरीटेबल ट्रस्ट के सहयोग से उपलब्ध है और बरसात में निशुल्क भी दी जाती है. यहीं नहीं जनपद बागेश्वर और अल्मोड़ा में ह्यूमन इंडिया संस्था, श्रीनगर गढ़वाल भी पौध उपलब्ध कराती है. वानिकी अनुसन्धान संस्थान यानी ऍफ़ आर आई देहरादून की सेन्ट्रल नर्सरी में भी कुटज की पौध मिल जाती है.
